क्या बुलडोजर ही समाधान है, या वास्तविक दोषियों की जवाबदेही तय होगी?

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अखिलेश चौधरी

दिल्ली । देश के अनेक शहरों और कस्बों में अनियमित अथवा अवैध कॉलोनियों का फैलता जाल आज एक गम्भीर सामाजिक, प्रशासनिक और मानवीय समस्या बन चुका है। यह समस्या किसी एक राज्य या शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों से भवन निर्माताओं, भूमाफियाओं, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक लापरवाही की साठगांठ से विकसित हुई है। सबसे दुःखद पक्ष यह है कि इस पूरे तंत्र का सबसे बड़ा पीड़ित वह गरीब और मध्यमवर्गीय व्यक्ति बनता है, जिसने जीवन भर की कमाई, ऋण और असंख्य सपनों के सहारे अपने परिवार के लिए एक छोटा-सा घर बनाया होता है।

*प्रशासनिक मौन और साठगांठ की भूमिका*

वास्तव में यह समस्या अचानक पैदा नहीं हुई है। अनेक स्थानों पर निर्माताओं और भूमाफियाओं ने बिना आवश्यक अनुमतियों, स्वीकृत मानचित्रों और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए कृषि भूमि, वन क्षेत्र अथवा प्रतिबन्धित भूखण्डों पर भूखण्ड (प्लॉट) काटकर बेच दिए। लोगों को सस्ते भूखण्ड, शीघ्र विकसित होने वाली कॉलोनियों और उज्ज्वल भविष्य के सपने दिखाए गए। रीयल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए ‘रेरा’ (RERA) जैसे कड़े कानून होने के बावजूद, ये अवैध कॉलोनियां नियामक संस्थाओं की नाक के नीचे फलती-फूलती रहीं। प्रश्न उठता है कि क्या ऐसे कानून केवल बड़े प्रोजेक्ट्स तक सीमित रह गए हैं और छोटे कस्बों या अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इनकी पहुंच शून्य है?

स्थानीय प्रशासन, विकास प्राधिकरण और संबंधित विभागों के कुछ अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय या तो आंखें मूंद लीं या फिर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से इस अवैध कारोबार को संरक्षण दिया। वर्षों तक कॉलोनियां बसती रहीं। कई कॉलोनियों के निवासी तो गृह कर (हाऊस टैक्स) का भी भुगतान करते हैं। बिजली-पानी के अस्थायी संयोजन (कनेक्शन) मिले, सड़कें बनीं, बाजार विकसित हुए और हजारों परिवार वहां रहने लगे।

*वित्तीय संस्थाओं की ढिलाई और नागरिक की विवशता*

इस पूरी प्रक्रिया में एक आम नागरिक की लाचारी और उसकी विवशता को भी समझना होगा। आज के समय में शहरों में वैध और स्वीकृत जमीनें इतनी महंगी हो चुकी हैं कि गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग की पहुंच से बाहर हैं। ऐसे में इन कॉलोनियों में निवेश करना उनकी रुचि । नहीं, बल्कि विवशता बन जाता है।

रही-सही कसर तब पूरी हो जाती है जब कई प्रतिष्ठित वित्तीय संस्थान और बैंक भी बिना पूरी जांच-पड़ताल के ऐसी सम्पत्तियों पर गृह ऋण स्वीकृत कर देते हैं। जब एक आम नागरिक देखता है कि शासकीय या प्रतिष्ठित निजी बैंक इस सम्पत्ति पर ऋण दे रहा है, तो उसका प्रशासनिक व्यवस्था पर विश्वास सुदृढ़ हो जाता है। वह स्वाभाविक रूप से यह मान लेता है कि यदि प्रशासन और बैंकों की जानकारी में सब कुछ हो रहा है, तो निश्चित रूप से सब वैध होगा। लेकिन इस धोखाधड़ी में बैंकों और वित्तीय संस्थाओं की ढिलाई या संलिप्तता की जांच कभी नहीं होती।

जब मामला न्यायालय तक पहुंचता है या प्रशासनिक कार्रवाई का समय आता है, तब बुलडोजर सीधे उन लोगों के घरों की ओर बढ़ने लगते हैं, जिन्होंने केवल अपने परिवार के लिए एक सुरक्षित छत खरीदने का प्रयास किया था। इन दिनों हरियाणा के फरीदाबाद के अनेक क्षेत्रों में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन के सन्दर्भ में प्रशासन द्वारा नोटिस दिए जा रहे हैं और मकानों को ढहाने की वास्तविक तोड़-फोड़ की कार्रवाई चल रही है। इस कार्रवाई के बाद हजारों परिवारों की सांसें अटक गई हैं। वर्षों से जिन घरों में लोग रह रहे हैं, आज वे मलबे में तब्दील हो रहे हैं।

इसके विपरीत, व्यवस्था का दूसरा विरोधाभासी चेहरा उदाहरण स्वरूप उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित इन्दिरापुरम क्षेत्र में देखने को मिलता है, जहां ग्रीन बेल्ट हिंडन नहर के साथ खेल का मैदान बनेगा, कभी मौखिक रूप से ऐसा कहा जाता था, परन्तु आज वहां अलग-अलग रूप से अवैध कब्जा बढ़ता जा रहा है। साथ ही हिंडन नदी की पेटी (डूब क्षेत्र/फ्लड प्लेन) जैसी बेहद सम्वेदनशील जगहों पर आज भी धड़ल्ले से नई बसावट हो रही है। वहां निरंतर भूखण्ड काटे जा रहे हैं, लेकिन प्रशासन शुरुआती चरण में इसे रोकने के लिए कोई कड़ा कदम नहीं उठा रहा है।

*वोट बैंक की राजनीति और नियमितीकरण के झूठे वादे*

जब खेतों में भूखण्ड काटे जा रहे होते हैं, नदियों के डूब क्षेत्रों और ग्रीन बेल्ट पर अवैध निर्माण और नई बसावटें हो रही होती हैं, रजिस्ट्रियां हो रही होती हैं, यहाँ तक कि भवनों के पार्किंग क्षेत्र में भी दुकानें बनाकर बेच दी जाती हैं, तब सम्बंधित विभाग, नगर नियोजन संस्थाएं और स्थानीय प्रशासन क्या कर रहे होते हैं? यदि निवासियों की सुरक्षा, पार्किंग की समस्या, कानून और पर्यावरण के नियमों का सरेआम उल्लंघन हो रहा है, तो समय रहते उसे शुरुआती चरण में ही क्यों नहीं रोका जाता? फरीदाबाद की तरह वर्षों तक मौन रहने वाली व्यवस्था अचानक केवल अंतिम चरण में सक्रिय होकर गरीबों के घरों पर बुलडोजर क्यों चलाती है? ऐसी जगहों पर समय रहते इस जाल को फैलने से क्यों नहीं रोकती?

इस समस्या का एक राजनीतिक पक्ष भी है। अनेक बार वोट बैंक की राजनीति और राजनीतिक संरक्षण के कारण अवैध कॉलोनियां वर्षों तक फलती-फूलती रहती हैं। चुनावों के समय इनके नियमितीकरण के वादे किए जाते हैं, जिससे आम नागरिक यह विश्वास कर बैठता है कि भविष्य में उसकी कॉलोनी को वैध दर्जा मिल जाएगा। परिणामस्वरूप लोग अपनी गाढ़ी कमाई इन क्षेत्रों में निवेश कर देते हैं। किंतु जब कानूनी संकट उत्पन्न होता है, तब वही राजनीतिक दल और व्यवस्था पीछे हट जाते हैं और वे परिवार सबसे अधिक असुरक्षित हो जाते हैं।

*डिजिटल इंडिया का अंतर्विरोध और अनियोजित विकास*

आज जब हम देश में हर छोटी-बड़ी चीज डिजिटल माध्यम से कर रहे हैं, तब जमीनों के रिकॉर्ड, खसरा-खतौनी और उनके भूमि उपयोग (Land Use) की स्पष्ट जानकारी एक क्लिक पर आम भाषा में उपलब्ध क्यों नहीं होती? शासकीय पोर्टल्स को इतना जटिल और अस्पष्ट क्यों रखा जाता है कि एक आम आदमी को दलालों और भूमाफियाओं के जाल में फंसना पड़े?

अवैध कॉलोनियों का दुष्प्रभाव केवल कानूनी विवाद तक सीमित नहीं है। ऐसी बस्तियों में रहने वाले लोग अक्सर सड़क, सीवर, स्वच्छ पेयजल, पार्क, विद्यालय और चिकित्सालय जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। अनियोजित निर्माण और हिंडन जैसी नदियों के प्राकृतिक प्रवाह/बाढ़ग्रस्त क्षेत्र व पर्यावरण के लिए संवेदनशील ग्रीन बेल्ट पर अतिक्रमण से जल निकासी की गम्भीर समस्याएं उत्पन्न होती हैं, बाढ़ का संकट बढ़ता है, पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होता है और शहरों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ता है। इसलिए नगर नियोजन और पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी इस समस्या का स्थायी समाधान आवश्यक है।

*बुलडोजर नहीं, जवाबदेही और पुनर्वास*

जहां हजारों परिवार वर्षों से रह रहे हों, वहां केवल ध्वस्तीकरण को ही एकमात्र उपाय मानना उचित नहीं है। देश की सर्वोच्च अदालत ने भी समय-समय पर यह माना है कि ‘RIGHT TO SHELTER’ (आवास का अधिकार) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक अभिन्न हिस्सा है। सिर पर छत होना मानवीय गरिमा से जुड़ा विषय है। इसलिए, जब प्रशासन अदालती आदेशों का हवाला देकर फरीदाबाद जैसी कार्रवाई करता है, तो उसे अदालतों की उस मूल भावना को भी याद रखना चाहिए जो निर्दोषों के पुनर्वास और मानवीय दृष्टिकोण की वकालत करती है। जनहित, मानवीय सम्वेदनाएं और कानूनी व्यवस्था के बीच सन्तुलन स्थापित करना अनिवार्य है।

न्याय की मूल भावना यही कहती है कि दोषी वही है जिसने अवैध कार्य किया और उसे संरक्षण दिया। इसलिए अवैध कॉलोनियां काटने वाले निर्माताओं, भूमाफियाओं तथा उन्हें शुरुआती स्तर पर ही न रोककर संरक्षण देने वाले अधिकारियों की व्यक्तिगत, आर्थिक और कानूनी जवाबदेही तय होना आवश्यक है। केवल मकान तोड़ देना समाधान नहीं है; वास्तविक दोषियों की सम्पत्तियां जब्त की जानी चाहिए और उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि गाजियाबाद के डूब क्षेत्रों जैसी नई बसावटों और भवनों में पार्किंग क्षेत्र को व्यावसायिक रूप देने जैसी गतिविधियों पर समय रहते लगाम लग सके। सरकारों को ऐसी पारदर्शी ऑनलाइन व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जहां कोई भी नागरिक किसी भूखण्ड की वैधता आसानी से देख सके। अधिकारियों के केवल स्थानांतरण या निलम्बन पर्याप्त नहीं हैं, उन पर आर्थिक उत्तरदायित्व भी सुनिश्चित होना चाहिए।

एक सभ्य समाज में गरीब का घर केवल ईंट और सीमेंट का ढांचा नहीं होता, बल्कि उसके संघर्ष, त्याग और सपनों का प्रतीक होता है। भ्रष्टाचार पर प्रहार, राजनीतिक संरक्षण की समाप्ति, दोषी निर्माताओं और अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई तथा आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा ही समाधान है। न्याय तभी पूर्ण माना जाएगा, जब दण्ड वास्तविक अपराधियों को मिले, न कि उन निर्दोष परिवारों को, जिन्होंने केवल अपने सिर पर एक सुरक्षित छत का सपना देखा था।

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