संजय स्वामी
दिल्ली । जून 1973 में प्रथम बार विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। वर्ष 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉकहोम सम्मेलन में इस दिवस को मनाने की घोषणा की थी। उद्देश्य स्पष्ट था कि दुनिया के सभी देश अपनी भौगोलिक सीमाओं के दायरे से निकल इस पृथ्वी के लिए विचार करें। लोग अपने संकुचित मानसिक घरोंदो से बाहर आएं, हम सभी की केवल एक पृथ्वी (ओनली वन अर्थ) इस तत्व को समझें।
पृथ्वी तो एक ही है। पंछियों के लिए पूरा आकाश एक है। अपनी आदतें, व्यवहार तथा क्षमता से वे अपना आवास तथा परिमंडल निश्चित करते हैं। गौरैया, मोर आदि भोजन की तलाश में बहुत लंबी दूरी तय नहीं करते। ग्रामीण क्षेत्रों में मनुष्य के आसपास ही अपना वास रखते हैं। दूसरी ओर साइबेरिया के सारस हजारों मील की यात्रा करते हैं। विशिष्ट मौसम में जब साइबेरिया में बहुत अधिक सर्दी बढ़ जाती है। तापमान माइनस – 50 डिग्री पहुंच जाता है तब वे भारत जैसे क्षेत्रों की ओर उड़ान भरते हैं। हजारों मील लंबी यात्रा करके भारत के दलदलीय क्षेत्रों, झीलों में सर्दी प्रारंभ होने से पूर्व अक्टूबर नंबर माह में आते हैं तथा कुछ महीने वास कर मौसम बदलने पर जब यहां फरवरी मार्च में ग्रीष्म ऋतु का आगमन प्रारंभ होता है, वापस लौट जाते हैं। सदियों से यह क्रम चल रहा है। उनके लिए पूरा आकाश सम्पूर्ण पृथ्वी एक घर जैसा है। इसलिए प्रकृति से ही प्रेरणा लें।
प्रकृति अपना नियोजन करने में समर्थ है। मनुष्य को स्वार्थी कहा गया है। कोई बात नहीं, स्वार्थ के वशीभूत ही सही, वह अपने भविष्य के लिए सजग हो। भावी पीढ़ी के प्रति दायित्व को समझे। उनके भविष्य का चिंतन करते हुए पर्यावरण के लिए अपनी आवश्यकताओं को मर्यादित करे।
पुरातन राजतंत्रिक व्यवस्था में राजाओं ने अपनी ताकत से भूमंडल को सीमाओं में बांट लिया। आधुनिक कालखंड की लोकप्रिय लोकतांत्रिक प्रणाली में भी यह निश्चित सीमाओं में बंधी हुई है। दुनिया में लगभग 200 देश हैं। सभी की एक निश्चित सीमा है। साम्राज्यवादी प्रवृति में कोई सीमा नहीं थी। राजतंत्र था प्राकृतिक संसाधनों से देश संपन्न थे। एक दूसरे की धन सम्पदा को लूटने के उद्देश्य से आक्रमण करते थे। बलात प्राकृतिक संसाधनों पर आधिपत्य स्थापित करते थे। वर्तमान यूक्रेन-रूस या इजरायल-इराक संघर्ष भी प्राकृतिक संसाधनों के बलात आधिपत्य के लिए ही है।
प्रतिवर्ष विश्व पर्यावरण दिवस आता है और चला जाता है। धीरे-धीरे विश्व के लगभग सभी देश इस अवसर पर पर्यावरण के प्रति कुछ नए संकल्प लेते हैं, कुछ नई योजनाएँ बनाते हैं। कहीं पौधारोपण होता है, तो कहीं संगोष्ठी-सेमिनारों का आयोजन। किंतु संकल्प की स्याही सूखते ही सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। वही धुआँ, वही कचरा, वही कटते वृक्ष, मानो विश्व पर्यावरण दिवस मनाना एक औपचारिकता मात्र है, कोई दायित्व बोध नहीं। इस वर्ष एक बार, कुछ क्षण के लिए, दैनिक कार्य-व्यवहार और व्यापार को एक ओर रख कर शांत चित्त से बैठिए, प्रकृति की ओर निहारिए। अपने आसपास के वृक्षों, पौधों, झाड़ियों से मौन संवाद करिए। कुछ पल नदियों के कल-कल निनाद की व्यथा सुनिए। पहाड़ों के मौन आर्तनाद को अनुभव करने का प्रयास करें। जिस धरती ने हमें अन्न दिया, जल दिया, वायु दी, उसके प्रति हमारी कृतज्ञता केवल किसी एक दिन विशेष की नहीं होनी चाहिए। पर्यावरण-चेतना हमारी जीवनशैली बने, केवल नारा नहीं। प्रकृति मनुष्य की सेवक नहीं, वह मानव की जीवनदात्री माँ है।
विश्व पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष हमें हमारे भविष्य के प्रति सचेत होने का संकेत देता है। प्रतिवर्ष ग्रीष्म ऋतु की तपिश बढ़ती जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप एसी-कूलर आदि वातानुकूलन यंत्रों की माँग निरंतर बढ़ रही है। मानवीय उपयोग हेतु जल की माँग दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। भवन-निर्माण और उद्योगों में पानी की खपत अपरिमित है। भूजल स्तर प्रतिवर्ष नीचे जा रहा है। वर्षाकाल को छोड़ दें तो बारहमासी नदियों का जल प्रवाह भी क्षीण होता जा रहा है। कभी विशाल कही जाने वाली झीलें आज न जल-मात्रा में विशाल हैं और न ही क्षेत्रफल की दृष्टि से विस्तृत। तालाबों का स्थान स्विमिंग पूल ने ले लिया और कुएँ अब बोरवेल-समर्सिबल में रूपांतरित हो गए। गाँव की बावड़ियाँ, जो सैकड़ों प्राणियों की प्यास बुझाती थीं वह आज मलबे और कचरे से भर चुकी हैं। तालाब, बावड़ी, पोखर, झील और नदियाँ, जो लाखों जीव-जंतुओं के लिए थे, मनुष्य ने उन्हें अपनी सुविधा के अनुसार रूपांतरित कर लिया। वन-क्षेत्र के सिकुड़ने लगे। वन-वृक्षों के कटने से जंगली जीव भटककर आवासीय क्षेत्रों में प्रवेश करने लगे हैं। विशाल वृक्षों की घटती संख्या से पक्षी विलुप्त हो रहे हैं। झीलों में जलस्तर घटने से जलीय जीवों की संख्या न्यून होती जा रही है। मिट्टी की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। अंधाधुंध रासायनिक खादों और कीटनाशकों के उपयोग से भूमि की जीवंतता नष्ट हो रही है। वह मिट्टी, जिसमें करोड़ों सूक्ष्मजीव प्रति वर्ग इंच निवास करते थे और फ़सल को जीवन देते थे, अब बंजर होती जा रही है। खेत अधिक उपज दे रहे हैं, पर वह उपज पोषण से रहित है। मनुष्य अन्न खा तो रहा है, पर भूखा ही रह रहा है।
आज के युग में आविष्कारक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि उद्योगपति और विज्ञापन कंपनियाँ हैं। बाज़ारवाद ने सर्वत्र कचरे का अंबार लगा दिया है। इसका एक कारण कि प्रत्येक वस्तु पैकिंग में बिकती है, जन्म से लेकर मृत्यु तक। अस्पताल से घर आने वाले शिशु का पालना प्लास्टिक की पैकिंग में है, और अंतिम विदाई के समय शमशान भूमि तक सामग्री पॉलिथीन की थैलियों में जाती है। त्योहारों और उत्सवों का भी यही हाल है। आज पर्यावरण के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, अत्यधिक उपभोग और उससे उत्पन्न कचरा। बाजारवाद ने सुविधा तो दी है, परंतु पैकेजिंग संस्कृति ने कचरे का पहाड़ खड़ा कर दिया है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन का लगभग प्रत्येक उत्पाद प्लास्टिक, थर्मोकोल या अन्य अजैविक सामग्री में पैक होकर आता है। प्रकृति का निर्माण केवल मनुष्य के लिए नहीं हुआ है। नदियाँ, झीलें, वन और पर्वत असंख्य जीव-जंतुओं तथा वनस्पतियों के जीवन का आधार हैं। किंतु आधुनिक विकास मॉडल में अक्सर केवल मानवीय आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जाती है। प्रकृति, पर्यावरण और समस्त जीव-जंतु अब मनुष्य से यही अपेक्षा करते हैं कि वह केवल अपने को ही संभाल ले। वन और जंगलों पर अतिक्रमण करना कम करे। अपनी भोगवादी प्रवृत्ति को नियंत्रित करे। जनसंख्या के अनियंत्रित विस्तार पर विचार करे। व्यक्तिगत स्तर पर छोटे-छोटे निर्णय बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। कपड़े का थैला लेकर बाज़ार जाइए। बोतलबंद पानी की जगह अपनी पुनः उपयोगी बोतल साथ रखिए। घर की रसोई से निकला जैविक कचरा गमले की खाद बने। त्योहारों पर मिट्टी की मूर्तियाँ खरीदिए, प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की नहीं। ये निर्णय क्रांति नहीं, किंतु इन्हीं से क्रांति का आरंभ होता है।
विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि पृथ्वी को बचाने का अर्थ केवल भाषण देना या पौधे लगाना नहीं है। वास्तविक परिवर्तन हमारी जीवनशैली, उपभोग की आदतों और विकास की अवधारणाओं में निहित है। सत्य को ग्रहण करें, अविवेक का त्याग करें और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन की ओर बढ़ें। यही विश्व पर्यावरण दिवस का सबसे बड़ा संकल्प हो सकता है। सत्य यही है कि पर्यावरण दिवस पर भाषण देने से नहीं, बल्कि प्रतिदिन की छोटी-छोटी आदतों को बदलने से हमारी पृथ्वी बचेगी। धरती माँ के आंचल को मैला होने से बचाने के लिए अपना थैला व पानी बोतल साथ रखें। एक वृक्ष का रोपण-पोषण स्वयं करें। एक जागरूक नागरिक बन पर्यावरण संरक्षण का संदेश परिवारों, विद्यालयों और जनमानस के साथ साझा करें, समाज को प्रेरित करें। इस पर्यावरण दिवस पर अपनी दैनिक गतिविधियों में कचरा उत्सर्जन न्यून करने का संकल्पित विचार करें।



