क्या इलाज अब कारोबार बन गया है?

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मुंबई : अस्पताल का दरवाज़ा खुलते ही हर इंसान अपनी जान डॉक्टर के हवाले कर देता है। उसे यक़ीन होता है कि अब उसकी ज़िंदगी महफ़ूज़ है। लेकिन जब वही अस्पताल उम्मीद की जगह मातम का घर बन जाए, तो सबसे बड़ा सवाल उठता है। क्या इलाज अब इंसानियत का फ़र्ज़ रह गया है, या सिर्फ़ मुनाफ़े का धंधा बनता जा रहा है?

हर साल 1 जुलाई को भारत में डॉक्टर्स डे मनाया जाता है। यह उन लाखों डॉक्टरों को सलाम करने का दिन है, जो दिन-रात मरीजों की ख़िदमत करते हैं। लेकिन यही दिन हमें चिकित्सा व्यवस्था के उस चेहरे से भी रूबरू कराता है, जिसे देखकर भरोसा डगमगाने लगता है। पिछले कुछ वर्षों में मेडिकल लापरवाही के ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया। यह सिर्फ़ कुछ डॉक्टरों की गलती नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कमज़ोरियों, जवाबदेही की कमी और बढ़ते बाज़ारीकरण की कहानी है।

सबसे चर्चित मामला अनुराधा साहा का था। त्वचा की बीमारी के इलाज में गलत दवा और ज़रूरत से ज़्यादा स्टेरॉयड देने से उनकी मौत हो गई। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों और अस्पताल को दोषी ठहराया और भारी मुआवज़ा देने का आदेश दिया।

पिछले साल जयपुर की राधा शर्मा को लीवर की बीमारी के बावजूद टीबी की दवाइयाँ दे दी गईं, जबकि उनकी जांच नेगेटिव थी। कुछ ही दिनों में उनकी मौत हो गई। एर्नाकुलम में संध्या अनुप की एक सामान्य सर्जरी के दौरान कथित तौर पर एनेस्थीसिया की ज़्यादा मात्रा जानलेवा साबित हुई।

गुरुग्राम की सिमरन छाबड़ा मामूली खांसी-जुकाम के इलाज के लिए अस्पताल गई थीं। इंजेक्शन लगने के कुछ मिनट बाद ही उनकी मौत हो गई। उनका परिवार आज भी इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहा है।

ऐसे मामलों की फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। कहीं ऑपरेशन के बाद मरीज के पेट में कपड़ा या स्पंज छूट जाता है। कहीं गलत बीमारी का इलाज शुरू हो जाता है। कहीं ऐसी सर्जरी कर दी जाती है जिसकी कोई ज़रूरत ही नहीं थी। दूसरी तरफ़ झोलाछाप डॉक्टर भी हर साल हज़ारों लोगों की जान जोखिम में डाल रहे हैं।

समस्या की जड़ मेडिकल शिक्षा में भी छिपी है। हर साल लगभग 23 लाख छात्र नीट परीक्षा देते हैं, लेकिन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीटें बहुत कम हैं। मजबूर होकर लाखों परिवार निजी कॉलेजों का रुख करते हैं, जहाँ एमबीबीएस की पढ़ाई पर 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपये या उससे भी ज़्यादा खर्च हो जाता है। कई परिवार घर गिरवी रखते हैं, कर्ज़ लेते हैं और पूरी जमा-पूँजी दाँव पर लगा देते हैं।

हज़ारों छात्र रूस, जॉर्जिया, कज़ाखस्तान और फिलीपींस जैसे देशों में पढ़ने चले जाते हैं। जब डॉक्टर बनने की शुरुआत ही भारी कर्ज़ से होती है, तो कुछ लोग उस पैसे की भरपाई जल्दी करने की कोशिश में मुनाफ़े की दौड़ में शामिल हो जाते हैं। सरकार ने मेडिकल सीटें ज़रूर बढ़ाई हैं, लेकिन अच्छी शिक्षा, योग्य शिक्षक और बेहतर ढाँचे की चुनौती अब भी बनी हुई है।

कागज़ों पर भारत में डॉक्टरों की संख्या संतोषजनक दिखाई देती है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त बिल्कुल अलग है। बड़े शहरों में डॉक्टरों की भरमार है, जबकि गांवों और छोटे कस्बों में लोग एक अच्छे डॉक्टर के लिए तरस जाते हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। सर्जन, फिज़ीशियन, स्त्री रोग विशेषज्ञ और बच्चों के डॉक्टर सबसे ज़्यादा कम हैं। बेहतर वेतन और सुविधाओं की तलाश में कई युवा डॉक्टर विदेश चले जाते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान आम मरीज को उठाना पड़ता है।

निजी अस्पतालों पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। मरीजों से ज़रूरत से ज़्यादा टेस्ट कराना, महंगी दवाइयाँ लिखना, अनावश्यक सर्जरी की सलाह देना और इलाज का भारी-भरकम बिल थमा देना आम शिकायत बन चुकी है। दवा कंपनियों और पैथोलॉजी लैब्स से मिलने वाले कमीशन की चर्चाएँ भी अक्सर सामने आती हैं। कई बार ऐसे मरीज, जिनके बचने की उम्मीद बहुत कम होती है, उन्हें लंबे समय तक आईसीयू में रखकर लाखों रुपये का बिल बना दिया जाता है। इससे लोगों का भरोसा टूटता है।

साल 2025 में मेडिकल लापरवाही के लगभग 65 हज़ार मामले दर्ज किए गए। असली संख्या इससे कहीं ज़्यादा हो सकती है। यह भी सच है कि देश के अधिकांश डॉक्टर पूरी ईमानदारी और लगन से काम करते हैं। सरकारी अस्पतालों में सीमित संसाधनों के बावजूद लाखों मरीजों की जान बचाने वाले डॉक्टर किसी फ़रिश्ते से कम नहीं हैं। कुछ लोगों की ग़लतियों की वजह से पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा करना भी इंसाफ़ नहीं होगा।

लेकिन अब सुधार का वक्त आ गया है। अस्पतालों में इलाज की पूरी जानकारी और खर्च पहले से लिखित रूप में दिया जाए। मेडिकल लापरवाही पर तेज़ और निष्पक्ष कार्रवाई हो। मेडिकल शिक्षा में नैतिकता, हमदर्दी और इंसानी मूल्यों को उतनी ही अहमियत मिले जितनी विज्ञान को मिलती है। ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों को बेहतर सुविधाएँ और प्रोत्साहन दिया जाए। मरीजों को भी अपने अधिकारों की पूरी जानकारी होनी चाहिए, ताकि वे ज़रूरत पड़ने पर दूसरी राय ले सकें और शिकायत दर्ज करा सकें।

डॉक्टर्स डे सिर्फ़ फूल देने और बधाई देने का दिन नहीं है। यह आत्ममंथन का दिन भी है। सफेद कोट सिर्फ़ सम्मान का प्रतीक नहीं, बल्कि भरोसे और ज़िम्मेदारी की सबसे बड़ी निशानी है। अस्पताल अगर इलाज के मंदिर हैं, तो उनमें इंसानियत की रोशनी हमेशा जलती रहनी चाहिए, मुनाफ़े की नहीं।

भारत की चिकित्सा व्यवस्था को अपने ज़मीर का इलाज खुद करना होगा। जब तक ईमानदारी, जवाबदेही और रहमदिली फिर से इस पेशे की पहचान नहीं बनती, तब तक मरीजों का भरोसा पूरी तरह लौट नहीं पाएगा।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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