विश्व फोटोग्राफी डे:  ताज कैमरे की आंख में कैद होती एक अनंत कहानी

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मुंबई : एक क्लिक होता है और सदियों पुरानी इमारत अचानक जिंदा हो उठती है। संगमरमर पर ठहरी रोशनी बदलती है, यमुना की लहरें करवट लेती हैं और ताजमहल एक नए चेहरे के साथ कैमरे में उतर जाता है।
सवाल यह है कि आखिर इस इमारत में ऐसा क्या है, जो लाखों तस्वीरों के बाद भी कैमरे को फिर से क्लिक करने के लिए मजबूर करता है?
यही ताज का जादू है। सदियां गुजर गईं, कैमरे बदल गए, तकनीक आसमान छू गई, लेकिन ताज की तस्वीर का आकर्षण कम नहीं हुआ।
विश्व फोटोग्राफी दिवस, 19 अगस्त, पर ताजमहल एक बार फिर कैमरे की दुनिया के केंद्र में है। 17वीं सदी का यह मकबरा फोटोग्राफी की कई पीढ़ियों का गवाह रहा है। भारी लकड़ी के कैमरों और कांच की प्लेटों से शुरू हुई कहानी आज स्मार्टफोन, ड्रोन और हाई-रिजॉल्यूशन कैमरों तक पहुंच चुकी है।
आगरा में फोटोग्राफी की यह दास्तान भी कम दिलचस्प नहीं है। एमजी रोड का प्रिया लाल एंड सन्स फोटो स्टूडियो इसका जिंदा सबूत है। वर्ष 1878 में शुरू हुआ यह स्टूडियो आज भी मौजूद है और परिवार की छठी पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है।
उस दौर में तस्वीर खींचना चुटकी का खेल नहीं था। बिजली आम नहीं थी। कैमरे भारी थे और तस्वीर तैयार करने के लिए अंधेरे कमरे में घंटों मेहनत करनी पड़ती थी। प्रिया लाल के डार्करूम में प्राकृतिक रोशनी को पर्दों और शीशों की मदद से नियंत्रित किया जाता था। फोटोग्राफी तब तकनीक से ज्यादा सब्र, हुनर और बारीक नजर का इम्तिहान थी।
प्रिया लाल खंडेलवाल ने ताजमहल और आगरा के दूसरे ऐतिहासिक स्मारकों की अनेक तस्वीरें तैयार कीं। उनकी तस्वीरें इंग्लैंड की महारानी तक पहुंचीं और उन्हें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। उनकी पुस्तक ‘Pictorial Agra’ में आगरा के स्मारकों की 25 हाफ-टोन तस्वीरें और उनका संक्षिप्त इतिहास दर्ज है। यह सिर्फ तस्वीरों की किताब नहीं, बल्कि उस दौर के आगरा की एक दृश्य स्मृति है।
लेकिन आगरा और ताज की फोटोग्राफी की कहानी राजा दीन दयाल के बिना अधूरी है। 1844 में जन्मे दीन दयाल ने 19वीं सदी के भारत को कैमरे की नजर से दुनिया के सामने रखा। वे हैदराबाद के निजाम के दरबारी फोटोग्राफर बने और उन्हें ‘राजा मुसव्विर जंग’ की उपाधि मिली।
उनका कैमरा आज के मोबाइल फोन की तरह जेब में नहीं समाता था। विशाल लकड़ी के कैमरे, कांच की प्लेटें और भारी ट्राइपॉड लेकर वे बैलगाड़ियों और सहायकों के साथ लंबी यात्राएं करते थे। महल, किले, मंदिर, मस्जिदें, स्मारक, राजसी जुलूस, हाथी और शिकार; उन्होंने भारत की पूरी शानो-शौकत को अपने लेंस में समेटने की कोशिश की।
हैदराबाद में उनके कैमरे ने केवल इमारतों की खूबसूरती नहीं दिखाई। उसने रियासती जिंदगी, पहनावे, रस्मों, दरबारों और शाही ठाठ को भी हमेशा के लिए दर्ज कर दिया। आज उनके भारी कैमरे और कांच की नेगेटिव प्लेटें किसी संग्रहालय की वस्तु लग सकती हैं, लेकिन उन तस्वीरों में उन्नीसवीं सदी का भारत आज भी सांस लेता दिखाई देता है।
दीन दयाल की तस्वीरें एक अहम बात सिखाती हैं; बेहतरीन तस्वीर कैमरा नहीं, नजर बनाती है।
ताजमहल इस कहावत को हर रोज सही साबित करता है। फोटोग्राफर के सामने यहां केवल एक इमारत नहीं होती। रोशनी, पानी, आसमान, बादल, पेड़ और छाया मिलकर हर पल नया फ्रेम बनाते हैं।
सुबह की नरम धूप संगमरमर को गुलाबी और सुनहरा कर देती है। दोपहर में उसकी सफेदी तेज चमकती है। शाम ढलते ही ताज किसी पुराने ख्वाब की तरह नजर आता है। पूर्णिमा की रात वही इमारत चांदनी में तैरती हुई लगती है।
यमुना इस दृश्य की खामोश साझेदार है। पानी में ताज का प्रतिबिंब तस्वीर को एक अलग गहराई देता है। धुंध आए तो रहस्य बढ़ जाता है। बादल घिरें तो दृश्य में नाटकीयता उतर आती है। मेहताब बाग से नदी पार का दृश्य हो या मुख्य द्वार से लिया गया क्लासिक फ्रेम, हर कोण अपनी अलग कहानी कहता है।
ताज की तस्वीरों की लोकप्रियता को डायना बेंच ने भी नया आयाम दिया। 1992 में राजकुमारी डायना की यहां खींची गई तस्वीर ने इस जगह को दुनिया के सबसे चर्चित फोटो स्पॉट्स में शामिल कर दिया।
ताजमहल 1983 से यूनेस्को विश्व धरोहर है और 2007 में न्यू सेवन वंडर्स ऑफ द वर्ल्ड में शामिल हुआ। हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। आज लगभग हर हाथ में स्मार्टफोन है। लिहाजा ताज की तस्वीरें अब सिर्फ पेशेवर कैमरों से नहीं, मोबाइल स्क्रीन से भी पैदा होती हैं।
सेल्फी, रील और सोशल मीडिया ने ताज को एक नया डिजिटल जीवन दिया है। कभी फोटोग्राफर घंटों एक सही फ्रेम का इंतजार करता था। आज पर्यटक कुछ सेकंड में दर्जनों तस्वीरें खींच लेते हैं।
फिर भी सवाल अपनी जगह कायम है: लाखों तस्वीरों के बाद भी ताज पुराना क्यों नहीं पड़ता?
शायद इसलिए कि ताज सिर्फ पत्थर का स्मारक नहीं, एहसास का स्मारक है। हर आंख उसे अलग ढंग से देखती है और हर फोटोग्राफर उसमें कोई नया कोण खोज लेता है।
राजा दीन दयाल के भारी कैमरे से लेकर आज के स्मार्टफोन तक तकनीक ने लंबा सफर तय किया है। कैमरा छोटा होता गया, तस्वीर ज्यादा साफ होती गई, शूटिंग आसान होती गई। मगर ताज के सामने खड़ी हैरत आज भी वैसी ही है।
विश्व फोटोग्राफी दिवस पर ताज का पैगाम साफ है; कैमरा छोटा हो सकता है, मगर नजर बड़ी होनी चाहिए।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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