सन्त समीर
दिल्ली। राहुल गान्धी हज़ारों साल पुराने इतिहास को याद नहीं करना चाहते, पर हज़ारों साल पहले की मनुस्मृति को मौक़े-बे-मौक़े लानत भेजते रहना ज़रूरी समझते हैं। मञ्च पर जब वे बोल रहे थे तो उनकी वाणी इस बात का पता दे रही थी कि वे जिस श्लोक के आधार पर मनु को स्त्री-विरोधी क़रार दे रहे थे, उस श्लोक का एक शब्द भी उन्हें याद नहीं था। वे शायद संस्कृत का कोई श्लोक ठीक-ठीक पढ़ने की योग्यता भी नहीं रखते होंगे। ऐसा लगता है, विचारधारा के बीमार उनके दादा के ताऊ के फूफा के नाती-पोतों ने उनके कानों में कभी कोई स्मृति-रस घोला होगा, जो अब उनके सयानेपन में मवाद बन-बनकर जब-तब बहता रहता है।
हे राहुल भक्तो! बुरा मानने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि जब जाहिलपने की हद हो जाए, तो कुछ हल्की-फुल्की बातें कहनी ही पड़ती हैं। बात बस इतनी है कि जिस विषय का ठीक से पता न हो, बेहतर है कि उस पर बोलने से यथाशक्य बचा जाए। बोला भी जाए, तो कम-से-कम इतनी मर्यादा तो हो कि शक्ल आरोप की न हो।
ग़ज़ब तो यह कि काँग्रेस जैसी पार्टियाँ, जाति-विरोधी लोग और दलित नेता जातिवाद के लिए आए दिन जिस मनुस्मृति को कोसते रहते हैं, उस मनुस्मृति में आजकल की जातियों का कोई वर्णन ही नहीं है। मनु ने गोत्रों तक की बात नहीं की है। क्या ऐसा सम्भव है कि कोई जातियों का निर्माण करने बैठे, लेकिन जातियों की कोई सूची तक न दे?
इतने पर भी मनुस्मृति ऐसी है कि यदि कोई पढ़ना शुरू करे, तो कुछ श्लोकों पर कहेगा कि वाह क्या शानदार बात कही है, लेकिन कुछ श्लोक ऐसे भी मिलेंगे कि सिर पीटने का मन करेगा। सच्चाई वही समझ पाएगा, जो मनु को समग्रता में देखेगा।
यह भी रोचक है कि राहुल गान्धी जिस मनुस्मृति को स्त्रियों का विरोधी और उनकी स्वतन्त्रता छीनने वाली बताना चाहते हैं, उसी मनुस्मृति में ऐसे श्लोक मिलेंगे, जिनके सामने संसार भर की सभी विचारधाराओं में मौजूद स्त्री-स्वतन्त्रता के विचार पानी भरते नज़र आएँगे। यहाँ मैं खुली चुनौती दे सकता हूँ कि मनु ने स्त्री को जिस तरह से स्वतन्त्रता, सम्मान और गरिमा की दृष्टि से देखा है, उस तरह से संसार की किसी भी अन्य विचारधारा में नहीं देखा गया है। मनु के मात्र दो-चार स्त्री-समर्थक श्लोकों पर भी इस्लाम, ईसाई, साम्यवादी, समाजवादी आदि-आदि के पूरे स्त्री-समर्थक विचारों को तौला जा सकता है।
एक हल्का-सा जाति-विमर्श और कीजिए। मनुस्मृति को कम समझने वालों को भी पता है कि मनु ने पृथक्-पृथक् वर्णों के लिए पृथक्-पृथक् कर्मों का विधान किया है। अब प्रश्न यह बनता है कि यदि मनु जन्म से वर्ण-व्यवस्था मानते हैं, तो फिर किसी वर्ण के लिए किसी विशेष कर्म के विधान का क्या मतलब, क्योंकि जिनका जन्म ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्ण में हो ही गया, तो वे तो जीवनपर्यन्त ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र रहेंगे ही। जब ब्राह्मण को ब्राह्मण ही रहना है, तो उसके लिए कर्म के विधान का क्या अर्थ? सच्चाई यह है कि मनु ने बार-बार याद दिलाया है कि जो व्यक्ति जिस वर्ण में है, यदि उस वर्ण के हिसाब से कर्म नहीं करता तो उस वर्ण से बाहर हो जाएगा, उसका वर्ण परिवर्तित हो जाएगा। नमूने के तौर पर यह श्लोक देख सकते हैं।
शूद्रो ब्राह्मणताम् एति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
क्षत्रियात् जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात्तथैव च।।
अर्थात्—गुण, कर्म, योग्यता के आधार पर ब्राह्मण, शूद्र बन जाता है और शूद्र ब्राह्मण। इसी प्रकार क्षत्रियों और वैश्यों में भी वर्ण परिवर्तन हो जाता है।
ख़ैर, अब आइए उस श्लोक पर बात करते हैं, जिसके आधार पर राहुल गान्धी मनु को स्त्री-विरोधी ठहरा रहे हैं। राहुल कुछ पढ़ते-लिखते होते तो कुछ ऐसे श्लोक पा सकते थे कि विरोधियों को जवाब तलाशना पड़ता, पर जो श्लोक उनके गुरुओं ने उन्हें सुझाया, उसका मूल भाव बहुत बुरा है ही नहीं। एजेण्डा चलाने वालों ने इस श्लोक की व्याख्या अनाप-शनाप तरीक़े से कर रखी है और राहुल गान्धी मूल के बजाय नक़ली व्याख्या पर अपनी राजनीति चलाना चाहते हैं। वह श्लोक यह है :
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा: न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥
इसका सामान्य भाव है— “कुमारिका-अवस्था में पिता स्त्री का पालन-संरक्षण करता है; यौवन में उसका भर्ता उसके जीवन का भार वहन करते हुए उसका संरक्षण करता है; वृद्धावस्था में पुत्र उसका भार सँभालते और संरक्षण करते हैं। स्त्री को ऐसी स्थिति में नहीं रखा गया है कि वह अपने जीवन की व्यवस्था और उत्तरदायित्व में पूर्णतः अकेली पड़ जाए; उसके जीवन के विभिन्न चरणों में उसके संरक्षण और भरण-पोषण का उत्तरदायित्व क्रमशः पिता, भर्ता और पुत्रों पर रहता है।”
इसे इसी रूप में समझें तो भी कुछ किन्तु-परन्तु हो सकता है, परन्तु इसका भाव और गहरा होने लगेगा, जब आप इसके शब्दों पर ध्यान देंगे। इसके लिए सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि श्लोक में जो शब्द हैं, वे हज़ारों वर्ष पहले के हैं और उनका अर्थ वही होगा, जो उस समय चलता था। याद रखना चाहिए कि आज हम जन्म देने वाले को पिता समझते हैं, परन्तु अपने मूल भाव में पालने वाला ‘पिता’ होता है और जन्म देने वाला ‘जनक’। इसका अर्थ हुआ कि जन्म देने वाला पिता हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। शब्दों के मूल तक पहुँचने के लिए थोड़ी देर के लिए ‘बलात्कार’ जैसे शब्द का उदाहरण ले सकते हैं। आजकल किसी से पूछिए कि ‘बलात्कार’ का अर्थ क्या है, तो वह बिना सोचे-विचारे बोल देगा कि ‘यौन शोषण’। इसके उलट ‘बलात्कार’ का प्रयोग पहले के समय में यौन शोषण के अर्थ में न के बराबर मिलेगा, बल्कि किसी भी तरह की ज़ोर-ज़बरदस्ती करना बलात्कार है। यही कारण है कि दयानन्द सरस्वती के ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा मिलेगा—“…सत्यासत्य विषय प्रकाशित किए जाने पर भी जिसकी इच्छा हो वह न माने वा माने। किसी पर बलात्कार नहीं किया जाता।”
बहरहाल, श्लोक का मर्म समझने के लिए श्लोक में आए शब्दों को प्रचलित अर्थ में नहीं, संस्कृत व्याकरण की परम्परा में समझना पड़ेगा। इसके शब्दों की व्युत्पत्ति पर ध्यान दिए बिना आजकल के प्रचलित अर्थों से बात नहीं बनेगी। श्लोक को सामने रखकर ध्यान दीजिए कि ‘पिता’ ‘पितृ’ का प्रथमा एकवचन है—अर्थात् पालन करने वाला। ‘रक्षति’ √रक्ष् धातु से है, जिसका अर्थ केवल बचाना नहीं, बल्कि रक्षा करना, सँभालना, संरक्षण और पालन करना है। ‘कौमारे’ ‘कुमार’ से बना ‘कौमार’ है, अर्थात् कुमारिका की अवस्था। ‘भर्ता’ √भृ धातु से बना ‘भर्तृ’ है, जिसका मूल अर्थ है धारण करने वाला, भार वहन करने वाला, पोषण करने वाला और पालन करने वाला। ध्यान रहे कि यहाँ ‘पति’ के बजाय ‘भर्ता’ शब्द का प्रयोग किया गया है, तो उसका विशेष कारण है। ‘यौवने’ ‘युवन्’ से सम्बन्धित ‘यौवन’ अर्थात् युवावस्था है। ‘रक्षन्ति’ √रक्ष् धातु से बना है—रक्षा, संरक्षण और पालन करते हैं—के अर्थ में। ‘स्थविरे’ ‘स्थविर’ का रूप है, अर्थात् वृद्धावस्था में। यह भी ध्यान रहे कि स्थविर सीधे-सीधे वृद्धावस्था नहीं है। वास्तव में वृद्धावस्था में स्थविर के लक्षण घटित होते हैं, इसलिए यह शब्द उपयुक्त बनता है। ‘पुत्राः’ ‘पुत्र’ का प्रथमा बहुवचन है, अर्थात् पुत्र। ‘न’ निषेध का अव्यय है—नहीं। ‘स्त्री’ स्त्रीवाचक सञ्ज्ञा है, यह लोग जानते ही हैं। स्त्री के बारे में यह भी समझें कि यह ‘स्तै’ धातु से बना है। जब सन्तति पैदा करने योग्य सारे अवयव शरीर में विकसित हो जाते हैं, तो स्त्री रूप चरितार्थ होता है। यह नारीत्व का केन्द्रीय भाव है। इसके बाद देखें तो ‘स्वातन्त्र्यम्’ ‘स्वतन्त्र’ से बना भाववाचक शब्द है—स्व + तन्त्र, अर्थात् अपने अधीन, अपनी व्यवस्था पर स्थित होने का भाव, स्वाधीनता। और ‘अर्हति’ √अर्ह् धातु से बना है, जिसका अर्थ है—योग्य होना, पात्र होना या अधिकारी होना। इसलिए “न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति” का अर्थ केवल आधुनिक अर्थ में “स्त्री को स्वतन्त्रता का अधिकार नहीं” कह देना पर्याप्त नहीं है। व्युत्पत्ति और प्राचीन प्रयोग को सामने रखकर इसका भाव है कि स्त्री को जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में अपने ऊपर अकेले निर्भर रहने वाली ‘स्वतन्त्र’ व्यवस्था में नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि क्रमशः पिता, भर्ता और पुत्र उसके संरक्षण, पालन और जीवन-भार के उत्तरदायी हैं। यह ग़ैरबराबरी वाली बात नहीं है, बल्कि इसके जैव-वैज्ञानिक कारण हैं। माता निर्माता भवति—स्त्री जीवनदायिनी शक्ति है, उसे असुरक्षित छोड़ना अक्षम्य है।
अब आप श्लोक के मर्म तक पहुँचने का प्रयास कर सकते हैं।
बावजूद इसके, इस श्लोक के आसपास के श्लोकों पर ध्यान देंगे तो बुरा न होते हुए भी यह श्लोक मनु का लिखा हुआ नहीं दिखाई देगा। मनुस्मृति बहुत व्यवस्थित और तारतम्य में आगे बढ़ती है, परन्तु यह श्लोक और इसके ठीक पहले का श्लोक मनु की शैली से भिन्न हैं।
मनु पर बात करते हुए यह अवश्य ध्यान में रहना चाहिए कि यदि मनु ने स्त्री को सचमुच दोयम दर्जे का कहा होता तो फिर उसी नौवें अध्याय में उन्होंने यह क्यों कहा कि ‘पुत्रेण दुहिता समा’—अर्थात् पुत्री पुत्र के समान होती है, दोनों के अधिकार बराबर हैं। वैसे यह भी रोचक है कि संविधान में पिता की सम्पत्ति में पुत्री को जो अधिकार दिया गया है, वह मनुस्मृति के आधार पर ही है।
अन्त में मनु-विरोधियों से एक प्रश्न यह कि मनुस्मृति के हिसाब से चलने वाला क्या कोई व्यक्ति आपने देखा है? हिन्दू धर्म के जानकार से आप मनुस्मृति और संविधान में से एक चुनने को कहेंगे तो निःसङ्कोच वह संविधान को चुनेगा, क्योंकि उसे पता होगा कि स्मृतियाँ समय की ज़रूरत के हिसाब से रची जाती हैं। आज की ज़रूरत संविधान है। संविधान वर्तमान की स्मृति है। लेकिन इसी तरह से किसी मुसलमान से पूछिए कि क़ुरान और संविधान में से वह क्या चुनेगा, तो वह स्पष्ट रूप से संविधान नहीं, क़ुरान चुनेगा। संविधान उसकी ज़रूरत नहीं मजबूरी है।
यह भी सोचें कि यदि मनु स्त्री को पढ़ाने-लिखाने का विरोध करते हैं; और, हिन्दू लोग मनु को मानते हैं, तो हिन्दू लड़कियाँ धरती से लेकर आसमान तक क्यों नाप रही हैं। जेन-Z की गालीबाज़ लड़कियाँ भी हिन्दुओं की ही थीं। हिन्दू स्त्रियाँ यदि इतनी ग़ुलाम हैं तो फिर वे प्रधानमन्त्री, मुख्यमन्त्री, राज्यपाल, वैज्ञानिक, आला दर्जे की अधिकारी आदि-आदि कैसे बन रही हैं?
— सोशल मीडिया से साभार



