आदरणीय थानवी जी, नमस्कार  

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राजकिशोर

दिल्ली। हिंदी दिवस पर आपने ने याद दिलाया कि हिंदी फ़ारसी शब्द है। शुक्रिया। अब वाक्य पूरा कर लीजिए, क्योंकि आधे में छोड़ा गया वाक्य सूचना नहीं, चुटकी होता है। वह क्यों लेने की जरूरत है यहां पर..? सवाल उठाकर बस आगे बढ़ता हूँ.। निहितार्थ समझदार लोग निकाल लेंगे।

पहली बात जो सूची घुमाई गई है, इसमें आधे शब्द भारत को मिला दान नहीं, भारत के नाम पर कटी रसीद हैं।सूची यह है…हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान, हिंदवी, हिंदसा, हिंदबा, हिंदुवाना। और निष्कर्ष यह कि उदारमना हिंदी ने ये सब अरबी-फ़ारसी से लेकर अपना शब्द-भंडार भरा।

उदारता पर कोई विवाद नहीं। व्युत्पत्ति में उदारता से ज़्यादा ईमानदारी चाहिए, विवाद उस पर है।
हिंदुवाना को लीजिए। फ़ारसी में इसका शाब्दिक अर्थ ही है “हिंदी वाला”, यानी भारत वाला फल…तरबूज़। हिंदी रेवंद यानी भारत से आने वाला रेवतचीनी। और जिन अंकों से यह सब गिनती चल रही है, अरबों ने उन्हें ख़ुद अरक़ाम-ए-हिंदिया कहा, हिंदी अंक, क्योंकि वे यहीं से गए थे। ये शब्द हिंदी को दान में नहीं मिले। कोई अपनी ही रसीद दिखाकर एहसान गिनाए, यह उदारता नहीं, हिसाब में चूक है।
दो शब्द तो सूची में सिर्फ़ आवाज़ के दम पर घुसे हैं।

हिंदबा यानी कासनी। इसका रिश्ता आरामी के हेन्दबा से है, उसी कुल से यूनानी एन्तुबोन और लातीनी इन्तुबुस बने, जिनसे अंग्रेज़ी का एंडिव निकला। हिंद से कोई नाता नहीं।

हिंदसा मध्यकालीन फ़ारसी के हन्दाज़ग से आया है, अर्थ नाप और ढंग। इसी परिवार से फ़ारसी का अंदाज़ा और अरबी का हंदसा बने। यहाँ भी हिंद देखकर भारत खोज लेना व्युत्पत्ति नहीं, शब्द-पहचान की जल्दबाज़ी है।
अब मूल शब्द पर। ईरानी भाषाओं में शब्द के आरंभ का स ह हो जाता है। संस्कृत का सप्त अवेस्ता में हप्त है, सोम हओम है, असुर अहुर है, सरस्वती हरह्वती है। उसी नियम से सिन्धु से हिन्दु। दारा प्रथम के शासनकाल के अभिलेखों में, लगभग 520 से 486 ईसा पूर्व के बीच, सिंधु घाटी का प्रांत हिदुश दर्ज है। पुरानी फ़ारसी लिपि में व्यंजन से पहले का न लिखा नहीं जाता था, इसलिए उच्चारण हिंदुश ही पुनर्निर्मित होता है। अवेस्ता का हप्त हिंदु ऋग्वेद के सप्त सिन्धवः का ही रूप है।

रास्ता यह हुआ ….सिंधु से हिंदु, हिंदु से हिंद, और आगे यूनानी परंपरा में इंदोस तथा इंडिया।
तो अगर फ़ारसी माध्यम से आया रूप उधार है, तो उसी तर्क से इंडिया को यूनानियों की उधारी कहेंगे? नाम का किसी दूसरी भाषा में नया रूप ले लेना वंश बदल जाना नहीं होता।

एक मत और है, अल्पमत में। कुछ विद्वान कहते हैं कि स से ह ईरानी देन नहीं, सौराष्ट्र का उच्चारण है….वहाँ सोरठ होरठ बोला जाता है और सोमनाथ होमनाथ। उनका तर्क यह भी कि फ़ारसी-अरबी में सिंध और हिंद दोनों साथ चलते रहे। मुख्यधारा भाषाविज्ञान इसे नहीं मानता, क्योंकि स से ह का बदलाव एक निश्चित काल में हुआ और उसके बाद के या दोबारा लिए गए रूप उससे अछूते रह गए। पर मज़ा यह है कि यह मत सही निकले तब भी सूची डूबती है, क्योंकि तब हिंदु फ़ारसी की देन नहीं, काठियावाड़ का घरेलू उच्चारण ठहरेगा। दोनों रास्ते घर की ओर ही जाते हैं।

एक बात पहले ही साफ़ कर दूँ, क्योंकि आपकी दी सूची से पाठक निष्कर्ष यही निकालेगा। हिंदी नाम का रूप फ़ारसी हिंदी से आया, यह सच है, और उसमें लगा ई प्रत्यय भी फ़ारसी-अरबी का है। लेकिन हिंदी भाषा फ़ारसी की संतान नहीं। उसका विकास भारतीय इंडो-आर्यन परंपरा में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और शौरसेनी की लंबी धारा से हुआ है। नाम का रास्ता और भाषा का वंश, दो अलग चीज़ें हैं। जर्मन ख़ुद को डॉयच कहते हैं, जापानी अपने देश को निप्पोन, फ़िनलैंड ख़ुद को सुओमी, मतलब लेबल बाहर का, रीढ़ अपनी।
और हाँ, हिंदी ने फ़ारसी-अरबी से हज़ारों शब्द लिए हैं। दरवाज़ा, काग़ज़, क़लम, अदालत जैसे शब्दों को वापस भेजने कोई नहीं जा रहा। भाषा जातीय सीमा पर खड़ा चौकीदार नहीं होती।

थानवीजी, आपने ने पूछा..कहना क्या चाहते हो। एक वाक्य में बता देता हूँ। आपत्ति आपके किसी हवाले पर नहीं, आपके एक शब्द पर है। वह शब्द है मूलतः।
आपने लिखा कि हिंदी मूलतः फ़ारसी भाषा का शब्द है। शब्दकोश यह नहीं कहते। शब्दकोश कोष्ठक में लिखते हैं फ़ा॰, और वह आगत भाषा बताता है, मूल नहीं। मतलब शब्द हिंदी में किस रास्ते से आया, यह बताता  है। यह नहीं बताता कि वह बना कहां था। रास्ता और जन्म दो अलग चीज़ें हैं, और यह भेद मैंने नहीं गढ़ा, कोशकारों ने बरता है।
अब आपने जिन कोशों का नाम लिया, उन्हीं में से पहले का पन्ना खोलते हैं। हिंदी शब्दसागर, नागरी प्रचारिणी सभा, प्रधान संपादक बाबू श्यामसुंदर दास। प्रविष्टि… हिंद।
कोष्ठक में लिखा है फ़ा॰। और उसके ठीक नीचे, उसी प्रविष्टि में, विशेष टिप्पणी है कि यह शब्द वास्तव में सिंधु शब्द का फ़ारसी उच्चारण है। आगे वही कोश लिखता है कि ईसा से 500  वर्ष पहले दारा प्रथम के समय सिंधु नदी के आसपास के प्रदेश पर पारसियों का अधिकार हो गया था, कि प्राचीन पारसी भाषा में संस्कृत के ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ होता था, जैसे संस्कृत सप्त और फ़ारसी हफ़्त, कि इसी नियम से सिंधु का उच्चारण हिंदु या हिंद हुआ, कि आवस्ता के हफ़्तहिंद का उल्लेख वेदों में सप्तसिंधु है, और कि यूनानियों ने फ़ारसी हिंद को इंड या इंडिका कहा, जिससे आज का इंडिया बना।
थानवी जी, मेरी पूरी पोस्ट में एक भी बात ऐसी नहीं थी जो इस प्रविष्टि में पहले से न हो। ‘स’ से ‘ह’ का नियम, सप्त और हफ़्त, दारा प्रथम, हफ़्तहिंद और सप्तसिंधु, हिंद से इंडिया… आप देख लें, सब यहीं दर्ज है।
तो अब सवाल यह नहीं रह जाता कि कौन शब्दकोश के साथ है और कौन उसके ख़िलाफ़। सवाल यह है कि हम दोनों में से किसने वह प्रविष्टि पूरी पढ़ी। आपने कोष्ठक पढ़ा। विशेष नहीं पढ़ा। और विशेष में वही लिखा है जिसे आप मेरी उपज बता रहे हैं।
अब संदेशवाहक वाली बात। संदेशवाहक चिट्ठी पहुंचाता है, ऊपर अपनी टीप नहीं लगाता। आपकी पोस्ट में तीन चीज़ें ऐसी थीं जो किसी कोश में नहीं मिलेंगी। पहली… मूलतः। दूसरी.. उदारमना हिंदी ने लेकर अपना भंडार समृद्ध किया। तीसरी…जिन्हें नहीं मालूम, उन्हें आज हिंदी दिवस पर कम-से-कम इतना तो बता ही दें।
सर, कोश न विशेषण लगाते हैं, न निष्कर्ष सुनाते हैं, न यह तय करते हैं कि किसे क्या नहीं मालूम। आप ख़ुद लिखते हैं कि व्युत्पत्ति जोड़ने के आप अधिकारी नहीं। सहमत हूं। पर मूलतः लिख देना व्युत्पत्ति का सबसे बड़ा दावा है। एक ही वाक्य में संदेशवाहक भी रहना और फ़ैसला भी सुना देना, दोनों नहीं हो सकता।
एक बात आपने बिल्कुल ठीक पकड़ी है, और मैं उसे बिना किसी शर्त के स्वीकार करता हूँ। आपने समूची हिंदी को फ़ारसी की संतान कहीं नहीं कहा था। वह पंक्ति मैंने पाठक के संभावित निष्कर्ष को रोकने के लिए लिखी थी, पर अगर वह आपके मुँह में डाला गया वाक्य लगी, तो मैं उसे वापस लेता हूँ। विमर्श में जो ग़लत हो, उसे छोड़ देना चाहिए। पूर्वजों और वरिष्ठों ने यही सिखाया है।
अब उसके बदले में यह देखिए कि आपकी लंबी टिप्पणी में क्या नहीं है। मैंने दो ठोस बातें रखी थीं। एक-हिंदबा का हिंद से कोई रिश्ता नहीं, वह आरामी के हेन्दबा से आया है और उसी कुल से यूनानी एन्तुबोन तथा अंग्रेज़ी का एंडिव बने। दो-हिंदसा का हिंद से कोई रिश्ता नहीं, वह मध्यकालीन फ़ारसी के हन्दाज़ग से आया है, जिससे अंदाज़ा बना, अर्थ है नाप। इन दोनों पर आपने एक शब्द नहीं लिखा। पूरी टिप्पणी में नहीं। आपने विज्ञापन का जुमला लिखा, कोशों की सूची लिखी, मेरे मनोविज्ञान पर लिखा, ताजमहल पर लिखा। आरामी और हन्दाज़ग पर कुछ नहीं। जब तथ्य का जवाब नहीं होता, तब विषय बदलता है, दुर्भाग्य से यह हम दोनों के पेशे की सबसे पुरानी पहचान है।
और ध्यान दीजिए, मैंने यह कहीं नहीं कहा कि ये शब्द ग़लत हैं या हिंदी में नहीं रहने चाहिए। मैंने साफ़ लिखा था कि दरवाज़ा, काग़ज़, क़लम, अदालत.. कोई इन्हें लौटाने नहीं जा रहा, और भाषा जातीय सीमा पर खड़ा चौकीदार नहीं होती। इसलिए कोशकारों में बेईमानी मुझे नहीं दिख रही। मैं तो उन्हीं के लिखे विशेष को पढ़कर समृद्ध हो रहा हूं और वही सुना रहा हूं।
रही यहीं से गए थे वाली बात, जिसमें आपको भाषाविज्ञान से ज़्यादा मनोविज्ञान सुनाई दिया। अरक़ाम-ए-हिंदिया मेरा गढ़ा पद नहीं है, वह अरब गणितज्ञों का अपना पद है। हिंदुवाना का शाब्दिक अर्थ भी मैंने तय नहीं किया, फ़ारसी ने किया। अगर यह बताना कि कोई शब्द भारत से गया, पीठ थपथपाना है, तो यह बताना कि कोई शब्द भारत आया, क्या कहलाएगा? यात्रा की दिशा तथ्य होती है, मनोदशा नहीं। और मनोविज्ञान का आरोप बहस का सबसे सस्ता औज़ार है, क्योंकि उसका न कोई प्रमाण देना पड़ता है न कोई खंडन संभव होता है।
अंत में ताजमहल और तेजोमहालय। इस तुलना का जवाब मैं ठंडे मन से दूंगा।
तेजोमहालय का सिद्धांत प्रमाण से इनकार पर खड़ा होता है। दस्तावेज़ मौजूद हैं और उन्हें नकारा जाता है। मैंने जो किया, उसका उल्टा है। मैंने प्रमाण गिनाए, और आज जो सबसे बड़ा प्रमाण सामने रखा है वह आपके ही बताए कोश का है। तो इस तुलना में स्थिति यह बनती है कि जिसने शब्दसागर का विशेष पढ़कर उद्धृत किया, उसे तेजोमहालय वाला कहा जा रहा है, और कहने वाले ने उसी प्रविष्टि में कोष्ठक से आगे नहीं पढ़ा।
थानवी जी, आप इस भाषा के वरिष्ठतम लोगों में हैं। आपकी क़लम का वज़न है, और उसी वज़न के कारण आपका एक विशेषण किसी को स्थायी रंग में रंग सकता है। आपने पहले मुझे ज्ञान देने वाला कहा, फिर आत्ममुग्ध होने का इशारा किया, फिर मनोविज्ञान पढ़ा, और अंत में एक रंग दे दिया। मैं उस रास्ते पर नहीं जाऊँगा। मेरा आपसे न कोई मतभेद है न कोई मनमुटाव। बात दावे की है।
और दावे की स्थिति यह है। आपने कहा, हिंदी मूलतः फ़ारसी का शब्द है। शब्दसागर कहता है, यह शब्द वास्तव में सिंधु शब्द का फ़ारसी उच्चारण है। इन दोनों वाक्यों में से एक ही सही हो सकता है।

हिंदी उदार है, इसमें शक नहीं। मगर इतनी भी नहीं कि हर हिंद से शुरू होने वाले शब्द की रसीद अपने नाम लिखवा ले।

हिंदी दिवस पर शब्दों का सम्मान कीजिए। उनकी वंशावली भी पढ़ लीजिए।

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