क्या सनसनी फैलाना ही पत्रकारिता का उद्देश्य है?

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उदयपुर : राजस्थान पत्रिका ने अपने 8 जुलाई के सभी संस्करणों में प्रथम पृष्ठ पर प्रमुखता से ‘धरोहर पर प्रहार : जो काम मुगल और अंग्रेज़ नहीं कर पाए, वो एक ठेकेदार ने कर दिखाया’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया। इस समाचार में दावा किया गया कि उदयपुर के सरस्वती मंडल पुस्तकालय में स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत डिजिटलीकरण के नाम पर लगभग एक हजार दुर्लभ पुस्तकें फाड़ दी गईं और अब उन्हें दीमक खा रही है।

यह समाचार जितना आकर्षक शीर्षक के साथ प्रस्तुत किया गया, उतना ही आवश्यक था कि उसके तथ्य भी पूरी तरह सत्यापित होते। दुर्भाग्य से इस मामले में कई महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की गई।

वास्तविकता यह है कि स्मार्ट सिटी परियोजना के अंतर्गत सरस्वती मंडल पुस्तकालय में सुरक्षित दुर्लभ एवं ऐतिहासिक पुस्तकों का डिजिटलीकरण किया जाना था। इसके लिए नगर निगम द्वारा विधिवत निविदा जारी की गई और पटना की एक फर्म को यह कार्य सौंपा गया।

डिजिटलीकरण की प्रक्रिया में पुरानी पुस्तकों की जिल्द (बाइंडिंग) सावधानीपूर्वक खोली जाती है, ताकि प्रत्येक पृष्ठ को अलग-अलग स्कैन किया जा सके। यह पुस्तक संरक्षण और डिजिटलीकरण की दुनिया में एक सामान्य एवं स्वीकृत तकनीकी प्रक्रिया है। स्कैनिंग पूर्ण होने के बाद पुस्तकों की पुनः बाइंडिंग (रीबाइंडिंग) की जाती है।

किन्तु उदयपुर के इस प्रकरण में स्कैनिंग के बाद संबंधित फर्म और स्मार्ट सिटी परियोजना के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। परिणामस्वरूप फर्म कार्य अधूरा छोड़कर चली गई और पुस्तकों की रीबाइंडिंग नहीं हो सकी। यह पूरा घटनाक्रम वर्ष 2022 का है।

इसके बाद पुस्तकालय प्रशासन ने सभी खुली हुई पुस्तकों को सुरक्षित रूप से समेटकर अलमारियों में संरक्षित रख दिया, ताकि भविष्य में जब किसी नई एजेंसी को यह कार्य सौंपा जाए तो उनकी रीबाइंडिंग कराई जा सके। पुस्तकालय द्वारा इस संबंध में स्मार्ट सिटी अधिकारियों से लगातार पत्राचार भी किया गया, किन्तु आवश्यक कार्रवाई नहीं हुई और परियोजना का पहला चरण समाप्त हो गया।

ऐसी स्थिति में यह कहना कि “एक हजार किताबें फाड़ दी गईं”, वस्तुस्थिति का सही चित्रण नहीं है। किसी पुस्तक की जिल्द को तकनीकी आवश्यकता के तहत खोलना और पुस्तक को नष्ट कर देना—दोनों अलग-अलग बातें हैं। यदि रीबाइंडिंग नहीं हुई तो यह निश्चित रूप से प्रशासनिक लापरवाही और परियोजना के अधूरे क्रियान्वयन का विषय है, लेकिन इसे पुस्तकों को “फाड़ देना” कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं कहा जा सकता।

इसी प्रकार यह लिखना कि “अब उन्हें दीमक खा रही है” भी अत्यधिक सनसनीखेज प्रस्तुति प्रतीत होती है। पुस्तकालय प्रशासन के अनुसार पुस्तकें सुरक्षित अलमारियों में रखी गई हैं और उनकी रीबाइंडिंग आज भी संभव है, जिसे शीघ्र कराने की प्रक्रिया की जा रही है।

निस्संदेह यह मामला गंभीर है। परियोजना अधूरी रहना, वर्षों तक रीबाइंडिंग न होना और प्रशासनिक उदासीनता—ये सभी प्रश्न उठाते हैं। इन पर कठोर और तथ्याधारित पत्रकारिता होनी चाहिए। लेकिन यदि तकनीकी प्रक्रिया को “धरोहर पर प्रहार” और “किताबें फाड़ दी गईं” जैसे शीर्षकों में बदल दिया जाए, तो इससे पाठकों तक वास्तविक स्थिति के बजाय एक भ्रामक और अतिरंजित तस्वीर पहुँचती है।

पत्रकारिता का मूल धर्म तथ्यों को सामने लाना है, न कि उन्हें सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करना। प्रश्न यह भी है कि क्या किसी प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादकीय स्तर पर ऐसे शीर्षकों और दावों का पर्याप्त तथ्य परीक्षण नहीं होना चाहिए था? क्या डिजिटलीकरण की मानक प्रक्रिया को समझे बिना उसे “किताबें फाड़ना” कहना उचित है?

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए समाचारों में संवेदनशील विषयों पर तथ्य, तकनीकी प्रक्रिया और सभी पक्षों का समुचित परीक्षण होना चाहिए। आलोचना अवश्य हो, लेकिन वह तथ्यों पर आधारित हो, ताकि जनविश्वास भी बना रहे और वास्तविक जिम्मेदारी भी तय हो सके।

(नवल पांडेय के सोशल मीडिया पेज से साभार)

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