‘जलालाबाद’ से ‘परशुरामपुरी’ बनने की गौरवगाथा में सांस्कृतिक और आर्थिक पुनरुत्थान

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रुद्र प्रताप दुबे

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक बार फिर सांस्कृतिक पुनर्स्थापना की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। 6 जुलाई को उत्तर प्रदेश सरकार की कैबिनेट बैठक में शाहजहांपुर जिले की जलालाबाद तहसील का नाम बदलकर ‘परशुरामपुरी’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। मुग़ल कालीन नाम को हटाकर अपनी मूल सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटना, मात्र एक नाम का परिवर्तन नहीं बल्कि भारत के गौरवशाली अतीत और सनातन अस्मिता की पुनर्स्थापना है। जलालाबाद से परशुराम पुरी की यह यात्रा केवल एक कस्बे के नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं है। यह उस सोच का विस्तार है जिसमें स्थानीय इतिहास, लोक-आस्था और सांस्कृतिक स्मृति को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है। भगवान परशुराम, जो शस्त्र और शास्त्र दोनों के प्रतीक माने जाते हैं, उनकी जन्मस्थली को उचित पहचान मिलना नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का माध्यम बन सकता है।

जलालाबाद का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह भगवान परशुराम की तपोभूमि और जन्मस्थली रहा है। इसके बाद, महाभारत काल में भी इस क्षेत्र का विशेष महत्व था, माना जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का कुछ समय यहाँ के वनों में बिताया था लेकिन मुग़ल काल में थोपे गए इस नाम के कारण इस भूमि की वास्तविक पहचान कहीं छिप गई थी। मुग़ल दस्तावेज़ों में भी इस क्षेत्र का ज़िक्र एक महत्वपूर्ण परगने के रूप में करके इसकी महत्वपूर्ण धार्मिक पहचान को मिटाने का काम किया गया।

प्राचीन, सनातन और वास्तविक गौरव ‘परशुरामपुरी’ का यह नाम परिवर्तन वास्तविकता में केवल धार्मिक नहीं, बल्कि इस क्षेत्र के लिए एक बड़ा आर्थिक गेम-चेंजर साबित होने जा रहा है। जैसे ही यह क्षेत्र आधिकारिक तौर पर ‘परशुरामपुरी’ के रूप में स्थापित होगा, देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं और पर्यटकों का आवागमन बढ़ेगा। पर्यटकों की संख्या बढ़ने से होटल, लॉज, परिवहन, हस्तशिल्प, और पूजा-सामग्री से जुड़े स्थानीय व्यापार को भारी गति मिलेगी। युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। परशुरामपुरी के भव्य विकास के लिए सड़कों का चौड़ीकरण, मंदिर परिसर का सुंदरीकरण और बुनियादी ढांचागत विकास तेज होगा, जिससे इस पूरे क्षेत्र के आर्थिक स्तर में भारी सुधार देखने को मिलेगा। अयोध्या, काशी और मथुरा जैसे धार्मिक केंद्रों में हाल के वर्षों में हुए कायाकल्प के बाद वहां श्रद्धालुओं की संख्या और स्थानीय आय दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है—परशुरामपुरी से भी वैसी ही अपेक्षा की जा रही है।वर्तमान में केंद्रीय राज्यमंत्री जितिन प्रसाद जब उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग के मंत्री थे तब बीजेपी की डबल इंजन सरकार ने परशुराम मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण, सड़क संपर्क, बिजली-पानी की बेहतर व्यवस्था और श्रद्धालु सुविधा केंद्रों पर निवेश करना प्रारंभ कर दिया था। अब शाहजहांपुर से सटे जिलों के लोगों का मानना है कि यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में एक प्रमुख धार्मिक-पर्यटन गंतव्य के रूप में उभर सकता है। शाहजहांपुर, जो अब तक मुख्यतः कृषि और लघु उद्योगों पर निर्भर रहा है, मात्र इस पहचान के जरिए ही धार्मिक अर्थव्यवस्था के मानचित्र पर भी अपनी जगह बना सकता है।

जलालाबाद को ‘परशुरामपुरी’ बनाने का यह निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस वृहद् सोच का हिस्सा है, जो भारत के सांस्कृतिक पुनरुत्थान को राष्ट्र के विकास का आधार मानती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्पष्ट मानना है कि भगवान परशुराम केवल एक जाति या वर्ग के आराध्य नहीं, बल्कि पूरे भारत के न्याय, करुणा और पुरुषार्थ के प्रतीक हैं। वहीं, गृहमंत्री अमित शाह ने कई अवसरों पर रेखांकित किया है कि भारत की प्राचीन अस्मिता और महापुरुषों के गौरव को पुनर्स्थापित करना ही ‘अमृत काल’ का मुख्य संकल्प है। वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां ‘विकास भी और विरासत भी’ की सोच को लेकर आगे बढ़ते हैं वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार यह रेखांकित करते रहे हैं कि उनकी सरकार विकास के साथ-साथ प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक पहचान को भी मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। बीते वर्षों में इलाहाबाद से प्रयागराज, मुगलसराय से पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर जैसे कई नामकरणों के जरिए यह नीति लगातार आगे बढ़ी है। इस ऐतिहासिक निर्णय को धरातल पर उतारने का श्रेय केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद के साथ ही शाहजहाँपुर के स्थानीय जनप्रतिनिधियों के अनथक प्रयासों को जाता है। स्थानीय विधायकों और जनप्रतिनिधियों के एकजुट नेतृत्व और ‘भगीरथ प्रयास’ का ही परिणाम है कि शासन-प्रशासन स्तर की सभी कड़ियों को पार करते हुए इस प्रस्ताव को कैबिनेट की अंतिम मंजूरी मिल सकी। जनप्रतिनिधियों की इस सजगता ने क्षेत्र के लोगों को अपनी जड़ों पर गर्व करने का ऐतिहासिक अवसर देते हुए इस ऐतिहासिक क्षेत्र को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान देने का रास्ता खोल दिया है। अयोध्या में श्री राम मंदिर और काशी में विश्वनाथ कॉरिडोर के दिव्य स्वरूप के बाद, अब परशुरामपुरी का यह कायाकल्प सनातन संस्कृति के ध्वज को और ऊँचा ले जाएगा।

स्थानीय जनता की वर्षों पुरानी मांग को पूरा करके सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि आधुनिक विकास के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोना ही ‘नव्य उत्तर प्रदेश’ का असली मंत्र है। ‘परशुरामपुरी’ अब न केवल आस्था का एक बड़ा केंद्र बनेगी, बल्कि शाहजहांपुर और आसपास के जिलों के लिए आर्थिक समृद्धि का एक नया द्वार भी खोलेगी।

( लेखक सामाजिक विषयों के जानकार हैं)

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रुद्र प्रताप दुबे

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लेखक सामाजिक विषयों के जानकार हैं)

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