आशीष अंशुलखनऊ : नब्बे के दशक में लखनऊ विश्व संवाद केन्द्र पर अधीश जी का आगमन हुआ था। डी-टू पार्क रोड तब संवाद केन्द्र का पता हुआ करता था और उसे लोग संवाद केन्द्र नहीं, डी-टू कहा करते थे। अधीश जी के कार्यकाल में ही डी-टू को संवाद केन्द्र की पहचान मिली। संवाद केन्द्र से विभिन्न आयु वर्ग के, और अभिरुचियों के लोग जुड़े। निजी सम्बन्ध बनाना, परिवारों की चिन्ता करना, प्रशंसा से विमुख रहना, मंच के नीचे रहकर नयी प्रतिभाओं को मंच देना अनेक ऐसे प्रमुख गुण थे कि लोग जुड़ते जाते थे। आगरा में 17 अगस्त 1955 को जन्मे अधीश जी ने लखनऊ से ऐसा नाता बनाया कि जैसे वे इसी नगर में जन्मे हों और इसके घर-घर से परिचित हों।
वे वर्ष 1968 में स्वयंसेवक बने। संघ के प्रति उनका प्रेम शनैः शनैः बढ़ता गया और बी.एस.सी. एल.एल.बी. करने के बाद 1973 में उन्होंने संघ कार्य हेतु घर छोड़ दिया और प्रचारक बन गये। 1975 में आपातकाल लगने पर उन्हें जेल में डाल दिया गया और उन पर भीषण अत्याचार किये गये। आपातकाल के बाद उन्हें विद्यार्थी परिषद में और 1981 में संघ कार्य हेतु मेरठ भेजा गया। मेरठ महानगर, सहारनपुर जिला, विभाग, मेरठ प्रान्त बौद्धिक प्रमुख जैसे प्रमुख दायित्वों के निर्वहन के बाद वे 1997 में लखनऊ आये थे।
संवाद केन्द्र में संवाद का कोई भी सिरा अधीश जी से नहीं छूटा। समाचार पत्र पढ़ने और उस पर प्रतिक्रिया देने वालों के लिये पत्र लेखक मंच बना इसकी साप्ताहिक बैठक होती थी और पत्र लेखकों को विषय-लेखन बिन्दु- प्रभावशाली पत्र लेखन जैसे गुण सिखाये जाते थे जिससे सम्पादक उन पत्रों को प्रकाशित करने को बाध्य हो जाएँ। इस मंच के सदस्यों की संख्या बढ़ते बढ़ते दो सौ पार हो गयी थी। आरम्भ में पत्र लेखक मंच में कोई भी लेखक श्रेणी में नहीं था किन्तु बाद में इसी मंच से कई लेखक विकसित हुए। स्तम्भकार तथा लेखकों के लिये अलग मंच था, इनकी बैठक अलग हुआ करती थी। साप्ताहिक और विषय आधारित मासिक संगोष्ठियाँ होती थीं जिनमें युवा प्रतिभागियों को प्रमुखता दी जाती थी। विभिन्न विषयों पर प्रामाणिक जानकारी मिल सके इसके लिये एक कटिंग-फाइलिंग सेक्शन बनाया गया था। विषय आधारित, विश्व संवाद केन्द्र त्रैमासिक पत्रिका अधीश जी के नेतृत्व में लखनऊ संवाद केन्द्र का एक अभिनव प्रयास था जिसे बाद में अन्य कई केन्द्रों ने अपनाया। डॉ. गौरीनाथ रस्तोगी के सम्पादन में तैयार होने वाली इस पत्रिका का प्रत्येक अंक आज भी प्रासंगिक हैं। वन्देमातरम, संविधान समीक्षा, जम्मू कश्मीर में से कोई भी अंक उठा लें आज भी समीचीन लगेगा।
अधीश जी स्वयं भी एक अच्छे लेखक थे। उनके सम्पादन में “कारगिल अपराधी कौन”, “जम्मू -कश्मीर पुनर्गठन क्यों आवश्यक” जैसी पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। जिन्होंने वे पुस्तकें पढ़ीं और जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन और धारा 370 व 35-ए हटाने का निर्णय देखा वह अधीश जी की दूरदर्शिता और रणनीतिक समझ से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम ईसाई संगठनों की साजिशों को भी बेनकाब किया। अधीश जी का बौद्धिक स्तर अत्यन्त उच्चकोटि का था। वह खाली समय में सभी को भाषण देने की कला सिखाया करते थे। इसी कड़ी में महापुरुषों की जयन्ती मनाने का क्रम आरम्भ हुआ। उसमें सभी वक्ता नये होते थे और उनको क्या बोलना है वो स्वयं तय करते थे। वक्ता चाहे तो मंच से यही बताकर वापस आ सकता था कि आज हम सभी किस महापुरुष की जयन्ती मनाने को लिये एकत्र हुए हैं या फिर उनके विषय कोई भी संक्षिप्त जानकारी हो किन्तु बोलना आवश्यक होता था। इन कार्यक्रमों से अनेक लोगों के मन से मंच से बोलने का भय जाता रहा। अधीश जी की स्मरण शक्ति अत्यन्त प्रबल थी। उन्हें यह अच्छी तरह से याद रहता था कि किस पुस्तक में कौन सी बात किस पृष्ठ पर किस पैरा में लिखी हुई है और उस पुस्तक का कवर किस रंग का है तथा उसमें कौन सा चित्र बना है। अधीश जी के कार्यकाल में, संवाद केन्द्र कार्यालय पर प्रतिदिन शाम 4 बजे गीता के 11 श्लोकों अर्थ सहित पठन-पाठन प्रारम्भ हुआ था। आज जिस प्रकार गीता परिवार व कुछ अन्य संगठन घर-घर गीता का अभियान चला रहे हैं इसकी प्रेरणा का केन्द्र भी एक प्रकार से विश्व संवाद केन्द्र ही है बस उसका स्वरूप बदला है।
स्नेह, सम्मान, आत्मीयता, सहयोग, प्रतिभा संवर्धन और मंच देकर नये लोगों को जोड़ना अधीश जी की कार्यशैली थी। अधीश जी अपनी अत्यन्त व्यस्तता के मध्य भी कार्यकर्ताओं व उनके परिवार का स्वयं हालचाल लेते रहते थे। यदि किसी कार्यकर्ता के घर-परिवार में कोई समस्या आ जाती थी तो वह उसके घर जाते थे। वह अत्यन्त आत्मीय तथा मिलनसार स्वभाव के थे। उनसे जो कोई भी मिलता तो फिर वह उनका होकर रह जाता था।
यदि कार्यालय में कोई बड़ा आयोजन होता था तो वह सभी उपस्थितजनों के जलपान व भोजन की स्वयं चिन्ता करते थे। अधीश जी के रहते ही संवाद केन्द्र डी टू से अपने नये भवन जियामऊ पहुँच गया, नये भवन का लोकार्पण परम पूज्य सुदर्शन जी के हाथों हुआ और वही उनकी एक बड़ी प्रेस वार्ता हुई किन्तु इसी समय अधीश जी अस्वस्थ रहने लगे। पेट का मामूली समझा गया संक्रमण कर्क रोग निकला जो काफी बढ़ चुका था। सभी उपलब्ध चिकित्सा विधाओं का सहयोग लिया गया किन्तु कैन्सर आखिरी चरण तक पहुँच चुका था। मार्च 2007 में उनकी दिल्ली में फिर जाँच हुई तब चिकित्सकों ने कहा कि अब अधिकतम दो -से तीन माह का समय है। उन्होंने एक विरत योगी की भाँति अपने मन को शरीर से अलग कर लिया। अब उन्हें जो कष्ट होता वह कहते यह शरीर को है मुझे नही। उनका कष्ट -देखकर उनकी माता जी ने 5 जुलाई 2007 की शाम को उनके सिर पर हाथ रखा- बेटा अधीश निश्चिन्त होकर जाओ। जल्दी आना और बाकी बचा संघ का काम करना। इसके कुछ देर बाद ही अधीश जी ने अपनी देह त्याग दी।
अधीश जी परम पूज्य गुरु जी को सदा पढ़ते रहते थे और जीवन पथ पर उन्हीं के पद चिह्नों पर चलने का प्रयास करते थे। परम वैभवं नेतुमेतत स्वराष्ट्रं …….यही उनका जीवन उद्घोष था और यही जीवन दर्शन।



