नई पीढ़ी को भा रही है धर्म की राह: पहले बुढ़ापे में होती थी तीर्थ यात्रा 

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मथुरा (उप्र) : सुबह की ठंडी हवा में घंटियों की आवाज गूंजती है। दूर तक युवाओं के जत्थे दिखाई देते हैं। किसी के कंधे पर कांवर है, कोई नंगे पांव परिक्रमा कर रहा है, तो कोई दोस्तों के साथ भजन गाते हुए पहाड़ चढ़ रहा है। मोबाइल जेब में है, सेल्फी भी चल रही है और भगवान का नाम भी।
यही भारत की नई तीर्थयात्रा है।
धर्म अब केवल बुजुर्गों की चिंता नहीं रहा। आज का युवा मंदिर जा रहा है, परिक्रमा कर रहा है, कांवर उठा रहा है और कठिन यात्राओं में शामिल हो रहा है। मगर उसकी यात्रा का मकसद केवल पूजा नहीं है। इसमें आध्यात्मिक सुकून, सांस्कृतिक पहचान, दोस्ती, रोमांच और घूमने-फिरने का आनंद भी शामिल है।
यानी आस्था और पर्यटन का नया मेल सामने आ रहा है। बीयर के साथ भांग भी!
चारधाम, अमरनाथ, वैष्णो देवी, करौली माता यात्रा, श्री बांके बिहारी, नाथद्वारा दर्शन, सबरीमाला, वृंदावन और गोवर्धन की परिक्रमा में युवाओं की मौजूदगी अब आम बात है। सावन में गंगा जल लेकर शिव मंदिरों की ओर बढ़ते कांवरियों के जत्थों में बड़ी संख्या युवा चेहरों की होती है। लड़कियां भी शामिल हो रहीं हैं। मैसूर, ऋषिकेश के योग केंद्रों में गोरे विदेशियों के साथ भारतीय युवजन भी आस्था और नव_पुरातन संस्कृति में डुबकी लगा रहे हैं!
इसे केवल धार्मिक उत्साह कहकर नजरअंदाज करना आसान होगा। मगर तस्वीर इससे कहीं बड़ी है।
धर्म की ओर क्यों लौट रहा है युवा?
आधुनिक जीवन ने सुविधाएं तो खूब दी हैं, लेकिन सुकून कम कर दिया है। नौकरी का दबाव, प्रतियोगिता, सोशल मीडिया की लगातार हलचल, रिश्तों में दूरी और अकेलापन युवा मन को थका रहे हैं।
ऐसे में मंदिर, आश्रम और तीर्थस्थल एक अलग दुनिया देते हैं। कुछ दिन मोबाइल और दफ्तर से दूरी, सुबह जल्दी उठना, पैदल चलना, भजन सुनना और हजारों लोगों के साथ समय बिताना मन को राहत देता है।
धर्म का यह नया आकर्षण युवाओं की पहचान से भी जुड़ रहा है। अपनी जड़ों, परंपराओं और संस्कृति को करीब से देखने की इच्छा बढ़ी है। सोशल मीडिया ने भी इसे हवा दी है। यात्रा की तस्वीरें, रील और वीडियो दूसरे युवाओं को भी इन रास्तों पर खींच रहे हैं।
एक तरह से धार्मिक यात्रा अब आस्था के साथ अनुभव की यात्रा बन रही है।
तीर्थ या थेरेपी?
लंबी पैदल यात्रा शरीर को सक्रिय रखती है। नियमित दिनचर्या मन को कुछ अनुशासन देती है। सामूहिक भजन और प्रार्थना अकेलेपन को कम कर सकते हैं।
गोवर्धन की 21 किलोमीटर परिक्रमा हो या सबरीमाला की कठिन चढ़ाई, शरीर पसीना बहाता है और मन एक लक्ष्य पर टिकता है। यात्रा पूरी होने के बाद मिलने वाला संतोष कई यात्रियों के लिए खास अनुभव बन जाता है।
कुंभ, माघ मेला और बड़े धार्मिक आयोजनों में भी सामूहिक स्नान, ध्यान, हवन, उपवास और भजन जैसी गतिविधियां लोगों को एक साझा माहौल देती हैं। कई लोगों को ऐसी यात्राओं के बाद मन हल्का और अधिक शांत महसूस होता है।
इसीलिए ‘पिलग्रिमेज थेरेपी’ की बात होने लगी है। हालांकि इसे किसी बीमारी का इलाज मानना सही नहीं होगा। मानसिक बीमारी होने पर डॉक्टर की सलाह और उपचार जरूरी है। लेकिन तनाव और रोजमर्रा की मानसिक थकान से राहत के लिए आध्यात्मिक वातावरण मददगार हो सकता है।

युवाओं की बढ़ती धार्मिक भागीदारी भारतीय समाज में एक बड़े बदलाव का संकेत भी है। धर्म अब निजी पूजा तक सीमित नहीं है। वह पहचान, सामाजिक जुड़ाव और सामूहिक उत्सव का हिस्सा बन रहा है।

कांवर यात्रा इसका बड़ा उदाहरण है। हजारों युवा एक साथ चलते हैं। रास्ते में संगीत है, नारे हैं, भोजन और सेवा शिविर हैं। दोस्ती है और सामूहिक जोश भी है।
इसी तरह वृंदावन और गोवर्धन में युवा भक्ति के साथ यात्रा का आनंद लेते हैं। मंदिर दर्शन के बाद बाजार, स्थानीय भोजन, संगीत और सांस्कृतिक स्थलों का अनुभव भी यात्रा का हिस्सा बन जाता है।
इंस्टा रील बनाने की धुन ने भी इस ट्रेंड को लोकप्रिय बनाया है। सोशल मीडिया पर धर्म, आस्था से जुड़े विडियोज की बाढ़ आ गई है। हर त्यौहार एक महा सेलिब्रेशन, अक्रॉस इंडिया बन चुका है।

तीर्थयात्रा अब बड़ा कारोबार भी है। होटल, धर्मशालाएं, टैक्सी, बसें, फूल, प्रसाद, पूजा सामग्री, स्थानीय भोजन और हस्तशिल्प से हजारों लोगों की रोजी जुड़ी है।
तिरुमला तिरुपति, वैष्णो देवी, शिरडी, काशी, वृंदावन और अयोध्या जैसे केंद्रों ने आसपास की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार दी है। बड़े धार्मिक आयोजनों में रेलवे, परिवहन, होटल और छोटे दुकानदारों को भी फायदा मिलता है।

डिजिटल दुनिया ने इसे और आसान बना दिया है। ऑनलाइन दर्शन, डिजिटल दान, पूजा बुकिंग और धार्मिक ऐप युवाओं को सुविधा दे रहे हैं।
सरकार भी धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रही है। PRASAD जैसी योजनाओं का उद्देश्य तीर्थस्थलों की सुविधाएं और बुनियादी ढांचा बेहतर करना है।
लेकिन विकास का मतलब केवल चमकदार गलियां और बड़े कॉरिडोर नहीं होना चाहिए। साफ पानी, स्वच्छ शौचालय, सस्ता ठहराव, सुरक्षित रास्ते और कचरा प्रबंधन भी उतने ही जरूरी हैं।

बढ़ती धर्मयात्राओं का एक दूसरा पहलू भी है। जब आस्था पर्यटन और बाजार से जुड़ती है, तो खतरा रहता है कि श्रद्धा कहीं केवल कारोबार न बन जाए।
युवाओं को धार्मिक यात्रा में जगह मिलना अच्छी बात है। लेकिन धर्म के नाम पर नफरत, दिखावा और अंधविश्वास बढ़ना चिंता की बात होगी।
तीर्थ का मतलब केवल भीड़ बढ़ाना नहीं है। इसका मतलब मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाना भी है।

युवा अगर मंदिर जा रहा है, तो उसे करुणा, सहिष्णुता और सेवा भी सीखनी चाहिए। अगर वह परिक्रमा कर रहा है, तो रास्ते में पड़े कूड़े को देखकर आंखें नहीं मूंदनी चाहिए। अगर वह नदी में स्नान कर रहा है, तो उसी नदी को गंदा करने से भी बचना चाहिए।
यही असली धार्मिकता होगी।
मंदिर तक जाने वाला रास्ता भीतर भी जाता है
भारत में तीर्थयात्रा का पुराना रास्ता फिर जवान हो रहा है। कांवर उठाते कंधे, पहाड़ चढ़ते कदम और परिक्रमा करते युवा इसके गवाह हैं।
आज का युवा शायद मोक्ष की तलाश में नहीं निकला है। वह सुकून खोज रहा है। वह अपनी जड़ों को समझना चाहता है। दोस्तों के साथ यात्रा करना चाहता है। कुछ दिन जिंदगी की भागदौड़ से दूर रहना चाहता है।
और हां, वह घूमना भी चाहता है।
इसलिए नई तीर्थयात्रा में धर्म भी है, पर्यटन भी; आस्था भी है और आनंद भी; शरीर की मेहनत भी है और मन की तलाश भी।
सवाल यह नहीं कि युवा धर्म की ओर क्यों लौट रहा है। बड़ा सवाल यह है कि धर्म उसे किस दिशा में ले जा रहा है।
अगर यह यात्रा उसे अधिक संवेदनशील, स्वस्थ, अनुशासित और सहिष्णु बनाती है, तो शायद तीर्थ सचमुच एक तरह की देसी थेरेपी बन सकता है।
पुरानी कहावत है: चलते रहो, रास्ता खुद रास्ता दिखाएगा।
शायद भारत के ये प्राचीन तीर्थमार्ग आज के युवा को यही रास्ता दिखा रहे हैं; भगवान तक पहुंचने का ही नहीं, बल्कि खुद तक लौटने का भी।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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