गोविंद सिंह
दिल्ली। अंततः स्पैन पत्रिका बंद हो गई। शीत युद्ध की अंतिम निशानी ढह गई। मुझे यह श्रद्धांजलि इसलिए लिखनी पड़ रही है क्योंकि शुरुआत में हिंदी स्पैन का दो वर्ष तक संपादन करने का अवसर मुझे भी मिला था। अमेरिकी राजनीति, समाज, संस्कृति, कूटनीति और पत्रकारिता को करीब से जानने समझने का मौका मिला था। मेरे लिए यह समय किसी फेलोशिप की तरह था। जब आराम कुछ ज्यादा होने लगा तो मैं ने यह नौकरी छोड़ दी।

अंग्रेजी स्पैन 1960 में तब शुरू हुई थी जब दुनिया दो ध्रुबों में बंटी हुई थी। सोवियत संघ और अमेरिका की तरफ से एक दूसरे खेमे के खिलाफ सूचना युद्ध छिड़ा रहता था। सोवियत संघ की तरफ से सोवियत संघ, सोवियत नारी और स्पुतनिक जैसे पत्रिकाएं बहुत ही चिकने कागज में छपती थीं। इनमें लेख बहुत अच्छे नहीं होते लेकिन सस्ती और बढ़िया कागज होने से लोग इन्हें सब्सक्राइब करते। इनका सबसे बेहतर उपयोग कॉपी किताब के जिल्द लगाने में होता था। ये पत्रिकाएं कई भाषाओं में छपती थीं। इनकी तुलना में अमेरिका की तरफ से सिर्फ स्पैन ही छपती, वह भी सिर्फ अंग्रेजी में। लेकिन गुणवत्ता में कहीं बेहतर। यह पेशेवर तरीके से निकलती थी और इसकी कीमत भी अपेक्षाकृत अधिक होती। यह अमेरिकी समाज और संस्कृति का बढ़िया गुलदस्ता था।
’90 के दशक में शीत युद्ध खत्म हुआ तो सोवियत पत्रिकाएं बंद हो गई। लगा कि अब अमेरिकी पत्रिका भी बंद हो जाएगी। हो भी जाती, लेकिन इसी बीच 9/11 हो गया। अमेरिकी सरकार को लगा कि मुस्लिम समाज में पहुंच बढ़ाई जाए। हिंदुस्तान एक ऐसा देश था, जहां दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती थी। इसलिए अंग्रेजी के साथ उर्दू स्पैन निकालने का फैसला हुआ। इस तरह 2002 में उर्दू स्पैन निकली लेकिन साथ में हिंदी स्पैन भी निकालनी पड़ी।
अब सुनाई दे रहा है कि तीनों पत्रिकाएं और इंटरनेट संस्करण बंद हो गए हैं। पब्लिक डिप्लोमैसी में और भी छंटनी कर दी गई है। हालांकि बाहर हुए कर्मचारियों को ठीक-ठाक मुआवजा मिला है, लेकिन नौकरी तो चली ही गई।



