आस्था नंद पाठक
लखनऊ। मनोज बाजपेयी का, समधीश के साथ एक इंटरव्यू देख रहा था। समधीश ने उनसे एक बहुत सामान्य सा प्रश्न पूछा कि आज जब आप जिंदगी में एक मुकाम पर आ चुके हैं, इतना कुछ हासिल कर चुके हैं तो अब आपको क्या चीज ‘ड्राइव’ करती है?
मनोज बाजपेयी ने इसका जो उत्तर दिया, वह इतना सहज, इतना गहरा और इतना मार्मिक लगा कि वीडियो रोककर बार बार सुनना पड़ा…
उन्होंने कहा कि किसी मुकाम तक आने के लिए मैं थोड़ी एक्टिंग कर रहा था…एक्टिंग तो इसलिए कर रहा था कि जिंदगी में कुछ ऐसा होना चाहिए कि लगे कि अगर ये नहीं किया तो मर जाएंगे…और इसीलिए मैं एक्टिंग कर रहा हूँ!
कितनी सीधी सरल बात है…लेकिन मुझे लगा जैसे एक अभिनेता ने एक दो वाक्य में गीता का मर्म समझा दिया हो।
मनोज बाजपेयी मुझे हमेशा से बहुत पसंद रहे हैं। उनकी सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर इस मुकाम तक पहुँचने की संघर्षपूर्ण यात्रा तो प्रभावित करती ही है लेकिन उससे कहीं ज्यादा उनका इंटेलेक्ट, उनकी संवेदनशीलता और जीवन को देखने का उनका दार्शनिक नजरिया मुझे प्रभावित करता रहा है।
मैंने जीवन में पैशन (Passion) और अपने ‘स्व’ (Self) को पहचानने को लेकर पहले भी कई बार लिखा है। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि ईश्वर ने हर व्यक्ति को इस संसार में किसी न किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए भेजा है। हर व्यक्ति के अंदर कुछ न कुछ ऐसा जरूर है जो उसका अपना है, जो दूसरे से अलग है और जिसे शायद वह दुनिया के किसी दूसरे काम से बेहतर कर सकता है। मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी चुनौती पैसा, पद या प्रसिद्धि हासिल करना नहीं बल्कि अपने अंदर छिपे उसी व्यक्ति को खोज लेना है।
मनोज बाजपेयी की इस एक बात ने उसी विचार को कितनी खूबसूरती से कह दिया कि जिंदगी में कुछ ऐसा होना चाहिए कि अगर ये नहीं किया तो मर जाएंगे…
जरा सोचिए कि जीवन में वह कौन सा काम है जिसके लिए आपके अंदर ऐसी बेचैनी है? कौन सा काम है जिसे करते हुए आपको समय का पता नहीं चलता? कौन सा काम है जिसे करने के बाद शरीर भले थक जाए लेकिन मन प्रसन्न हो जाता है? और वह कौन सा काम है जिसे न कर पाने की कल्पना मात्र से आपको लगता है कि जीवन में कुछ बहुत जरूरी छूट रहा है?
शायद उसी सवाल के उत्तर के आसपास आपके जीवन का उद्देश्य छिपा हुआ है…
दुर्भाग्य यह है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था, परिवार और समाज हमें बचपन से यह जानने का अवसर ही बहुत कम देते हैं कि हम वास्तव में हैं कौन और करना क्या चाहते हैं। इसके बजाय बहुत जल्दी यह तय कर दिया जाता है कि हमें क्या बनना चाहिए। कोई डॉक्टर बनेगा, कोई इंजीनियर, कोई IAS…और इस पूरी प्रक्रिया में कई बार डॉक्टर बनाने के चक्कर में एक बेहतरीन संगीतकार मर जाता है, IAS बनाने के चक्कर में एक शानदार लेखक या अभिनेता और इंजीनियर बनाने के चक्कर में कोई असाधारण खिलाड़ी…
और जब तक हमें अपने अंदर के उस व्यक्ति का पता चलता है तब तक हम सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों के इतने मजबूत साँचे में ढल चुके होते हैं कि उससे बाहर निकलना बहुत कठिन हो जाता है। फिर हमारे पास अच्छी नौकरी होती है, अच्छा पद होता है, घर गाड़ी और सामाजिक प्रतिष्ठा सब कुछ होता है, लेकिन कई बार अंदर से लगातार एक आवाज आती रहती है कि
“मैं शायद इसके लिए बना ही नहीं था…”
मैं अपने पिछले लेख में मजाक में लिख चुका हूँ कि कल्पना कीजिए मनोज बाजपेयी अपने अंदर के अभिनेता को मारकर किसी प्रतियोगी परीक्षा में सफल होकर भभुआ के कलेक्टर हो गए होते…सचिन तेंदुलकर मेडिकल की पढ़ाई करके बांद्रा के प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ होते…महेंद्र सिंह धोनी रेलवे में TTE से विभागीय पदोन्नति पाते हुए आज किसी मंडल के DRM होते और बिस्मिल्लाह खान शहनाई छोड़कर वाराणसी के सबसे बड़े ‘खान ज्वेलर्स’ के मालिक होते…
ये सारे लोग तब भी हमारे सामाजिक पैमानों पर सफल ही कहलाते…अच्छा पैसा कमाते, प्रतिष्ठित जीवन जीते और शायद उनके परिवार वाले भी बहुत खुश होते…
लेकिन फिर ये दुनिया कितनी बदरंग होती…कितनी बेनूर होती..
और ये लोग स्वयं भी अपने भीतर कहीं उतने ही अधूरे होते।
इसीलिए भारतीय दर्शन में ‘स्व’ की पहचान पर इतना जोर दिया गया है। गीता का स्वधर्म हो, उपनिषदों का ‘स्वयं को जानने’ का आग्रह हो या पाश्चात्य दर्शन का ‘Know Thyself’…अंततः बात एक ही है कि सबसे पहले यह पता लगाइये कि आप वास्तव में हैं कौन और ईश्वर ने आपके हिस्से कौन सा काम सोच रखा है!
इसका अर्थ कतई यह नहीं है कि हर व्यक्ति कल सुबह अपनी नौकरी छोड़कर अपने passion के पीछे भागने लगे। जीवन की अपनी व्यावहारिकताएँ हैं, जिम्मेदारियाँ हैं और पेट पालने की आवश्यकता भी है। लेकिन इन व्यावहारिकताओं के नाम पर अपने अंदर की उस आवाज को हमेशा के लिए मार देना भी तो जीवन नहीं हो सकता। नौकरी करते हुए भी उसे खोजा जा सकता है, समय निकालकर उस दिशा में काम किया जा सकता है और धीरे धीरे अपने जीवन को उस तरफ मोड़ा जा सकता है जहाँ काम केवल जीविका कमाने का साधन न रहकर ‘आनंद का स्रोत’ भी बन जाए।
स्टीव जॉब्स ने Stanford के अपने प्रसिद्ध भाषण में कहा था- “Stay Hungry, Stay Foolish” और इसी भाषण में उन्होंने यह भी कहा था कि अगर अभी तक वह नहीं मिला है जिसे आप सचमुच प्रेम करते हैं तो तलाशते रहिए, settle मत होइए…
शायद मनोज बाजपेयी भी बिल्कुल वही बात अपने तरीके से कह रहे हैं।
ढूंढते रहिए उस काम को जिसे करने के लिए आपको किसी motivation की जरूरत न पड़े…जिसे करने के लिए सोमवार की सुबह बोझ न लगे…जिसमें असफल होने के बाद भी अगली सुबह फिर वही करने का मन करे…और जिसके बारे में एक दिन आप पूरे विश्वास से कह सकें कि अगर जिंदगी में ये नहीं किया तो फिर जिंदगी जी ही किसलिए…
सफलता मिले या न मिले, प्रसिद्धि मिले या न मिले, यह बहुत बाद की बात है। लेकिन अगर जीवन के किसी मोड़ पर आपने अपने हिस्से का वह काम खोज लिया जिसके लिए आपका मन कहे कि “हाँ, यही है जिसके लिए मैं बना हूँ”, तो मेरे विचार से आप दुनिया के सबसे भाग्यशाली लोगों में शामिल हो जाएंगे.
नीचे मनोज बाजपेयी के साक्षात्कार का वह अंश है…….उसे बार बार जरूर सुनिएगा।
वीडियो बहुत छोटा है, बात साधारण सी है, लेकिन सवाल बहुत बड़ा छोड़ जाती है-
“क्या मैं जिंदगी में वही कर रहा हूँ, जिसके लिए मैं बनाया गया हूँ?”
— सोशल मीडिया से साभार



