प्रोफेसर रमा शर्मा
दिल्ली । गुरुदेव की ढाई घंटे की कक्षा… और स्मृतियों में लौटता हुआ एक विद्यार्थी मन
कुछ अवसर हमें हमारे अपने अतीत से मिला जाते हैं। आज हंसराज कॉलेज में आयोजित ‘लोकवादी तुलसीदास’ विषयक कार्यक्रम मेरे लिए ऐसा ही एक अवसर था। आज पूज्य गुरुदेव आचार्य प्रो. विश्वनाथ त्रिपाठी जी को सुनते हुए न जाने कितनी बार लगा कि मैं हंसराज कॉलेज के मंच पर नहीं अपने एम.ए. के दिनों की किसी कक्षा में बैठी हूँ। वही आत्मीयता, वही सहज भाषा, वही गहराई और सबसे बढ़कर प्रश्नों के प्रति वही अद्भुत धैर्य।
लगभग ढाई घंटे तक गुरुदेव विद्यार्थियों के बीच रहे। समय जैसे अपनी गति भूल गया था। विद्यार्थी लगातार प्रश्न पूछते रहे और गुरुदेव उतनी ही सहजता से उनके भीतर उतरते हुए उत्तर देते रहे। निर्गुण क्या है, सगुण क्या है? ‘लोकवादी तुलसीदास’ की रचना-प्रक्रिया क्या थी? तुलसी के ‘लोक’ को किस अर्थ में समझा जाए? रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी की आलोचना-दृष्टि में क्या अंतर है? और ‘ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी…’ जैसी बहुचर्चित पंक्ति को उसके संदर्भ और अर्थ के साथ कैसे समझा जाए? एक के बाद एक प्रश्न आते रहे और गुरुदेव के उत्तर केवल उत्तर नहीं थे वे साहित्य को देखने की नई खिड़कियाँ खोलते जाते थे।
आज विद्यार्थियों के चेहरों पर जो उत्सुकता थी, उसे देखकर मन भीतर तक प्रसन्न हुआ। प्रश्नों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण यह था कि वे प्रश्न पूछने से संकोच नहीं कर रहे थे। और एक शिक्षक के लिए इससे सुंदर दृश्य शायद ही कोई हो कि उसके विद्यार्थी किसी महान विद्वान के सामने बैठकर अपनी जिज्ञासाओं को शब्द दे रहे हों। आज की इस पूरी कक्षा में मुझे अपने विद्यार्थी जीवन की वह बेचैनी याद आती रही, जब साहित्य पढ़ना केवल परीक्षा की तैयारी नहीं अपने आसपास की दुनिया को समझने का एक रास्ता हुआ करता था।
कार्यक्रम के आरंभ में मैंने कहा था कि आचार्य विश्वनाथ त्रिपाठी जी की उपस्थिति किसी भी साहित्यिक आयोजन के लिए अपने आप में एक उपलब्धि है। आज उन्हें सुनने के बाद लगा कि यह बात कहना जितना सरल था, उसकी अनुभूति करना उससे कहीं अधिक गहरा। आचार्य जी की आलोचना की सबसे बड़ी शक्ति शायद यही है कि वे साहित्य को केवल पाठ की तरह नहीं, जीवन की तरह पढ़ते हैं। उनके यहाँ विद्वत्ता है, लेकिन विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं; गहराई है, लेकिन बोझिलता नहीं; प्रश्न हैं, लेकिन निष्कर्ष थोपने की अधीरता नहीं। वे हमें केवल यह नहीं बताते कि किसी रचना को कैसे पढ़ना चाहिए, बल्कि यह सोचने के लिए विवश करते हैं कि हमने उसे अब तक किस तरह पढ़ा है।
और तुलसी पर उन्हें सुनना तो अपने आप में एक अलग अनुभव था। तुलसी को केवल भक्तिकाल के कवि के रूप में देखना उनके विराट रचनात्मक व्यक्तित्व को सीमित करना है। तुलसी के यहाँ लोक है, मनुष्य है, समाज है, संघर्ष है, आस्था है, करुणा है और लोकमंगल की आकांक्षा है। शायद इसी व्यापक अर्थ में ‘लोकवादी तुलसीदास’ को समझने की आवश्यकता है। आज गुरुदेव की बातों में बार-बार यह अनुभव हुआ कि परंपरा को समझने का अर्थ उसे आँख मूँदकर स्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके साथ गंभीर संवाद करना है। तुलसी हमारे लिए इसलिए जीवित हैं कि वे केवल अतीत के कवि नहीं हैं; वे आज भी हमारे सामाजिक, नैतिक और मानवीय प्रश्नों के सामने खड़े किए जा सकते हैं।
यह पोस्ट लिखते हुए भी गुरुदेव की बातें बार-बार याद आ रही हैं। उनके कहे हुए वाक्य, प्रश्नों के उत्तर देने का उनका ढंग, बीच-बीच में आने वाली सहज मुस्कान और कठिन से कठिन साहित्यिक प्रश्न को इतने आत्मीय ढंग से समझा देना सब कुछ जैसे अभी सामने घट रहा हो। आज की यह ढाई घंटे की कक्षा समाप्त हो गई, लेकिन मन में लगता है कि कक्षा अभी समाप्त नहीं हुई है। कुछ शिक्षक कक्षा लेते हैं, कुछ शिक्षक विषय समझाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जो कक्षा समाप्त होने के बाद भी आपके भीतर बोलते रहते हैं। आचार्य विश्वनाथ त्रिपाठी जी उन्हीं विरल गुरुओं में से हैं।
आज उन्हें सुनते हुए अपने विद्यार्थी जीवन की स्मृतियों में लौटना मेरे लिए केवल भावुक अनुभव नहीं था; यह इस बात का एहसास भी था कि एक सच्चा गुरु समय के साथ पुराना नहीं होता, वह आपकी स्मृतियों में और अधिक गहरा होता जाता है। आज हंसराज कॉलेज के विद्यार्थियों को गुरुदेव के सान्निध्य में बैठते देखकर मन में एक संतोष भी था जो अनुभव कभी हमें मिला था, वही आज एक नई पीढ़ी को मिल रहा है। यही तो परंपरा का सबसे सुंदर रूप है ज्ञान का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचना और हर पीढ़ी में उसका नए अर्थों के साथ जीवित हो उठना।
तुलसी जयंती के इस अवसर पर इससे सुंदर क्या होगा कि तुलसी को केवल याद न किया जाए, बल्कि उन पर प्रश्न किए जाएँ उन्हें केवल पढ़ा न जाए, बल्कि समझा जाए और साहित्य को केवल पुस्तकों में न छोड़ा जाए, बल्कि जीवंत संवाद का हिस्सा बनाया जाए। हिंदी साहित्य परिषद और हिंदी विभाग को इस अत्यंत सार्थक आयोजन के लिए हार्दिक बधाई।
और पूज्य गुरुदेव, आपका हंसराज कॉलेज आना हमारे लिए केवल एक साहित्यिक आयोजन की गरिमा नहीं बढ़ाता यह हमारे विद्यार्थियों और हम जैसे आपके शिष्यों की स्मृतियों को भी एक बार फिर रोशन कर देता है। आज की इस कक्षा के लिए, आज की इन स्मृतियों के लिए और उन अनगिनत प्रश्नों के लिए जो आपके जाने के बाद भी हमारे भीतर जीवित हैं।
सादर प्रणाम, गुरुदेव



