कई जंगें जीत चुके हैं, लेकिन अब अदालतों को पर्यावरणविद

supreme-court.jpg.avif
प्लाचीमाडा (केरल) : जब जेसीबी और बुलडोज़र तरक्की का परचम लेकर आएं , तब नदियों, जंगलों, वन्यजीवों और आने वाली नस्लों की तरफ़ से कौन बोलेगा?

और अगर पर्यावरण की हिफाज़त करने वालों को ही तरक्की का दुश्मन समझ लिया जाए, तो फिर प्रकृति की पैरवी कौन करेगा?

ये सवाल आज इसलिए और अहम हो गए हैं क्योंकि 11 मई 2026 को प्रस्तावित पीपावाव बंदरगाह विस्तार परियोजना की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत ने पर्यावरण कार्यकर्ताओं की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि क्या पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कभी किसी विकास परियोजना का स्वागत किया है? साथ ही यह चिंता भी जताई कि मुकदमेबाज़ी विकास की रफ्तार रोक रही है।
इन टिप्पणियों पर देशभर के 600 से अधिक नागरिकों, पर्यावरण संगठनों, शिक्षाविदों और सेवानिवृत्त अधिकारियों ने एतराज़ जताया। उन्होंने इन टिप्पणियों को परेशान करने वाला बताया और उन्हें वापस लेने की मांग की।
उनकी चिंता वाजिब है।
पर्यावरण आंदोलन कुछ पेशेवर प्रदर्शनकारियों का शौक नहीं है। इसकी जड़ें भारत के संविधान और लोकतांत्रिक परंपराओं में गहराई तक मौजूद हैं। संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन का अधिकार देता है, जिसमें स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार भी शामिल है। संविधान राज्य और नागरिकों दोनों को देश की प्राकृतिक विरासत की रक्षा करने का दायित्व भी सौंपता है।
इतिहास गवाह है कि कई बार पर्यावरण कार्यकर्ता सही साबित हुए हैं। सत्तर के दशक में हिमालयी क्षेत्र में चला चिपको आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। गांवों की महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उनकी कटाई रोकी। उस समय उन्हें विकास विरोधी कहा गया था। आज वही लोग पर्यावरण संरक्षण के अग्रदूत माने जाते हैं। उनके संघर्ष ने भारत की वन नीति को नई दिशा दी।
कर्नाटक में अप्पिको आंदोलन ने भी यही संदेश दिया। स्थानीय समुदायों ने अंधाधुंध कटाई का विरोध किया और टिकाऊ वन प्रबंधन की पैरवी की। केरल में साइलेंट वैली वर्षावन को बचाने के लिए नागरिकों, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने लंबी लड़ाई लड़ी। अगर वे हार जाते, तो भारत की सबसे समृद्ध जैव विविधता वाली धरोहरों में से एक हमेशा के लिए मिट सकती थी।
भारत के आदिवासी समुदायों ने भी प्रकृति की हिफाज़त में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने देश को याद दिलाया कि जंगल सिर्फ़ लकड़ी और खनिजों के भंडार नहीं हैं। वे जीवित संसार हैं, जो समाज, संस्कृति और पारिस्थितिकी को सहारा देते हैं।
नर्मदा बचाओ आंदोलन सभी बांध परियोजनाओं को नहीं रोक सका, लेकिन उसने विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया।
पर्यावरण आंदोलनों ने कई बार कॉरपोरेट लापरवाही का भी पर्दाफाश किया है।
केरल के प्लाचीमाडा में ग्रामीणों ने कोका-कोला के बॉटलिंग प्लांट पर भूजल के दोहन और स्थानीय संसाधनों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। वर्षों के संघर्ष के बाद संयंत्र बंद हुआ।
तमिलनाडु के तूतीकोरिन में लोगों ने स्टरलाइट कॉपर संयंत्र के खिलाफ प्रदूषण को लेकर आंदोलन किया। बाद की जांचों और अदालती कार्यवाहियों ने उनकी कई आशंकाओं को सही साबित किया।
हाथियों के संरक्षण के लिए दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के ऊटी क्षेत्र में स्थित सिगुर पठार हाथी गलियारे को बचाने का ऐतिहासिक फैसला दिया। रिसॉर्टों और अवैध निर्माणों से घिरे इस मार्ग को अदालत ने हाथियों का “आवागमन का अधिकार” मानते हुए अतिक्रमण हटाने के आदेश दिए। यह फैसला पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।
वृंदावन में भी पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कई विवादास्पद परियोजनाओं के खिलाफ अदालतों में सफल लड़ाइयां लड़ी हैं।
शायद भारत की सबसे प्रसिद्ध पर्यावरणीय कानूनी जीत ताजमहल से जुड़ी है।
सत्तर के दशक में मथुरा में तेल रिफाइनरी लगाने के प्रस्ताव का पर्यावरणविदों ने विरोध किया था। उन्हें डर था कि इससे ताजमहल को नुकसान पहुंचेगा। बाद में पर्यावरण वकील एम.सी. मेहता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने दलील दी कि आगरा के आसपास का औद्योगिक प्रदूषण ताजमहल के संगमरमर को नुकसान पहुंचा रहा है।
वैज्ञानिक अध्ययनों ने उनकी बात की तस्दीक की। अदालत ने ताज ट्रेपेजियम ज़ोन का गठन किया, उद्योगों को स्वच्छ ईंधन अपनाने के निर्देश दिए और कई प्रदूषणकारी इकाइयों को स्थानांतरित कराया।
आज शायद ही कोई कहे कि ताजमहल को बचाना विकास विरोधी कदम था। इसे भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय सफलताओं में गिना जाता है।
मैसूर की चामुंडी पहाड़ियों का मामला भी ऐसा ही है। वहां प्रस्तावित रोपवे परियोजना का पर्यावरणविदों, विरासत विशेषज्ञों, स्थानीय निवासियों और सांस्कृतिक संगठनों ने विरोध किया। उनकी चिंताएं वनों की कटाई, मिट्टी के कटाव और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत के व्यावसायीकरण को लेकर थीं। जनविरोध के चलते सरकारों को कई बार अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ा।
बार-बार पर्यावरण आंदोलनों ने एक शुरुआती चेतावनी प्रणाली का काम किया है।
उन्होंने कुएं सूखने से पहले भूजल संकट की चेतावनी दी। उन्होंने स्वास्थ्य संकट पैदा होने से पहले प्रदूषण के खतरे बताए। उन्होंने आपदा आने से पहले पारिस्थितिक जोखिमों की ओर ध्यान दिलाया।
असल खतरा तब पैदा होता है जब हर पर्यावरणीय चिंता को विकास का दुश्मन बताकर खारिज कर दिया जाता है। इससे वैज्ञानिकों, नागरिकों, वकीलों और स्थानीय समुदायों की आवाज़ दब सकती है। सवाल पूछने का लोकतांत्रिक हक़ कमज़ोर पड़ सकता है।
भारत का पर्यावरणीय इतिहास हमें एक सीधी-सी सीख देता है।
विकास और पर्यावरण दुश्मन नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे के साझेदार हैं। सबसे सफल परियोजनाएं वही होती हैं जो प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करती हैं, स्थानीय समुदायों की रक्षा करती हैं और दूरगामी सोच के साथ आगे बढ़ती हैं।
जलवायु परिवर्तन, जल संकट और प्रदूषण के बढ़ते दौर में भारत को पर्यावरणीय सतर्कता की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है।
कठिन सवाल पूछने वालों को चुप नहीं कराया जाना चाहिए। उनकी बात सुनी जानी चाहिए।
भारत की सबसे बड़ी पर्यावरणीय जीतें इसलिए संभव हुईं क्योंकि आम नागरिक खामोश नहीं बैठे। उन्होंने ताकतवर हितों को चुनौती दी, सरकारी फैसलों पर सवाल उठाए और यह आग्रह किया कि विकास की कीमत अपूरणीय विनाश नहीं हो सकती।
यह रुकावट नहीं है। यही लोकतंत्र का असली काम है।

Share this post

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top