विपक्ष के नेता की जिम्मेदारी सिर्फ आरोप लगाना नहीं है। लोकतांत्रिक मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। जब सामने वाला पक्ष बड़ी घटना चाहता हो और अफवाहें फैलाई जा रही हों, तब भी पुलिस ने हिंसा का आसान रास्ता नहीं चुना। दबाव में संयम रखना आसान नहीं होता। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में राहुल गांधी को युवा कार्यकर्ताओं की सुरक्षा और शांति का ध्यान रखना चाहिए, ताकि बाहरी राज्यों से आए युवक अनावश्यक शिकार न बनें और आंदोलन संवैधानिक सीमा में रहे। दिल्ली पुलिस की सावधानी सराहनीय रही।
लेकिन ऐसे समय में राहुल गांधी ने क्या किया? वे खुद तमिलनाडु चले गए। कांग्रेस पार्टी कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार चार-पांच सौ एनएसयूआई और कॉकरोच से जुड़े लोगों को वहां पनाह दी गई। बंगला साहिब गुरुद्वारे में भी एक हजार से अधिक पंजाब स्टूडेंट यूनियन और आम आदमी पार्टी के पंजाब से आए कार्यकर्ता छुपे हुए थे। यह बात तब सामने आई जब एक बड़ा जत्था अचानक गुरुद्वारे से निकलकर संसद की तरफ बढ़ा। पुलिस ने लाठी चार्ज किया तो बड़ी संख्या में लोग बचने के लिए गुरुद्वारे के अंदर भागे। सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें नहीं रोका। उनके पीछे दिल्ली पुलिस पहुंची तो उसे वापस कर दिया गया। गुरुद्वारे में उमर खालिद का पोस्टर भी लहराया गया।
गुरुद्वारा बंगला साहिब आज लगातार खबरों में रहा। वहां उमर खालिद का पोस्टर लेकर लोग अंदर जा रहे थे। ये कौन लोग थे, जिन्हें सुरक्षाकर्मियों ने रोका तक नहीं? क्या उनकी ड्यूटी सिर्फ दिल्ली पुलिस को रोकने तक सीमित थी? बंगला साहिब प्रबंधन बता सकता है कि बिना सिर ढंके गुरुद्वारे में प्रवेश नहीं दिया जाता, फिर आज इतनी बड़ी भीड़ बिना सिर ढंके कैसे अंदर चली गई?

प्रोटेस्ट का अधिकार देश के हर नागरिक को मिलना चाहिए। एक तय स्थान होना चाहिए जहां कोई भी अपनी बात कह सके। जंतर मंतर कभी इतना ऊर्जावान स्थान था कि पत्रकारों के बीच बात होती थी कि यह अपने आप में एक बिट बन जाए। आज यह अराजकता का पर्याय बन गया है, इसलिए वहां प्रदर्शन की अनुमति मिलना भी मुश्किल हो गया है। विरोध संवैधानिक सीमा में रहे, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है।



