– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दिल्ली । लोकतंत्र में अपनी बात कहने का अधिकार हर नागरिक को है। सत्ता के फैसलों से असहमति हो, किसी संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना हो या चुनावी प्रक्रिया की शिकायत हो, जनता को आवाज उठाने का पूरा अधिकार है। मगर जब विरोध की कीमत वे लोग चुकाने लगें जिनका उस विवाद से कोई संबंध नहीं, तब आंदोलन के तरीके पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के 10 अक्टूबर के प्रदर्शन ने यही बहस देशभर में खड़ी कर दी है। पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरोध में दिल्ली में प्रदर्शन कर रही है। राजधानी में संभावित भीड़, जाम और सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए रेलवे ने बड़े पैमाने पर ट्रेनें रद्द कीं और कई के समय व मार्ग बदले।
रेलवे ने नौ अक्टूबर को दोपहर दो बजे के बाद अपने मूल स्टेशनों से चलने वाली वे सभी मेल/एक्सप्रेस ट्रेनें रद्द कर दी गईं, जो 10 अक्टूबर को सुबह चार बजे से दोपहर दो बजे के बीच नई दिल्ली या हजरत निजामुद्दीन पहुंचने वाली थीं। उत्तर रेलवे की दिल्ली क्षेत्र में 170 यात्री ट्रेनें भी रद्द रहीं। कुल 245 ट्रेनों के रद्द होने की जानकारी आई है, जिनमें 75 मेल-एक्सप्रेस और 170 पैसेंजर गाड़ियां शामिल हैं। कई ट्रेनों के समय बदले गए और कुछ को बीच के स्टेशनों तक सीमित किया गया।
वस्तुत: स्टेशनों पर इसका असर साफ दिखा। जम्मू में यात्री फंसे रह गए। कानपुर में एक यात्री को दिल्ली के लिए सीधी ट्रेन न मिलने पर पहले 50-60 किलोमीटर बस से जाना और फिर ट्रेन पकड़ना पड़ा। एक युवक ने कहा कि टिकट पाना पहले ही कठिन है और अब कन्फर्म टिकट के बाद भी ट्रेन रद्द हो गई। बेंगलुरु से चलनेवाली ट्रेनों के भोपाल से रास्ता बदल दिया गया, जिन्हें आगे अपने घर पहुंचना था, मजबूरी में उन्हें बीच रास्ते में ट्रेन से उतरकर अब सड़क मार्ग से अपनी यात्रा करनी पड़ रही है। इस तरह से देश के कई राज्यों के मिलाकर लाखों यात्री परेशान हुए हैं। हर यात्री के साथ उसका परिवार, उसका काम और उसकी योजनाएं भी जुड़ी होती हैं, स्वभाविक है सबकुछ प्रभावित हुआ है।
अब जो लोग संविधान की दुहाई देकर यह सब कुछ देश भर में अराजकता का माहौल खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं, उनके लिए यहां यह भी देख लेते हैं कि संविधान क्या कहता है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है और 19(1)(बी) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार। लेकिन अनुच्छेद 19(3) सार्वजनिक व्यवस्था के हित में इस पर युक्तियुक्त प्रतिबंध की व्यवस्था करता है। अनुच्छेद 51ए(आई) हर नागरिक का मौलिक कर्तव्य बताता है कि वह सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करे और हिंसा से दूर रहे।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी संतुलन की यही रेखा खींची है। रामलीला मैदान मामले (2012) में कहा गया कि शांतिपूर्ण सभा मौलिक अधिकार है, पर उस पर कानून सम्मत प्रतिबंध लग सकते हैं। मजदूर किसान शक्ति संगठन (2018) में प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान और संतुलित नियमों की बात हुई। अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (2020), यानी शाहीन बाग मामले, में न्यायालय ने सार्वजनिक मार्गों पर अनिश्चितकालीन कब्जे को अस्वीकार्य बताया, इसलिए विरोध के अधिकार से अधिक महत्व इस बात का है कि उसके असर का परिणाम आखिर क्या सामने आता है।
वस्तुत: जिस यात्री की ट्रेन रद्द हुई, वह मरीज, बुजुर्ग, परीक्षार्थी, मजदूर या परिवार के साथ यात्रा करने वाला कोई भी हो सकता है। उसके लिए एक दिन की देरी नौकरी, इलाज या परीक्षा पर भारी पड़ सकती है। आंदोलन का उद्देश्य जनसमर्थन जुटाना होता है। यहां तो जिस जनता से समर्थन लेना है, वही परेशान होती हुई नजर आ रही है।
जिस मुद्दे को लेकर यह अराजकता देश में राहुल गांधी, सीजेपी एवं अन्य नेता फैला रहे हैं, उन्हें भी जानना चाहिए कि संविधान आखिर कहता क्या है, अनुच्छेद 324 मतदाता सूची तैयार करने और चुनाव के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग को सौंपता है। अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार का आधार है, जिसके तहत 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के हर नागरिक को मतदाता बनने का अधिकार है, इसलिए पात्र का नाम सूची में रहना और अपात्र प्रविष्टियों का हटना, दोनों जरूरी हैं, और त्रुटिवश कटे नाम को सुधारने का अवसर भी हमेशा रहता ही है।
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग का संवैधानिक पक्ष भी इन आन्दोलनजीवियों को देखना चाहिए । अनुच्छेद 324(5) के अनुसार उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की तरह ही संसद की निर्धारित प्रक्रिया से हटाया जा सकता है। यह व्यवस्था आयोग की स्वतंत्रता के लिए है। इसका अर्थ यह नहीं कि आयोग सवालों से परे है, पर इस्तीफे की मांग को प्रमाणों का आधार चाहिए। यदि किसी संगठन के पास पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटने के सबूत हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। अनुच्छेद 32 सर्वोच्च न्यायालय और अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों में सीधे जाने का रास्ता भी देता है। सड़क और अदालत, दोनों रास्ते साथ चल सकते हैं, पर तथ्य दोनों में जरूरी हैं।
आज हो क्या रहा है! जो संगठन मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा का दावा करता है, उसके आचरण में आम नागरिकों के अधिकारों, यानी आने-जाने, इलाज पाने और समय पर पहुंचने के अधिकार, के प्रति भी संवेदनशीलता दिखनी चाहिए थी, वह गायब है।
लोकतंत्र में अधिकार मांगने वाले से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह दूसरों के अधिकारों का भी सम्मान करेंगे। दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके, सह-संयोजक सौरव दास और प्रवक्ता आशुतोष रांका की हिरासत से जुड़ा घटनाक्रम इसे और खुलकर स्पष्ट करता है। ये सभी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के विरोध में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली पहुंचे थे।
इस दौरान विमान में सवार दूसरे यात्रियों को भी इंतजार करना पड़ा। एक यात्री की नाराजगी में कहा कि वह नहीं जानता कौन है अभिजीत दिपके, लेकिन उसके कारण से हमें परेशानी उठानी पड़ रही है। यदि जनता को ही हर समस्या के समाधान के लिए संघर्ष करना है, तो न्यायालयों और स्थापित संस्थाओं की भूमिका क्या है?
वस्तुत: विमान में मौजूद यात्री की यह टिप्पणी कि जनता ही सब कुछ करेगी, तो न्यायालय बंद कर दी जाएं, मौजूदा परिस्थितियों पर तीखी प्रतिक्रिया है। इसमें व्यवस्था के प्रति आम नागरिक की अपेक्षा भी दिखती है। लोग चाहते हैं कि विवादों का समाधान निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से हो और सार्वजनिक जीवन सामान्य गति से चलता रहे।संविधान ने विभिन्न संस्थाओं को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी हैं। अत: आजजन का संदेश साफ है। विरोध कीजिए, मांगें मजबूती से रखिए, गड़बड़ी के आरोप हैं तो प्रमाण दीजिए और जिम्मेदार संस्थाओं से जवाब मांगिए, पर यह भी सुनिश्चित कीजिए कि आपकी लड़ाई का बोझ उन लाखों-करोड़ों नागरिकों पर न पड़े, जिनका उस विवाद से कोई संबंध ही नहीं है।



