तो मूल प्रश्न यह है कि *भाजपा के इस वैचारिक अधिष्ठान का रचयिता कौन है ? आज पूरा देश डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रद्धांजलि दे रहा है, कुछ भारतीय राजनीति में उनके योगदान को लेकर, कुछ भारतीय जनसंघ के संस्थापक के रूप में और कुछ राजनीतिक चलन के कारण उन्हें याद कर रहे हैं लेकिन क्या उन्हें सिर्फ़ इसीलिए याद किया जाना पर्याप्त है ?*
श्यामा प्रसाद मुखर्जी को इसलिए याद किया जाना चाहिए कि वे पहले भारतीय राजनेता थे जिन्होंने नेहरू – लियाकत समझौते के विरोध में देश के उद्योग मंत्री के पद से त्यागपत्र देकर *1950 में यह सोचा कि देश को एक ऐसे राजनीतिक दल की आवश्यकता है, जो नेहरू के खोखले साम्यवाद, छद्म धर्मनिरपेक्षता, अवसरवादी गांधीवादी राजनीति के चुंगल से मुक्त हो और इस देश में धर्म के आधार पर पक्षपात नहीं हो। एक देश में दो संविधान, दो प्रधान और दो निशान ना हों। यानि वो पहले राजनेता थे जिन्होंने भारत की एकात्मता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को समझा और एक ऐसे राजनीतिक दल को जन्म दिया, जिसने उनके विचार को राजनीतिक अधिष्ठान बना दिया।* उनके इस विचार को बल मिला पूजनीय श्रीगुरु जी ( माधव राव सदाशिव गोलवलकर) से। जिन्होंने दीनदयाल उपाध्याय के रूप में एक ऐसा सहयोगी दिया कि वो तब के जनसंघ और आज की भाजपा के प्रेरणा स्रोत बन गए।
राजनीति में हक़ और समाधान की बातें खूब उठती हैं। भारतीय राजनीति में ऐसे दो पुरोधा हुए हैं, एक डॉ अंबेडकर और दूसरे डॉ मुखर्जी । दोनों को ही देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उपेक्षित और अपमानित किया, दोनों नेहरू से मतभेदों के चलते कांग्रेस से अलग हुए लेकिन डॉ मुखर्जी ने अपनी ऊर्जा कांग्रेस का राष्ट्रवादी विकल्प तैयार करने में लगा दी। यह वह बड़ी बात है जिसके लिए उनको पूजा जाना चाहिए। उन्होंने समाधान के लिए संघर्ष किया।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी 6 जुलाई 1901 में जन्में और 23 जून 1953 में कश्मीर की जेल में संदिग्ध हालत में मृत पाए गए। जीवन के 52 वर्षों में उन्होंने राष्ट्रीय चेतना का एक ऐसा दीप प्रज्ज्वलित कर दिया, जो सूरज बनकर करोड़ों हिंदुओं और सनातनियों के संताप को नष्ट कर रहा है।



