पाकिस्तान में हिंदू-सिख देवस्थलों का क्रमिक विनाश और भारत का मौन !

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । कई घटनाओं में फिर एक नई घटना दर्ज हो गई। एक उमस भरी सुबह, पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के नारोवाल जिले का सिराज गांव के कोने पर स्थित, एक सदी से भी अधिक पुराना ऐतिहासिक हिंदू मंदिर अचानक मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया गया। स्थानीय प्रशासन और प्रतिबंधित चरमपंथी संगठन तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) से जुड़े तत्वों की मौन सहमति से इस पवित्र स्थल को इसलिए ढहा दिया गया, ताकि इसकी बेशकीमती लगभग 1,000 वर्ग मीटर जमीन को पास के एक मदरसे में शामिल किया जा सके।

स्‍थानीय हिंदू नेता रतन लाल ने रूंधे गले से कहा, “प्रशासन ने हमसे कहा कि यह इमारत जर्जर थी और भारी बारिश के कारण खुद गिर गई, लेकिन हम जानते हैं कि रात के अंधेरे में वहां क्या हुआ था। अब जब वहां मदरसा बड़ा हो रहा है, तो हमारे लोग उस रास्ते से गुजरने में भी डरते हैं।” हमेशा की तरह पाकिस्‍तान में घटी यह घटना कोई अकेली या छिटपुट घटना नहीं है। यह पाकिस्तान में स्वतंत्रता के बाद से गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के धार्मिक और सांस्कृतिक अस्तित्व को मिटाने के लिए चल रहे एक लंबे, व्यवस्थित और क्रमिक सिलसिले का नवीनतम अध्याय है।

विभाजन के समय जिस देश की सीमाओं के भीतर सैकड़ों भव्य मंदिर, जैन उपासना स्थल और ऐतिहासिक गुरुद्वारे मौजूद थे, आज वहां की अल्पसंख्यक धरोहरें भू-माफियाओं, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और धार्मिक कट्टरपंथ के त्रिकोण में फंसकर दम तोड़ रही हैं। जिन हिन्‍दू पूर्वजों ने बहुत पुरुषार्थ से जब इन मंदिरों, देवस्‍थलों को बनवाया होगा, तब उन्‍हें भला क्‍या पता था कि भविष्‍य में उनकी पीढ़ियां इन्‍हें बचा पाने में असमर्थ रहेंगी। ‘ऑल पाकिस्तान हिंदू राइट्स मूवमेंट’ और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय नागरिक संगठनों द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के अनुसार भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के समय वर्तमान पाकिस्तान की भौगोलिक सीमाओं के भीतर लगभग 428 प्रमुख हिंदू मंदिर और 588 ऐतिहासिक गुरुद्वारे पूरी तरह सक्रिय थे।

आज इनमें से केवल 22 से 26 हिंदू मंदिर और लगभग 20 से 22 गुरुद्वारे ही ऐसे बचे हैं जहां नियमित पूजा-अर्चना या ग्रन्थ साहिब का पाठ होता है। शेष सभी या तो पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए हैं या उन्हें व्यावसायिक परिसरों में तब्दील कर दिया गया है।

प्रहलादपुरी मंदिर (मुलतान), भगवान नरसिंह का प्राकट्य स्थल, होलिका दहन की उत्पत्ति भूमि 1992 में पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए थे वर्तमान में उजाड़ खंडहर यहां देखा जा सकता है। ऐतिहासिक जैन मंदिर (लाहौर), पंजाब की अनूठी जैन स्थापत्य कला का गगनचुंबी प्रतीक। 1992 में बुलडोजर से जमींदोज कर दिया गया था। अब सड़क और व्यावसायिक क्षेत्र यहां हो गया है।
राम कुंड परिसर (सैदपुर) भगवान राम, लक्ष्मण और सीता के वनवास कालीन पवित्र कुंड से देव मूर्तियों को हटाकर परिसर को ‘पिकनिक स्पॉट’ और रेस्तरां बनाया गया गुरुद्वारा दमदमा साहिब (रावलपिंडी), बाबा खेम सिंह बेदी द्वारा 1876 में निर्मित पवित्र सिख स्थल पर स्थानीय भू-माफिया का कब्जा है। वर्तमान में कसाईखाना और मीट की दुकान यहां देखी जा सकती है।

शिव मंदिर (कोहाट), उत्तर-पश्चिम सीमांत का सदियों पुराना पूजनीय शिव स्थल परिसर पर कब्जा करके उसे सरकारी प्राथमिक विद्यालय में बदला गया है। गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा (साहीवाल), सिख साम्राज्य कालीन स्थानीय सिख समुदाय का मुख्य केंद्र अब प्रशासनिक आदेश पर पुलिस स्टेशन (थाने) में परिवर्तित दिखाई देता है। इस तरह से पाकिस्‍तान में अनेक समृद्ध एवं एतिहासिक महत्‍व के देव स्‍थलों को पूरी तरह से समाप्‍त कर दिया गया। वस्‍तुत: यह कुछ उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि पाकिस्तान में देवस्थलों को इस्‍लामिक जिहादी मानसिकता और मजहबी नफरत के कारण तोड़ दिया गया। अब उनका व्यावसायिक और प्रशासनिक संपत्तियों में उपयोग हो रहा है।

हालांकि 1947 में जब लाखों की संख्या में हिंदू और सिख अपनी जान बचाकर भारत आए, तो उनके पीछे छूटे मंदिर और गुरुद्वारे खाली स्‍थान रह गए थे। तब इन संपत्तियों की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान सरकार ने इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी)का गठन किया। फिर इसकी आड़ में एक नया खेल यहां शुरू हुआ। बोर्ड ने इन पवित्र स्थलों को संरक्षित करने के बजाय इन्हें ‘शरणार्थी पुनर्वास’ के नाम पर स्थानीय लोगों को आवंटित करना शुरू कर दिया और इस तरह से सैकड़ों ग्रामीण मंदिरों को गोदामों, तबेले या रिहायशी मकानों में बदल दिया गया।

फिर जो कमी शेष रही थी, वह जनरल मोहम्मद जिया-उल-हक के सैन्य शासन ने पूरी कर दी। इस दौरान पाकिस्तान की पूरी सामाजिक और कानूनी व्यवस्था का तेजी से कट्टरपंथीकरण किया गया। स्कूलों के पाठ्यक्रमों में गैर-मुस्लिमों के इतिहास को नकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाने लगा। इसी दौर में मदरसों के नेटवर्क को सरकारी फंडिंग दी गई। इसके परिणामस्वरूप, अल्पसंख्यक स्थलों को “काफिरों के प्रतीक” के रूप में देखा जाने लगा और कई प्राचीन परिसरों की जमीनों को बलपूर्वक पास के मदरसों या मस्जिदों में मिला लिया गया।

रही सही जिहादी इस्‍लामिक मानसिकता ने अपनी कसर 1992 में पूरी कर दी, जब उन्मादी भीड़ ने मात्र 48 से 72 घंटों के भीतर पूरे पाकिस्तान में 200 से अधिक हिंदू और जैन मंदिरों को डायनामाइट, बुलडोजर और आग के हवाले कर दिया। लाहौर का प्रसिद्ध जैन मंदिर इसी उन्माद की भेंट चढ़ा। इस घटना ने पाकिस्तान में बची-खुची अल्पसंख्यक वास्तुकला की रीढ़ तोड़ दी।

इस तरह से 21वीं सदी में, विशेषकर 2026 के वर्तमान परिदृश्य में, मंदिरों और गुरुद्वारों को तोड़ने का तरीका अब यहां बदल चुका है। अब सीधे तौर पर दंगों के बजाय एक “प्रशासनिक और कानूनी गठजोड़” के तहत इन संपत्तियों को निशाना बनाया जा रहा है। इस खेल के तीन मुख्य खिलाड़ी हैं- भू-माफिया, भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारी, मजहबी कट्टरपंथी संगठन एवं स्थानीय मदरसा संचालक। चूंकि अधिकांश ऐतिहासिक मंदिर और गुरुद्वारे शहरों के मुख्य व्यावसायिक केंद्रों (जैसे कराची का पुराना शहर, लाहौर का अनारकली, या रावलपिंडी का सदर) में स्थित हैं, इसलिए इनकी जमीनों की कीमत अरबों रुपये में है। भू-माफिया इन जमीनों पर नजर गड़ाए रहते हैं।

इसी तरह से विस्थापित संपत्ति बोर्ड (ईटीपीबी) जिसका मुख्य कार्य इन संपत्तियों की रक्षा करना था, स्वयं भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। बोर्ड के अधिकारी गुप्त रूप से इन जमीनों को “व्यावसायिक पट्टे” पर बिल्डरों को दे देते हैं। उदाहरण के लिए, अगस्त 2026 में क्वेटा (बलूचिस्तान) में 200 साल पुराने श्री गुरु सिंह सभा गुरुद्वारे को बिना किसी पूर्व सूचना के ढहा दिया गया क्योंकि उसकी जमीन एक कमर्शियल शॉपिंग मॉल के लिए बेच दी गई थी। जब स्थानीय अल्पसंख्यक हिन्दू-सिख इसका विरोध करते हैं, तो बिल्डर या भू-माफिया स्थानीय मौलवियों या कट्टरपंथी संगठनों (जैसे टीएलपी) को शामिल कर लेते हैं।

जमीन के एक हिस्से पर तुरंत मदरसा या मजार घोषित कर दी जाती है। एक बार जब किसी विवाद में धार्मिक रंग आ जाता है, तो पाकिस्तान की पुलिस और अदालतें अल्पसंख्यकों के पक्ष में खड़े होने का साहस खो देती हैं। वहीं, पाकिस्तान में देवस्थलों के टूटने के समानांतर ही वहां के हिंदुओं, सिखों और ईसाइयों के खिलाफ होने वाली शारीरिक हिंसा में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। खैबर पख्तूनख्वा और पेशावर के इलाकों में रहने वाले सिख व्यापारी पिछले कुछ वर्षों से लगातार आतंकवादियों और कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं।

जून 2026 में हुई एक अत्यंत वीभत्स घटना में, एक ऐतिहासिक गुरुद्वारे के भीतर सेवादार सिख दंपति की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इस घटना ने पाकिस्तान के सिखों को झकझोर दिया। वहीं भारत सहित पूरी दुनिया में रह रहे सिख डायस्पोरा में भारी आक्रोश पैदा होते हुए भी देखा गया था, किंतु फिर वही ढाक के तीन पात। यहां ईसाइयों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। अगस्त 2023 का ‘जरनवाला कांड’ (फैसलाबाद) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां ईशनिंदा के एक झूठे आरोप के बाद हिंसक भीड़ ने 21 से अधिक चर्चों और ईसाइयों के सैकड़ों घरों को आग लगा दी थी। 2026 में भी यह सिलसिला थमा नहीं है।

जुलाई 2026 में पादरी अफजल मसीह पर कुल्हाड़ी से हमला किया गया, और हर साल दर्जनों ईसाई सफाईकर्मियों को बिना किसी सुरक्षा उपकरण के सीवेज टैंकों में उतारकर जहरीली गैस से मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसी तरह से सिंध प्रांत में रहने वाले हिंदू समाज के लिए सबसे बड़ा अभिशाप उनकी नाबालिग बेटियों का अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन है। ह्यूमन राइट्स फोकस पाकिस्तान (एचआरएफपी) की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल 1,000 से अधिक हिंदू और ईसाई लड़कियों का अपहरण किया जाता है।

सिंध के घोटकी में स्थित ‘दरगाह भरचुंडी शरीफ’ का मौलवी मियां मिट्ठू इस नेटवर्क का मुख्य सरगना माना जाता है। अपहरण की गई नाबालिग लड़कियों को इन मदरसों में लाकर डरा-धमकाकर इस्लाम कबूल कराया जाता है और अधेड़ उम्र के मुस्लिम पुरुषों से उनका निकाह करा दिया जाता है। जब पीड़ित माता-पिता न्‍यायालयों का दरवाजा खटखटाते हैं, तो कट्टरपंथियों की भीड़ अदालत परिसर को घेर लेती है। बंदूक की नोक पर लड़की से बयान दिलवाया जाता है कि उसने “अपनी मर्जी से धर्म बदला है” और अदालतें उम्र के फर्जी दस्तावेजों को स्वीकार करते हुए मामले को बंद कर देती हैं।

जब भारत में किसी छोटी सी घटना पर भी संयुक्त राष्ट्र (यूएन), एमनेस्टी इंटरनेशनल या पश्चिमी देश तुरंत विस्तृत बयान जारी करते हैं, तो वही संगठन पाकिस्तान में हो रहे इस व्यवस्थित सांस्कृतिक नरसंहार पर रहस्यमयी चुप्पी क्यों साध लेते हैं? इस दोहरे रवैये के पीछे गहरे कूटनीतिक और रणनीतिक कारण समझ आते हैं, जैसे कि पश्चिम के लिए पाकिस्तान भू-राजनीतिक मोहरा है। ‘इस्लामोफोबिया’ के नैरेटिव को बचाने की कोशिश। विफल परमाणु देश होने का भय। महाशक्ति बनते भारत को घेरने का कूटनीतिक टूल। किंतु भारत का इन घटनाओं के बाद भी अक्‍सर चुप रहना समझ नहीं आता है।

आखिर विभाजन हुआ था तो धर्म के आधार पर। मुस्‍लिम लीग का डारेक्‍टर एक्‍शन, कलकत्‍ता से लेकर नोआखाली तक कई घटनाएं हैं जिन्‍होंने इतिहास में भारत को विभाजित करने में भूमिका निभाई, किंतु इसमें हिन्‍दुओं, सिखों या अन्‍य का क्‍या दोष है? नेहरु-लियाकत समझौते में भी जो तय हुआ वह नहीं हुआ, जिन्‍ना ने जो वादा भारत से किया कि वह अपने अल्‍पसंख्‍यकों की पूरी रक्षा करेगा, वह भी नहीं हुआ। पाकिस्‍तान निर्माण के लिए जिन उत्‍तरप्रदेश, बिहार से लेकर तमाम राज्‍यों के मुसलमानों ने जो वोट पाकिस्‍तान को दिया था, वह भी नए बने पाकिस्‍तान में नहीं गए। जो गए भी तो ज्‍यादातर अपनी जमीने वक्‍फ कर गए। यानी शेष भारत ने जमीन भी खोई और संस्‍कृति भी। स्‍वभाविक है अब ऐसे में भारत का चुप रहना बहुत खलता है!

ऐसे में आज कहना यही है कि नारोवाल के सिराज गांव में ढहाए गए मंदिर का मलबा केवल ईंट और गारे का ढेर नहीं है यह उस बहु-सांस्कृतिक और विविध भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास का एक हिस्सा है जिसे पाकिस्तान धीरे-धीरे अपने हाथों से मिटा रहा है। किसी भी देश की महानता इस बात से ही आंकी जाती है कि वहां के सबसे कमजोर और अल्पसंख्यक नागरिक अपने को कितना सुरक्षित महसूस करते हैं। वैसे इतिहास ने इस बात को कई बार बताया है कि जो समाज अपनी विरासतों को नष्ट कर देता है, वह अंततः अपनी पहचान भी खो बैठता है। पाकिस्‍तान भी फिलहाल उसी रास्‍ते पर चल रहा है, मगर इसमें भारत की अक्‍सर चुप्‍पी सबसे अधिक कष्‍टदायक है!

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