दिल्ली। स्वरा भास्कर का पद्मावत के जौहर दृश्य पर ताजा बयान एक बार फिर बहस का केंद्र बना है। उन्होंने कहा कि फिल्म देखते हुए उन्हें लगा-भगवान न करे अगर वे बलात्कार पीड़िता होतीं-तो वे कायर महसूस करतीं कि इज्जत बचाने के लिए उन्होंने आत्महत्या क्यों नहीं की। उन्होंने पूछा कि क्या मादा भ्रूण इसलिए जन्म का हकदार नहीं कि उसे मुस्लिम शासक बलात्कार कर सकता है। बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने रानी पद्मावती या जौहर करने वाली महिलाओं को कायर नहीं कहा।
यह स्पष्टीकरण सही है। लेकिन असली सवाल बयान के शब्दों से आगे जाता है। सवाल यह है कि एक मध्यकालीन युद्ध-परिस्थिति-जहाँ किला गिरने वाला हो, पुरुष सका कर रहे हों और विजेता सेना महिलाओं को दास, रखैल और यौन संपत्ति बनाने की प्रथा रखती हो-को आज के व्यक्तिगत बलात्कार-सर्वाइवर नैतिकता से मापना कितना ईमानदार है।
जौहर बलात्कार के बाद की आत्महत्या नहीं था। यह बलात्कार, गुलामी और धर्मपरिवर्तन से पहले का सामूहिक इन्कार था। समकालीन मुस्लिम इतिहासकार भी चित्तौड़ जैसे किलों में महिलाओं के अग्नि-प्रवेश का उल्लेख करते हैं। यह पीड़िताओं का पश्चाताप नहीं, बल्कि अपमान से बचने का अंतिम निर्णय था। जब इस दृश्य को “रेप के बाद जीने का हक” के आधुनिक फ्रेम में रखा जाता है, तो ऐतिहासिक महिलाओं की एजेंसी मिट जाती है और हमलावर की प्रकृति धुंधली पड़ जाती है।
यहीं नैरेटिव की महीन चाशनी काम करती है। यौन शुचिता और सम्मान की बात को पितृसत्ता का प्रतीक बनाकर पेश किया जाता है, जबकि उस युग में “सम्मान” का अर्थ व्यक्तिगत वर्जिनिटी से कहीं बड़ा था—वंश, धर्म, स्वतंत्रता और आने वाली पीढ़ी की रक्षा। आधुनिक सर्वाइवर को “तुम्हें मर जाना चाहिए था” कहना निश्चित रूप से गलत है। लेकिन 1303 की राजपूत महिलाओं पर वही मापदंड थोपना कालदोष है। इससे बलात्कारी आक्रमणकारियों को अप्रत्यक्ष राहत मिलती है: दोष संरचना पर चला जाता है, आक्रमण की यौन-हिंसा की व्यवस्थित प्रकृति पर नहीं।
यह सरलीकरण नया नहीं। सामूहिक बलात्कार जब माओवादी शिविरों में महिलाओं के शोषण के रूप में सामने आता है, या आईएसआईएस द्वारा यजीदी महिलाओं की खरीद-फरोख्त और निरंतर बलात्कार के रूप में दर्ज होता है, तो वही हलके में “संदर्भ” और “जटिलता” की भाषा अपना ली जाती है। यजीदी महिलाओं को दास बाजारों में बेचा गया, रोज बलात्कार किया गया-यह कोई अस्पष्ट इतिहास नहीं, समकालीन दस्तावेज है। फिर भी भारतीय वाम-उदार चर्चा में ऐसे मामलों पर आक्रोश उतना तीखा और निरंतर नहीं रहता, जितना हिंदू समाज की ‘ऑनर कल्चर’ पर रहता है।
स्वरा के पास औसत बौद्धिक तैयारी है, यह कहना कठोर लग सकता है, लेकिन बहस व्यक्ति पर नहीं ठहरनी चाहिए। ठहरनी चाहिए उस ढाँचे पर जो हर ऐतिहासिक प्रतिरोध को पितृसत्ता का शिकार बना देता है और आक्रमण को मात्र ‘शासक’ की कार्रवाई। फिल्म में जौहर का चित्रण गर्व का महिमामंडन हो सकता है; उसकी आलोचना भी हो सकती है। लेकिन आलोचना जब सिर्फ महिलाओं के फैसले को समस्या बनाती है और हमलावर की यौन-हिंसा की संस्थागत प्रकृति को पृष्ठभूमि में धकेलती है, तो वह पीड़िता-केंद्रित नहीं रह जाती-वह नैरेटिव-केंद्रित हो जाती है।
काट सरल है: संदर्भ लौटाओ। मध्यकालीन किले की महिला और आज की शहर की सर्वाइवर एक ही श्रेणी नहीं हैं। एक ने मृत्यु चुनी क्योंकि जीना गुलामी था; दूसरी को जीने का पूरा हक है क्योंकि राज्य और समाज अब कम से कम सिद्धांत में उसके साथ खड़े होने का दावा करते हैं। दोनों सत्य एक साथ रह सकते हैं। जो नैरेटिव इन्हें एक ही वाक्य में घोलकर आक्रमणकारियों को नैतिक छूट देता है, वही दुष्प्रचार है-चाहे उसे कितनी भी मानवीय चाशनी में लपेटा जाए। व्यक्ति को माफ किया जा सकता है। ढाँचे की परीक्षा जारी रहनी चाहिए।



