मनोज श्रीवास्तव जी का लोकमंथन पर अति सुंदर विश्लेषण……

images-1.png

भोपाल। अभी दो दिनों पहले दिल्ली के एक विश्वविद्यालय से दो बच्चे ‘लोकमंथन’ पर मेरा साक्षात्कार करने आए थे। वे कोई शोध कर रहे हैं।

‘लोकमंथन’ 2016 में भोपाल से शुरू हुआ था और अब उसका एक दशक हो गया है। उसके बाद बिहार में राँची, असम में गौहाटी और आंध्र में हैदराबाद में यह आयोजित हो चुका है। इस वर्ष राजस्थान के जयपुर में यह आयोजन होना है।

बच्चों ने ‘लोकमंथन’ की अवधारणा पर मेरी दृष्टि पूछी। मैंने कहा दो कारण थे- एक तो लोक और शास्त्र को आपस में लड़ाने वालों के एजेंडे का मुक़ाबला करना। दूसरे लोक और राज्य के बीच की दूरी के किलोमीटर कम करना।

लोकमंथन ने जिस एक प्रश्न को सबसे अधिक तीव्रता से उठाया है, वह है — शास्त्र और लोक के बीच खड़ी की गई वह दीवार, जो वस्तुतः कभी थी ही नहीं, किंतु समय के प्रवाह में, विशेषतः औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा के अधीन, निर्मित कर दी गई।

पाणिनीय व्याकरण की दृष्टि से देखें तो “शास्त्र” शब्द “शासु अनुशिष्टौ” धातु से “ष्ट्रन्” प्रत्यय द्वारा निष्पन्न होता है — जिसका अर्थ है अनुशासन देना, मार्गदर्शन करना, व्यवस्थित करना। ध्यातव्य है कि यह धातु स्वयं में कोई स्वतःसिद्ध सामग्री नहीं रचती, वह केवल पहले से विद्यमान अनुभव-राशि को अनुशासित करती है, उसे सूत्रबद्ध करती है। दूसरी ओर “लोक” शब्द “लोकृ दर्शने” धातु से बनता है — देखना, अवलोकन करना, प्रत्यक्ष अनुभव करना। यहीं से यह भेद स्पष्ट होता है कि लोक अनुभव का प्रथम स्रोत है और शास्त्र उस अनुभव का अनुशासित, सूत्रबद्ध, संप्रेषणीय रूप। अर्थात् व्युत्पत्ति के स्तर पर ही शास्त्र लोक का शत्रु नहीं, उसका परिष्कार है — जैसे नदी का जल और उसका तट एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु तट जल को दिशा और मर्यादा देता है, जल के अस्तित्व को नकारता नहीं।

पाणिनि स्वयं इस बात के सबसे बड़े प्रमाण हैं। अष्टाध्यायी में “लोकतः” एक स्वतंत्र प्रमाण के रूप में स्वीकृत है — अर्थात् जहाँ शास्त्रीय नियम मौन हों अथवा लोक-व्यवहार से टकराते हों, वहाँ लोक-प्रयोग को ही अंतिम प्रमाण माना गया है। पतंजलि के महाभाष्य में यह सिद्धांत बारंबार दुहराया गया है कि “लोकतः अर्थप्रत्यायनम्” — अर्थ का निर्णय अंततः लोक-व्यवहार से ही होता है, शास्त्र केवल उस व्यवहार को संहिताबद्ध करने का साधन है। यह अत्यंत मार्मिक तथ्य है कि भारत के सर्वाधिक कठोर व्याकरण-शास्त्र ने भी अपने प्रमाणों के शिखर पर लोक को ही प्रतिष्ठित किया, शास्त्र को नहीं। जो परंपरा स्वयं अपनी सर्वाधिक तकनीकी अनुशासन-पद्धति में लोक को अंतिम न्यायाधीश मानती हो, उस परंपरा में शास्त्र और लोक का शत्रुभाव कल्पना करना ही मूल स्रोत से विचलन है। पर लोक के नाम पर मनचाही कहानियाँ गढ़कर उससे शास्त्र को टकराने का मि श न भी चल रहा है। उसके प्रति सावधान रहना होगा। नहीं तो बिहार की असुर जनजाति की एक कन्वर्टेड युवती के कथन के आधार पर दिल्ली के विश्वविद्यालय महिषासुरमर्दिनी को सेक्स वर्कर कहने लगेंगे।

वेद को यदि हम “अपौरुषेय श्रुति” कहकर उसकी शास्त्रीयता पर बल दें, तब भी यह विस्मृत नहीं करना चाहिए कि ऋचाएँ मूलतः मौखिक परंपरा में गीत के रूप में जीवित थीं। ऋग्वेद की अनेक ऋचाएँ — विशेषतः विवाह-सूक्त, अक्षसूक्त (जुआरी का विलाप), संवाद-सूक्त (यम-यमी, पुरूरवा-उर्वशी) — अपनी संरचना में लोक-गीतों की स्मृति सुरक्षित रखती हैं। अक्षसूक्त तो प्रत्यक्षतः एक जुआरी के आत्मकथन जैसा है, जिसकी वेदना और पश्चाताप किसी भी लोक-गाथा के नायक के समान है। यह तथ्य दर्शाता है कि श्रुति-परंपरा ने लोक-अनुभव को बहिष्कृत नहीं किया, अपितु उसे अपने भीतर समाहित करके उसे शाश्वत प्रतिष्ठा दी।

इसी क्रम में यास्क के निरुक्त में “लौकिक” और “वैदिक” प्रयोगों के बीच निरंतर तुलना की गई है, किंतु यह तुलना कहीं भी लौकिक को हेय सिद्ध करने के लिए नहीं, अपितु वैदिक अर्थ को स्पष्ट करने के लिए लौकिक दृष्टांत के सहारे की गई है। यह पद्धति स्वयं सिद्ध करती है कि प्राचीन आचार्यों के लिए लोक-व्यवहार अर्थनिर्णय का सहायक साधन था, तिरस्करणीय वस्तु नहीं।

पुराण-परंपरा तो और भी स्पष्ट उदाहरण है। पुराणों को परंपरागत रूप से “पञ्चमवेद” कहा गया, किंतु उनकी भाषा, शैली और श्रोतृवर्ग शुद्धतः लौकिक थे — सूत जैसे सूतवंशीय कथावाचकों के मुख से जनसाधारण तक पहुँचने वाला यह साहित्य श्रुति और लोक के बीच का सेतु है, कोई तीसरी पृथक् कोटि नहीं। पुराण यह प्रमाणित करते हैं कि भारतीय परंपरा ने ज्ञान के प्रवाह को कभी एकदिश नहीं माना — शास्त्र से लोक की ओर उतरता भी है, और लोक से शास्त्र की ओर उठता भी है।

नाट्यशास्त्र में भरत मुनि ने संगीत और नृत्य की दो धाराओं का उल्लेख किया — मार्गी और देशी। यह वर्गीकरण अत्यंत सूक्ष्म है और यहीं आधुनिक पाठक प्रायः भ्रमित होता है। “मार्गी” का अर्थ शास्त्रसम्मत, सार्वदेशिक, अनुष्ठान-संबद्ध शैली से है, जबकि “देशी” का अर्थ है क्षेत्रीय, लोकाश्रित, परिवर्तनशील शैली। किंतु भरत मुनि ने कहीं भी देशी को मार्गी से हीन घोषित नहीं किया — दोनों को नाट्यधर्म के दो अंग के रूप में स्वीकृति दी गई। अभिनवगुप्त जैसे परवर्ती आचार्यों ने भी इस भेद को गुणात्मक श्रेष्ठता का प्रश्न नहीं, अपितु प्रयोजन और संदर्भ का प्रश्न माना।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो अनेक रागों का उद्भव देशी संगीत से हुआ और कालांतर में वे मार्गी परंपरा में समाहित हो गए। ध्रुपद जैसी अत्यंत शास्त्रीय गायन-शैली की जड़ें भी लोक-अनुष्ठानों और मंदिर-परंपराओं में खोजी जा सकती हैं। यहाँ तक कि शास्त्रीय रागों के नामकरण में भी — मल्हार, भैरवी, बागेश्री — लोक-ऋतु, लोक-देवता और लोक-स्मृति की छाया स्पष्ट है। यह प्रवाह द्विदिश है — लोक शास्त्र को कच्चा माल देता है, शास्त्र उसे संस्कार देकर पुनः लोक को लौटाता है, और यह चक्र अनवरत चलता रहता है।

भरतमुनि और अभिनवगुप्त के रस-सिद्धांत की मूल भित्ति ही “लोक” है। नाट्यशास्त्र में स्पष्ट कहा गया है कि नाट्य “लोकवृत्तानुकरणम्” है — लोक की वृत्तियों का अनुकरण। यदि लोक-जीवन में स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव न हों, तो शास्त्र के पास रस-निष्पत्ति के लिए कोई सामग्री ही शेष नहीं रहती। अभिनवगुप्त का प्रसिद्ध “साधारणीकरण” सिद्धांत भी यही कहता है — कवि लोक-अनुभूति को इतना विशिष्ट और तादात्म्यमूलक बना देता है कि वह सामान्यीकृत होकर सहृदय तक पहुँचती है। यहाँ शास्त्र का कार्य लोक-अनुभूति को नकारना नहीं, उसे परिष्कृत, संप्रेषणीय और स्थायी बनाना है।

आनंदवर्धन के ध्वनि-सिद्धांत में भी यही प्रक्रिया दिखाई देती है — व्यंजना लोक-भाषा के सहज सामर्थ्य से ही उपजती है, शास्त्र केवल उस सामर्थ्य का विश्लेषण और वर्गीकरण करता है। कवि कभी भी शास्त्र पढ़कर काव्य नहीं रचता, वह लोक-जीवन से रस ग्रहण करता है, और शास्त्र बाद में उस रचना का मीमांसक बनकर आता है। यही कारण है कि संस्कृत के महाकवि — कालिदास से लेकर भवभूति तक — अपनी उपमाओं, दृष्टांतों और बिंबों के लिए कृषि, वन, नदी, ऋतु-चक्र जैसे विशुद्ध लोक-अनुभवों की ओर ही मुड़ते हैं।

पूर्व मीमांसा दर्शन में “लोकवत्” तर्क अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। जैमिनि और शबरस्वामी की परंपरा में जहाँ शास्त्रीय विधि-वाक्यों की व्याख्या करनी होती है और शब्द का अर्थ संदिग्ध हो, वहाँ “लोके यथादृष्टं तथा शास्त्रेऽपि” — जैसा लोक में देखा जाता है, वैसा ही शास्त्र में भी ग्रहण किया जाए — यह सिद्धांत प्रतिष्ठित है। न्यायशास्त्र में भी प्रमाण-मीमांसा करते समय लोक-प्रसिद्ध अर्थ को ही आधारभूत माना गया, जब तक कि शास्त्र विशेष रूप से उससे भिन्न अर्थ का निर्देश न करे।

लोक कोई निर्वीर्य, निष्क्रिय पात्र नहीं जो शास्त्र से भरा जाना प्रतीक्षा करता हो, अपितु वह स्वयं चिंतन और दर्शन का उद्गम-स्रोत रहा है।

यदि मध्यकाल में कहीं यह देखना हो कि लोक ने पुनः शास्त्र को कैसे पुनर्जीवित किया, तो भक्ति-आंदोलन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। कबीर, तुलसी, मीरा, सूरदास, नामदेव, तुकाराम — इन संतों में से अधिकांश संस्कृत के औपचारिक शास्त्रीय शिक्षा-तंत्र से बाहर थे, अनेक तो निरक्षर अथवा निम्न-सामाजिक स्तर से आए थे। किंतु उनकी रचनाओं ने न केवल जनमानस को झकझोरा, अपितु स्वयं शास्त्रीय वेदांत, भक्ति-मीमांसा और रस-सिद्धांत की परवर्ती व्याख्याओं को भी प्रभावित किया। तुलसीदास का रामचरितमानस अवधी लोकभाषा में रचित होकर भी आज शास्त्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है — यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि लोक और शास्त्र के बीच की सीमा-रेखा स्थिर नहीं, प्रवाहमान है। आज का लोक-काव्य कल का शास्त्र बन सकता है, और आज का शास्त्र कभी लोक-अनुभव ही था।

औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा ने पश्चिमी “High Culture” बनाम “Folk Culture” के द्वैतवादी ढाँचे को भारतीय सामग्री पर आरोपित किया। इस आरोपण में संस्कृत-निबद्ध साहित्य को “classical” और शेष भाषाओं तथा मौखिक परंपराओं को “folk” अथवा “vernacular” कहकर एक कृत्रिम पदानुक्रम रच दिया गया, जिसमें लोक स्वभावतः द्वितीयक और अपूर्ण सिद्ध होता चला गया।

लोकमंथन की मूल चुनौती इसी औपनिवेशिक वर्गीकरण के विरुद्ध है — वह पुनः उस मूल भारतीय दृष्टि की प्रतिष्ठा करना चाहता है, जहाँ लोक कोई अवशिष्ट श्रेणी नहीं, अपितु शास्त्र का सहोदर, उसका उद्गम और अंततः उसका गंतव्य भी है।

शास्त्र और लोक के बीच जो सरिता प्रवाहित होती है, वह चेतना की ही सरिता है — भारतीय सभ्यता की सामूहिक स्मृति और अनुभव की अजस्र धारा। शास्त्र इस सरिता का वह तट है जो उसे मर्यादा, दिशा और स्थायित्व देता है; लोक वह तट है जो उसे नित नए जल-स्रोतों से सींचता है, उसे शुष्क होने से बचाता है। जिस दिन शास्त्र लोक से कट जाता है, वह शुष्क कर्मकांड और निर्जीव पांडित्य में बदल जाता है। जिस दिन लोक शास्त्र से कट जाता है, वह दिशाहीन, संस्कारहीन और विस्मृतिशील हो जाता है। भारतीय सभ्यता की जीवंतता ठीक इसी कारण रही है कि उसने इन दोनों तटों को कभी परस्पर-विरोधी नहीं होने दिया — पाणिनि ने लोक को प्रमाण माना, भरत ने लोक को नाट्य का उपादान बनाया, मीमांसकों ने लोक-व्यवहार को अर्थनिर्णय का आधार माना, और भक्ति-संतों ने लोक-भाषा में रचकर उसे स्वयं शास्त्र की प्रतिष्ठा दिला दी।

लोकमंथन का सांस्कृतिक अवदान इसी प्राचीन सत्य का पुनःस्मरण है – यह किसी नए सिद्धांत का प्रवर्तन नहीं, अपितु उस विस्मृत ज्ञानमीमांसा का पुनरुद्धार है, जिसमें शास्त्र और लोक कभी शत्रु नहीं, सदा सहचर रहे हैं। यह आयोजन इस अर्थ में सार्थक है कि यह भारत को स्मरण कराता है कि उसकी सभ्यता की समग्रता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब लोक को शास्त्र से लड़ाने की कोशिशों को चुनौती दी जाए।

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top