मानसून जो रास्ते से भटक गया, आसमान जो बरसना भूल गया

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दिल्ली । जून गुजर गया। कैलेंडर ने नया महीना दिखा दिया, लेकिन खेत अब भी सूखे पड़े हैं।
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का किसान रामदीन रोज़ सुबह आसमान की तरफ देखता है। उसे बादलों का इंतज़ार है, मगर नज़र आती है सिर्फ़ धूल। खेतों की मिट्टी जगह-जगह फट गई है। धरती की दरारें जैसे किसी गहरे ज़ख्म की कहानी सुना रही हों।

इस साल जून ने किसानों की उम्मीदों पर पानी नहीं, मायूसी बरसाई। देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से 30 से 40 प्रतिशत कम हुई। कहीं-कहीं तो आधी से भी कम बारिश दर्ज की गई।
दक्षिण-पश्चिम मानसून, जो हर साल जून की शुरुआत में केरल से दस्तक देकर पूरे देश को राहत देता है, इस बार जैसे रास्ता ही भटक गया। कई इलाकों तक वह समय पर पहुंच ही नहीं पाया।

रामदीन अकेला नहीं है। देश के करोड़ों किसान इसी बेचैनी से आसमान निहार रहे हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में खेत सूने पड़े हैं। जहां इस समय तक धान, सोयाबीन, दालें और मोटे अनाज की हरियाली लहलहाती थी, वहां अब धूल उड़ रही है। खरीफ की बुवाई काफी पीछे चल रही है। कई जगह ट्रैक्टर खड़े हैं, बीज और खाद की दुकानों पर सन्नाटा पसरा है।

देश के विभिन्न क्षेत्रों में पानी का संकट पहले ही पुराना है। हर कमजोर मानसून यहां की मुश्किलें कई गुना बढ़ा देता है। किसान साहूकारों से ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेकर बीज खरीदते हैं। अगर बारिश न हो तो फसल चौपट हो जाती है। फिर पूरा साल कर्ज़ चुकाने की जद्दोजहद में निकल जाता है। गरीब किसान की ज़िंदगी जैसे उम्मीद और मायूसी के बीच झूलती रहती है।

देश के बड़े जलाशयों की तस्वीर भी तसल्ली देने वाली नहीं है। पानी का भंडार लगातार घट रहा है। इसका असर सिर्फ खेती पर नहीं पड़ेगा, बल्कि पीने के पानी, सिंचाई और बिजली उत्पादन पर भी दिखाई देगा। कई जिलों में सूखे जैसे हालात बनने लगे हैं।

अब यह संकट गांवों तक सीमित नहीं रहा। शहर भी प्यासे होने लगे हैं।
मुंबई के जलाशयों में पानी तेजी से घट रहा है। बेंगलुरु में पानी के टैंकरों की मांग अचानक बढ़ गई है। दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, पुणे और दूसरे बड़े शहरों में भी भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई जगह पानी की कटौती शुरू हो चुकी है। स्विमिंग पूलों और निर्माण कार्यों में पानी के इस्तेमाल पर पाबंदियां लगाई जानी चाहिए।
सबसे बड़ी चिंता भूजल की है। हर साल हम ज़मीन के नीचे से लाखों लीटर पानी निकाल लेते हैं, लेकिन उसे वापस पहुंचाने का इंतज़ाम नहीं करते। नतीजा सामने है। टैंकर माफिया फिर सक्रिय हो गया है। लोग घंटों पानी का इंतज़ार कर रहे हैं। अगर जुलाई में भी अच्छी बारिश नहीं हुई, तो कई शहरों में पानी का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

कमज़ोर मानसून का असर सिर्फ खेतों तक नहीं रहेगा। इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर भी पड़ेगा। अगर फसल कम हुई तो दाल, खाद्य तेल, सब्जियां और अनाज महंगे हो जाएंगे। महंगाई का बोझ हर घर तक पहुंचेगा। गांवों की आमदनी घटेगी तो बाज़ार की रौनक भी फीकी पड़ जाएगी। उद्योगों से लेकर छोटे कारोबार तक इसकी मार झेलेंगे।

मौसम वैज्ञानिक इसके पीछे एल नीनो और बदलती जलवायु को बड़ी वजह मान रहे हैं। उनका कहना है कि मौसम अब पहले जैसा भरोसेमंद नहीं रहा। कभी बादल अचानक फट पड़ते हैं, तो कभी हफ्तों तक आसमान साफ रहता है। जलवायु परिवर्तन ने मौसम का मिज़ाज ही बदल दिया है।

सरकार राहत पैकेज, फसल बीमा, सूखा-रोधी बीज और खाद पर सब्सिडी जैसी योजनाओं पर काम कर रही है। मगर किसान का दर्द सरकारी फाइलों से नहीं, खेतों में बरसने वाली बारिश से कम होगा। जब तक बादल मेहरबान नहीं होंगे, सारी योजनाएं अधूरी लगेंगी।

शाम ढल रही है। सूरज लाल होकर क्षितिज के पीछे छिपने लगा है। रामदीन अपने औजार समेटते हुए धीमी आवाज़ में कहता है, “मुश्किल साल पहले भी आए हैं, लेकिन तब दिल में उम्मीद थी। इस बार लगता है जैसे आसमान ही हमसे रूठ गया है।”

रामदीन सिर्फ एक किसान नहीं है। वह इस मुल्क के लाखों किसानों की आवाज़ है। उसकी आंखों में झलकती फ़िक्र, हर उस परिवार की फ़िक्र है जिसकी रोज़ी-रोटी खेतों से जुड़ी है।

अब सबकी निगाहें जुलाई पर टिकी हैं। अगर बादल जल्द नहीं बरसे, तो सिर्फ खेत ही नहीं सूखेंगे, शहरों की प्यास भी बढ़ेगी, महंगाई भी चढ़ेगी और देश की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर पड़ेगा।
आसमान अभी भी ख़ामोश है। सवाल सिर्फ इतना है; क्या जुलाई यह ख़ामोशी तोड़ेगी, या फिर यह सूखा आने वाले दिनों की सबसे बड़ी कहानी बन जाएगा?

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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