मोदी: व्यक्ति नहीं, भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी विभाजन-रेखा

2-4-1.jpeg

व्यालोक पाठक

पटना। मोदी एक ऐसा नाम, जो पिछले 12 वर्षों से इस देश में ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा बायस हैं। मोदी से आप प्रेम कर सकते हैं, घृणा कर सकते हैं, अनदेखी नहीं कर सकते। जिस मोदी के खिलाफ पंचमक्कारों (मैकाले, मिशनरी, मुल्ला, मीडिया, मार्क्सवादी) ने पिछले 25 वर्षों से अनथक अभियान चलाया, अब उसमें स्वर्ण-रजत मवादी और 2014 के बाद पैदा हुए नवतुरिया राष्ट्रवादी भी पैदा हो गए हैं, जो महज एकाध साल पहले तक राम मंदिर की मुखालफत करते थे, वहां अस्पताल की वकालत करते थे और लव-जिहाद को कपोल-कल्पित बताते थे। आज वही मोदी और योगी को ज्ञान दे रहे हैं।

मोदी सरकार से शिकायतें हैं और कटुतम आलोचना की है मैंने, लेकिन मैं इतना वज्रमूर्ख नहीं  कि देश जलाने को तैयार बैठे राउल विंची औऱ तमाम गिरोहियों को दे दूं। हम भारतीय भूलने में अव्वल हैं। भूल जाते हैं, पटरियों के किनारे बैठे लोगों की पंक्तियां, रेल में सुबह-सुबह आती पाखाने की वो महक, गंधाते हुए प्लेटफॉर्म और जब कोई पीएम स्वच्छता अभियान की बात करता है, तो हम उसका मजाक उड़ाते हैं, उस अभियान को नाकामयाब करने की पूरी कोशिश करते हैं।

भारत में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल नाम नहीं रहते, वे बहस बन जाते हैं। नरेंद्र मोदी उन्हीं में से एक हैं। बीच का मैदान वर्षों पहले खाली हो चुका है।

मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि शायद सड़क, पुल, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट या डिजिटल व्यवस्था नहीं है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने भारत के बौद्धिक और राजनीतिक पाखंड को निर्वस्त्र कर दिया। जो लोग दशकों तक कहते रहे कि अनुच्छेद 370 कभी नहीं हट सकता, वह हट गया। जो कहते थे कि राम मंदिर केवल चुनावी नारा है, वहाँ मंदिर खड़ा हो गया। जो लोग भारत की विदेश नीति को स्थायी हीनभावना का दस्तावेज मानते थे, उन्हें भी मानना पड़ा कि दुनिया अब भारत को पुराने चश्मे से नहीं देखती।

भारत का बुद्धिजीवी (Sic.)  वर्ग और उसका राजनीतिक परजीवी तंत्र वर्षों तक इस विश्वास में जीता रहा कि सत्ता पर उसका नैसर्गिक अधिकार है। मोदी ने उस व्यवस्था को तोड़ा। परिणाम यह हुआ कि विरोध लोकतांत्रिक असहमति से आगे बढ़कर लगभग अस्तित्वगत घृणा में बदल गया। ऐसा लगा मानो किसी एक व्यक्ति के हटते ही देश में दूध-घी की नदियाँ बहने लगेंगी और सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी।

विडंबना देखिए, जरा। जो लोग कल तक राम मंदिर की जगह अस्पताल माँग रहे थे, आज मंदिर बन जाने के बाद हिंदुत्व का पाठ पढ़ा रहे हैं। जो लव-जिहाद को कल्पना बताते थे, वे अब सांस्कृतिक संकटों पर शोधपत्र लिख रहे हैं। जो लोग वर्षों तक राष्ट्रवाद का उपहास उड़ाते रहे, वे आज उसके सबसे बड़े स्वयंभू ठेकेदार बन बैठे हैं। भारत में विचार बदलना अपराध नहीं है, लेकिन स्मृति खो देना अवश्य एक राष्ट्रीय बीमारी है। हमारा समाज भूलने में विश्वगुरु है।

हम भूल जाते हैं रेलवे स्टेशन की वह दुर्गंध, शहरों की वह अव्यवस्था, सरकारी दफ्तरों की वह निराशा, और फिर किसी भी परिवर्तन को स्वाभाविक मान लेते हैं। जो काम हो गया, वह मानो हमेशा से था। जो सुविधा मिल गई, वह जैसे जन्मसिद्ध अधिकार थी। इतिहास का सबसे कठिन काम उपलब्धियाँ अर्जित करना नहीं, बल्कि लोगों को उनकी याद दिलाते रहना है।

मोदी की आलोचना होनी चाहिए। किसी भी लोकतंत्र में सत्ता आलोचना से ऊपर नहीं हो सकती। लेकिन आलोचना और उन्माद में अंतर होता है। समस्या तब पैदा होती है जब आलोचक का लक्ष्य सुधार नहीं, केवल ध्वंस रह जाता है। जब हर सड़क में तानाशाही दिखने लगे, हर फैसले में फासीवाद और हर चुनाव में लोकतंत्र की अंतिम साँस सुनाई देने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि विश्लेषण कम और पूर्वाग्रह अधिक बोल रहा है।

मोदी के समर्थकों की भी अपनी अंधताएँ हैं और विरोधियों की भी। मगर भारतीय राजनीति का कठोर सत्य यह है कि किसी भी नेता का मूल्यांकन उसके विकल्पों से होता है, कल्पनाओं से नहीं। लोकतंत्र में जनता अंततः देवता नहीं चुनती, उपलब्ध विकल्पों में अपेक्षाकृत बेहतर प्रबंधक चुनती है। इसीलिए मोदी का प्रश्न केवल मोदी का प्रश्न नहीं है। वह उस भारत का प्रश्न है जो एक साथ परंपरा और आधुनिकता, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र, विकास और पहचान, आस्था और संविधान के बीच अपना रास्ता तलाश रहा है।

वामपंथी जो न कर सके, घृणित जातिवादी जो न कर सके, वह 2014 के बाद पैदा नवतुरिया राष्ट्रवादियों (हे राम!) और स्वर्ण-रजत मवादियों ने कर दिया। मैं कभी व्यक्ति को आदर्श नहीं मानता, लेकिन इन गधों-नाबदानियों की वजह से कट्टर मोदीभक्त कहलाने को तैयार हूँ, उसी कतार में हूँ।

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top