नागपुर। नितिन गडकरी जी का एथेनॉल प्रेम वाकई छलांग मारकर बढ़ रहा है। ई-10 से ई-20 होते हुए ई-85 और फिर लगभग चंद दिनों में ई-100 तक का सफर हैरान कर देने वाला है। वे भारत को तेल आयात पर निर्भरता से मुक्त करना चाहते हैं, जो सराहनीय है। देश सालाना लाखों करोड़ रुपये तेल आयात पर खर्च करता है और भू-राजनीतिक तनाव (जैसे पश्चिम एशिया संकट) ने ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता बना दिया है। एथेनॉल मिश्रण से विदेशी मुद्रा बचत, किसानों को अतिरिक्त आय, रोजगार सृजन और कम प्रदूषण जैसे फायदे स्पष्ट हैं। E20 रोलआउट पहले ही लक्ष्य से पहले पूरा हो चुका है, जिससे हजारों करोड़ की बचत हुई है।
लेकिन यह तेजी परेशान भी करती है। ज्यादातर पुरानी गाड़ियां (15-20 साल पुरानी) E5-E10 के लिए बनी हैं। E20 से ही माइलेज में 3-7% की गिरावट, इंजन में संभावित जंग और परफॉर्मेंस की शिकायतें आ रही हैं। E85 या E100 के लिए फ्लेक्स-फ्यूल वाहन जरूरी हैं, जिनकी उत्पादन क्षमता, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टेशन नेटवर्क अभी सीमित है। एथेनॉल उत्पादन मुख्यतः गन्ने पर निर्भर है, जो पानी की भारी खपत करता है और खाद्य सुरक्षा (फूड vs फ्यूल) का संकट पैदा कर सकता है। 2G एथेनॉल (कृषि अपशिष्ट से) बढ़ावा अच्छा है, लेकिन स्केल अभी अपर्याप्त।
गडकरी जी चाहते हैं ऊर्जा स्वावलंबन, किसान कल्याण और हरित परिवहन। यह दूरदर्शी है, लेकिन क्रियान्वयन में सावधानी बरतनी चाहिए। पुरानी गाड़ियों के मालिकों को विकल्प दें, टैक्स छूट बढ़ाएं, इंफ्रा तैयार करें और वैज्ञानिक परीक्षण पारदर्शी रखें। ब्राजील जैसा मॉडल अपनाना अच्छा है, पर भारत की विविधता (वाहन बेड़ा, जलवायु, कृषि) को ध्यान में रखें।
एथेनॉल मार्ग सही दिशा है, लेकिन छलांग नहीं, स्थिर कदमों से आगे बढ़ना चाहिए। इससे न सिर्फ पर्यावरण बचेगा, बल्कि अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।



