हर बेटी राजकुमारी होती है और हर पिता राजा। लेकिन शैलेश लोढ़ा और स्वाति लोढ़ा ने इस सत्य को एक भव्य उत्सव का रूप दे दिया। जोधपुर के उमैद पैलेस और आसपास के वातावरण में कई दिनों तक चला यह विवाह समारोह पारंपरिक रीति-रिवाजों को कलात्मकता के रंग में रंगकर एक नया आयाम दे गया। शादी की शुरुआत मुशायरे से हुई और फेरों के बाद समापन कवि सम्मेलन से। बीच के दिनों में शिव पुराण, रामचरितमानस और गीत गोविंद के प्रसंगों को ब्रॉडवे-स्टाइल म्यूजिकल नाटक के रूप में प्रस्तुत किया गया। मंच पर संगीत, अभिनय और काव्य एक साथ गूंजे, जैसे पूरा महल किसी जीवंत कलाकृति में बदल गया हो।

इस आयोजन की सबसे खास बात यह थी कि यह केवल एक परिवार का उत्सव नहीं रहा। देश भर के प्रमुख कवियों को एकत्र कर शैलेश जी ने इसे ‘कवियों की बेटी की शादी’ बना दिया। साहित्यकारों का कार्निवल सा माहौल था, जहाँ मेहमानों को उपहार स्वरूप किताबें दी जा रही थीं। साहित्य, संगीत, पत्रकारिता और सिनेमा के दिग्गज एक छत के नीचे थे। बॉलीवुड अभिनेता विक्की कौशल बड़े भाई की ममता से मुख्य द्वार पर खड़े होकर बारात का स्वागत कर रहे थे — हाथ जोड़े, मुस्कान बिखेरते। उदयपुर के महाराजा लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ और महारानी निवृत्ति कुमारी मेवाड़ की आत्मीय आवभगत ने मेहमानों को राजसी एहसास कराया।
शैलेश लोढ़ा स्वयं एक बहुमुखी व्यक्तित्व हैं – अभिनेता, कवि, संवेदनशील इंसान। उनकी पत्नी स्वाति के साथ मिलकर उन्होंने इस शादी को यादगार बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। पिछले एक साल से चल रही तैयारियों में उनके करीबी दोस्तों को भी योगदान देने का मौका मिला। यही कारण है कि यह आयोजन भावनात्मक रूप से भी गहरा था। स्वरा और शाश्वत का रिश्ता बचपन की दोस्ती से शुरू होकर प्रेम में बदल चुका था। उनकी शादी में प्रेम-गीतों की धुन हर कोने में गूंजती रही।

यह शादी भारतीय कलाओं का उत्सव थी। एक तरफ़ राजस्थानी परंपराओं की रौनक, दूसरी तरफ़ आधुनिक कलात्मक प्रस्तुतियाँ। कवि सम्मेलन में देश के नामचीन शायरों की कविताएँ सुनकर लगा कि शब्दों में भी कितनी ताकत है। संगीत के कार्यक्रमों में भक्ति और प्रेम दोनों का मिलन था। नाट्य प्रस्तुतियाँ इतनी प्रभावशाली थीं कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते। पूरा माहौल ऐसा था कि हर मेहमान खुद को इस महोत्सव का हिस्सा महसूस कर रहा था।
शैलेश जी और स्वाति जी की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि इस भव्यता के बीच भी उन्होंने हर मेहमान का व्यक्तिगत ध्यान रखा। कोई छोटी-बड़ी इच्छा अनसुनी नहीं हुई। राजसी ठाठ-बाट के साथ-साथ पारिवारिक स्नेह और आत्मीयता का संतुलन उन्होंने बखूबी बनाए रखा। यही कारण है कि यह शादी न सिर्फ़ स्वरा-शाश्वत की, बल्कि उन सभी लोगों की यादों में बस गई जो इसमें शामिल हुए।

ईश्वर स्वरा और शाश्वत के प्रेम को शाश्वत बनाए रखे। महादेव से यही प्रार्थना है कि उनका गृहस्थ जीवन भी कविता और संगीत से भरा रहे। शैलेश लोढ़ा जैसे पिता, जो अपनी बेटी को राजकुमारी की तरह संजोते हैं, समाज को प्रेरणा देते हैं कि रिश्तों को भी कलाकृति की तरह गढ़ा जा सकता है।
जोधपुर की इस शादी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जब करने वाले कलाकार हों, तो शादी महज़ एक संस्कार नहीं, बल्कि कला का महोत्सव बन जाती है। स्वरा-शाश्वत को अनंत सुख की कामना।



