क्या पूरे झारखंड आंदोलन में नेहा बोरा अकेली लड़की थी जो पढ़ रही है और बढ़ रही है

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गंगा महतो

रांची। छात्रों के तरफ से जो डेलिगेशन गया रहा सरकार से वार्ता करने को उसमें दो लड़कियां थी। एक नीतू कुजूर और दूसरी शालू कुमारी। इसके अलावे हजारों लड़कियां वहां प्रोटेस्ट में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर रही है। कहीं भी किसी ने भी किसी भी लड़की से कोई बदतमीजी की ?

लड़कों से ज्यादा हमने लड़कियों को ही इस मामले में ज्यादा मुखर देखा है। किसी ने भी लड़कियों की बिरादरी पूछी ? उसकी जाति पूछी ? उसका धर्म पूछा ?
नहीं.. कतई नहीं.. इनसे बस इनका विचार पूछा गया.. इनकी पीड़ा सुनी गई…!
पिछले 13 दिन से छात्र/छात्राएं डटे हुए थे आंदोलन में अपनी मांगों के साथ।
एक सिंगल बदतमीजी न देखी न सुनी गई।
लेकिन 14वें दिन नेहा बोरा आती है इंटर के बच्चों के कुछ भीड़ के साथ और विधानसभा की ओर मार्च करती है। बीच मार्च में एक लड़का आता है पीछे से और इसके ऊपर स्याही डाल देता है।
अब यहां से एक अलग ही लेवल का बहस शुरू हो जाता है।
“ये वही लोग हैं जिन्होंने माता अहिल्याबाई के ऊपर कीचड़ उछाले थे, गोबर फेंके थे….!”
“ये वही लोग हैं जिन्होंने गरीबों को, दलितों को, आदिवासियों को सदियों से शिक्षा से दूर रखा है…!”
“ये वही लोग हैं जिन्होंने कभी भी एक लड़की को आगे बढ़ते हुए नहीं देख पाया है….!”
“ये वही लोग हैं जो नारियों को सशक्त हुए कभी नहीं देखना चाहते है…!”
“ये वही लोग हैं जो स्त्रियों को दासी समझते है…..!”

मने कुछ इस प्रकार से ही कई एक बातें हैं जो बोली जा रही है…!
मतलब जो लड़कियां पिछले 13 दिन से आंदोलन को सफलतापूर्वक आगे बढ़ा रही थी/है वे सशक्त लड़कियां नहीं है.. सशक्त का प्रतिरुपा ये नेहा बोरा बन गई ??
पढ़ती हुई लड़कियों के ऊपर गोबर,स्याही फेंकने वाले लोग हैं ये…! कैसे भला ?
पढ़ती हुई लड़की केवल नेहा बोरा है ?? इनको पढ़ती हुई लड़कियों का प्रतिनिधि चुना गया है ?? तो जो जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में हजारों लड़कियां आंदोलनरत हैं वे पढ़ी-लिखी  नहीं है ??
ये पढ़ी-लिखी लड़कियां पिछले 13 दिनों से अपने से 10-12 गुना ज्यादा लड़कों के बीच में आंदोलन कर रही है, फिर क्यों किसी ने इनके ऊपर को अभद्रता नहीं की ? जब ऐसे लोग पढ़ती और बढ़ती हुई लड़कियों को देख नहीं सकते तो क्यों नहीं किसी ने ऐसी हरकत की लड़कियों के साथ ??
आप नैरेटिव तो ऐसे बना रहे जैसे केवल और केवल नेहा बोरा ही अकेली एक मात्र कृति है जो पढ़ती हुई लड़की है और जो आंदोलन में 13 दिन से टिकी हुई हैं वे ज़ाहिल और गंवार हैं।
कुछ तो आपके दामन में ऐसा होगा जो आपके पीछे पड़ गया हो ?
आप उमर खालिद और शरजील इमाम जैसों को एडवोकेट करेगी.. कहेंगी कि इन्हें बस बीजेपी आईटी सेल और गोदी मीडिया ने ट्रायल करके जेल में ठूंस दिया है.. और बेल तक नहीं दी जा रही है। लेकिन ये कभी भी सुप्रीम कोर्ट का ज़िक्र नहीं करेगी जहां बेल लेने गए इनके वकील से सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि आप स्वयं से पूछिये कि ये बेल के काबिल है ??
सुप्रीम कोर्ट बेल देने से मना कर देती है। लेकिन देश के तोड़ने के मंसूबों के पाले हुए ये सपोलों के लिए ये खूब समर्थन करेगी। और इन जैसे सपोलों के लिए न्यायिक रिफॉर्म की बात करेगी।
और इसके बदले में लोग इन्हें फूल मालाओं से स्वागत करेंगे ? है न ?
हिन्दू एकत्रीकरण से इसे समस्या है.. क्योंकि यदि हिंदू एकत्रित हो गए तो फिर इस देश का मुसलमान असुरक्षित हो जाएगा। कहने का मल्लब है कि देश का मुसलमान सुरक्षित रहे इसके लिए हिंदुओं का खंडित रहना अतिआवश्यक है।
और इसी भावना के साथ ऑफकोर्स फ्री फिलिस्तीन की कट्टर समर्थक है।
बचपन से स्कूल के टेम से सुनते आ रहा हूँ एक व्यवहारिक और नैतिक ज्ञान कि ‘टांगी का घाव तो कुछ दिनों में भर जाएगा लेकिन जिह्वा से दिया गया घाव जीवन भर नहीं भरता है।’
इसलिए जिह्वा का प्रयोग सोच-समझ कर करें।
वहीं जीवन में कोई कुछ भी कहे लेकिन जन्म देने वाले माता-पिता तुमसे गर बात नहीं करते हैं तो उससे बड़ा दुख कुछ और नहीं।
सामान्य व्यवहार की बात है ये।
नेहा बोरा के पिता नेहा से पिछले 10 साल से बात नहीं किये हैं। और इस बात को नेहा पूरे गर्व के साथ चेहरे पे विजयी भाव और मुस्कान लिए बताती है कि जब से मेरे पिता जी को पता चला कि मैं लेफ्ट की विचारधारा से जुड़ी हूँ तो वे मुझसे बात नहीं कर रहे हैं और अब ऐसा हुए 10 साल हो गया है।
इसका पिता इससे पिछले 10 साल से बात नहीं कर रहा है.. ऐसा तो नहीं हुआ होगा कि बस तुम लेफ्ट की राजनीति कर रही हो तो हम तुमसे बात नहीं करेंगे, बल्कि कई मर्तबा अपने बाप के ऊपर इसी तरह चिल्लाई होगी जैसा अभी चिल्लाती है, तब जा के इसका बाप इससे बात करना बंद किया होगा।
इसको जन्म देने वाला बाप इससे 10 साल से बात नहीं कर रहा है, तो इसके बाप को कितने धुरंधरों ने लानत भेजी कि ये वही लोग हैं जो अपनी पढ़ती हुई और बढ़ती हुई लड़कियों को देखना नहीं चाहते हैं ? ये वही ऑर्थोडॉक्स बाप हैं जो स्त्रियों को ग़ुलाम बना के रखना चाहते है ?? ये वहीं लोग हैं जो स्त्रियों को पैर की जूती समझते है ??
नहीं मल्लब होना चाहिए था न ऐसा कोई नैरेटिव ??
नहीं सेट किया आप लोगों ने इसके पिता जी के ऊपर ??
और ये लड़की और इनके जैसे लोग जो अपने बाप के दस साल से बात नहीं करने को भुनाना जानती हो वो भला एक शोषणकारी उपनामधारी वाले के हाथों स्याही से नहा के चुप बैठेगी ?? अरे, वो तो बस ऐसे ही अवसर की तलाश में थी, और मिला इसे। बाप को भुनाई और अब ये शोषणकारी के स्याही को भुनायेगी जम के।
बाकी नारी हितैषियों ने दिखा दिया कि नीतू कुजूर, शालू कुमारी और तमाम हजारों लड़कियां पढ़ी-लिखी और आगे बढ़ती हुई लड़कियां नहीं है बल्कि अब ये नेहा बोरा के बोरा में मड़ुआ के दाने की तरह समा गई हैं।

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