मोदी जी हैं तो मुमकिन है…

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त

दिल्ली। राजनीति के मंच पर जब धर्मेंद्र जी का इस्तीफा हुआ तो विपक्ष ने सोचा कि किला फतह हो गया। लेकिन हमारे देश के मुख्य अभिभावक ने ऐसा दांव खेला कि सब देखते रह गए। बात सीधी है कि बच्चों की जिद के आगे जब घर का मुखिया हाथ जोड़कर मुस्कुरा दे तो इसे हार नहीं कहते। पिछले कुछ सालों से नीट को लेकर जो नासूर पनप रहा था उस पर आखिरकार मरहम लग ही गया। कुछ ज्ञानी कह रहे थे कि सरकार झुक गई लेकिन जो इंसान बारह साल से दिल्ली की गद्दी पर बैठा हो और तीन बार गुजरात का मुखिया रहा हो वह ऐसे ही नहीं झुकता। मोदी जी ने बस इतना किया कि जनता के गुस्से को समय रहते भांप लिया। उन्होंने देखा कि यह कोई पुराना झंडा उठाने वाला आंदोलन नहीं है बल्कि यह रील्स और मीम्स की दुनिया का नया तूफान है। जो युवा सब्सक्राइबर्स के लिए चलती ट्रेन के आगे कूद सकते हैं वे दिल्ली की सड़कों पर क्या कर गुजरते। इसलिए समय रहते अभिभावक की तरह बात सुनी और मानी।

असली तमाचा तो उस विपक्ष के मुंह पर पड़ा है जो खुद को धरनों का शहंशाह समझता था। राहुल गांधी पिछले बारह सालों से एक मजबूत आंदोलन खड़ा नहीं कर पाए और जब कुछ महीनों पुरानी एक इंस्टाग्राम पार्टी ने बाजी मार ली तो वे क्रेडिट चुराने दौड़ पड़े। वेणुगोपाल और जयराम रमेश की टोली को समझ ही नहीं आया कि हवा किस तरफ बह रही है। दूसरी तरफ शीशमहल वाले अरविंद केजरीवाल और उनकी पूरी ब्रिगेड दिल्ली को अपनी जागीर समझती थी पर वे भी इस नए दौर में पूरी तरह चूक गए। अगर कोई इसे किसी की बी टीम भी कहे तो मानना पड़ेगा कि आपकी अपनी टीम अब एक्सपायर हो चुकी है। रोज सुबह सांड की फोटो पोस्ट करके या सस्ता व्यंग्य लिखकर जेन-जी के दिलों में जगह नहीं बनाई जा सकती। विपक्ष आज भी ट्विटर की बौद्धिक कुश्ती में उलझा हुआ है जबकि देश का युवा आगे निकल चुका है।

मोदी जी की खासियत यही है कि वे माहौल देखकर अपनी भाषा बदल लेते हैं। जब उन्होंने देखा कि जनमत अब मोबाइल स्क्रीन पर बन रहा है तो वे सीधे इंस्टाग्राम पर लाइव आ गए। चंद घंटों में दस लाख फॉलोअर्स जुड़ गए और दो दिन तक पूरी फीड पर उन्हीं का जलवा रहा। उन्होंने युवाओं की भाषा में संवाद किया और संदेश दिया कि देश का गार्जियन हर मोड़ पर उनके साथ है। विपक्ष को लगा था कि वे सरकार को घेर लेंगे लेकिन बाजी पलट गई। इसे मजबूरी कहने वाले कहते रहें पर सच तो यह है कि यह हारकर भी जीतने की वही कला है जो सिर्फ एक मंझा हुआ राजनेता ही दिखा सकता है। एक नया आंदोलन आया और पुराने दिग्गजों को जमींदोज करके चला गया पर हमारे अभिभावक अपनी जगह पर मुस्कुराते हुए अडिग खड़े रहे।

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