मानवेंद्र की रचना, हिन्दुत्व का चूरन..

sanatan-culture_large_1204_23.webp
मानवेन्द्र
जिनको नहीं चाटना
हिन्दुत्व का चूरन…
वो न चाटें..

हमारे लिए
हिन्दुत्व कभी चूरन था ही नहीं..

न हमने इसे 2014 में खोजा
न नरेंद्र मोदी ने हमें हिन्दू बनाया..

राम मोदी से पहले थे
काशी मोदी से पहले थी
केदार, महाकाल, गीता, उपनिषद
शंकराचार्य, तुलसी, मीरा
हमारे पर्व, हमारे तीर्थ
हमारी स्मृतियां..
ये किसी राजनीतिक दल की देन नहीं हैं…

तो फिर मोदी में ऐसा क्या था
जिसके कारण मेरे जैसे व्यक्ति ने
उनकी राजनीति को अपनी
सभ्यतागत आकांक्षा के करीब पाया?

शायद इसका उत्तर
किसी एक कानून में नहीं है..

यह उस परिवर्तन में है
जिसमें हिन्दू होना
राष्ट्रीय सार्वजनिक जीवन में
धीरे धीरे क्षमा मांगने वाली पहचान नहीं रहा..

मोदी ने हिन्दुत्व नहीं बनाया..

लेकिन उनके समय में
सत्ता की भाषा बदली..

प्रधानमंत्री काशी में
हर हर महादेव बोल सकता है..

केदारनाथ में
आदि शंकराचार्य की समाधि का पुनर्निर्माण
राष्ट्रीय परियोजना का हिस्सा बन सकता है..

उज्जैन में महाकाल लोक का लोकार्पण
सिर्फ स्थानीय धार्मिक कार्यक्रम नहीं
राष्ट्रीय दृश्य बन सकता है..

और देश का प्रधानमंत्री
इन सबको आधुनिक भारत के विरोध में नहीं,
आधुनिक भारत की continuity के रूप में प्रस्तुत कर सकता है..

काशी विश्वनाथ धाम का उद्घाटन 2021 में मोदी ने किया
केदारनाथ में आदि शंकराचार्य समाधि और व्यापक पुनर्विकास परियोजनाएं उनके कार्यकाल में आगे बढ़ीं
और 2022 में उन्होंने महाकाल लोक के पहले चरण को राष्ट्र को समर्पित किया..

मेरे लिए यही परिवर्तन छोटा नहीं है..

क्योंकि राष्ट्र केवल GDP से नहीं बनता
राष्ट्र स्मृति से भी बनता है..

और फिर अयोध्या है..
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा में
प्रधानमंत्री स्वयं उपस्थित रहे..

मेरे लिए उसका अर्थ
सिर्फ एक मंदिर का बन जाना नहीं था।

वह इस बात का संकेत था
कि सदियों पुरानी सभ्यतागत स्मृति
अब सार्वजनिक जीवन में
संकोच से नहीं बोली जाएगी..

फिर Citizenship Amendment Act को देखता हूं..
उससे हर समस्या हल नहीं होती..
उस पर राजनीतिक और संवैधानिक बहस भी हुई..
लेकिन पहली बार भारतीय कानून में
Pakistan, Bangladesh और Afghanistan से आए
हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई
उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों के लिए
नागरिकता का विशेष रास्ता बनाया गया..

उसमें हिन्दू अकेले नहीं थे
लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में
धार्मिक अल्पसंख्यक हिन्दुओं की दशकों पुरानी समस्या को
भारतीय राज्य ने केवल humanitarian footnote मानकर छोड़ भी नहीं दिया..

इसलिए मेरे समर्थन का आधार
सिर्फ कोई नारा नहीं है..

मैं एक pattern देखता हूं..

अयोध्या
काशी
केदारनाथ
महाकाल
सभ्यतागत प्रतीकों को
राष्ट्रीय भाषा में पुनः प्रतिष्ठित करना..

उस भारतीयता को यह कहना
कि आधुनिक होने के लिए
अपनी प्राचीनता से शर्मिंदा होना जरूरी नहीं है..

कि satellite भी हमारा हो सकता है
और शंकराचार्य भी
semiconductor भी
और संस्कृत भी
AI भी
और अध्यात्म भी
expressway भी
और तीर्थ भी

मेरे लिए यही आधुनिक हिन्दू आत्मविश्वास है

मैं यह दावा नहीं करता
कि सब कुछ हो गया..
बहुत कुछ किया जाना बाकी है..

SC/ST Act हो,
UGC हो,
आरक्षण हो,
जहां लगे
कि सरकार का संतुलन गलत है,
तो बेशक सवाल करो..

एक निर्णय से नाराज़ होकर

मैं उस पूरी यात्रा को
चूरन नहीं कह सकता

जिसमें मेरी सभ्यता
राजनीतिक हाशिये से निकलकर
फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में दिखाई दी..

इसीलिए
जिनको नहीं चाटना
हिन्दुत्व का चूरन..
वो न चाटें..

मेरे लिए यह
किसी चुनाव की दवा नहीं है..

यह स्मृति है।
यह continuity है..
यह उस सभ्यता का आत्मबोध है
जो हजारों वर्षों से
अपने आपको बदलती भी आई है
और बचाती भी आई है..

और मोदी का मेरे लिए महत्व
इसलिए नहीं है
कि उन्होंने मुझे हिन्दू बनाया..
बल्कि इसलिए है

कि मेरे जीवनकाल में
उन्होंने भारत की सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता को
अपनी हिन्दू सभ्यतागत स्मृति के साथ
सार्वजनिक रूप से सहज होने में
एक बड़ी भूमिका निभाई…

सरकार का हिसाब पांच साल का हो सकता है..
सभ्यता का हिसाब सदियों का होता है..

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top