मुम्बई। नसीरुद्दीन शाह, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘जाहिल’ कहकर तीखी आलोचना की, खुद एक ऐसे खानदान से ताल्लुक रखते हैं जिसकी जड़ें 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के साथ खड़ी होने में हैं। शाह के परदादा (कुछ स्रोतों में परदादा या परपरदादा) जन-फिशान खान (सैय्यद मुहम्मद खान) अफगानिस्तान से आए एक कुख्यात मर्सिनरी लीडर थे।

जन-फिशान खान का नाम ही ‘जान बिखेरने वाला’ था। उन्होंने करीब 5,000 अफगान लड़ाकों-लुटेरों की टोली का नेतृत्व किया, जो किराए पर फौज उपलब्ध कराने का धंधा करते थे। 1857 की क्रांति से ठीक तीन महीने पहले, फरवरी में, उन्हें भारत में बगावत की खबर लगी। सबसे पहले उन्होंने अंग्रेजों को चेताया। जब मेरठ में विद्रोह फूटा, तो खान ने अपने घुड़सवारों की टुकड़ी लेकर ब्रिटिश जनरल विल्सन की मदद की। उनके लोग मेरठ, दिल्ली और झांसी तक अंग्रेजों के साथ लड़े।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरगति में इन अफगान लड़ाकों की भूमिका महत्वपूर्ण बताई जाती है। क्रूरता के लिए मशहूर ये सैनिक विद्रोहियों के खिलाफ अंग्रेजों की जीत में सहायक साबित हुए। इनाम में ब्रिटिश सरकार ने खान खानदान को मेरठ के पास सरधना में 10,000 एकड़ विशाल जागीर, नवाब की उपाधि, एक हजार रुपये मासिक पेंशन दी। तुलना करें तो 70 साल बाद महात्मा गांधी को महज 100 रुपये की पेंशन मिली थी।
आज उनका वंशज नसीरुद्दीन शाह देश के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री को ‘जाहिल’ कहकर गाली दे रहा है। एक कलाकार जो खुद अपने पूर्वजों के इतिहास से अनजान दिखता है या उसे छिपाना चाहता है।
यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि दोहरे मापदंड की है। जो लोग इतिहास को तोड़-मरोड़कर राष्ट्रवाद सिखाते हैं, उन्हें खुद अपने घर के आईने में झांकना चाहिए। भारत आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, जबकि कुछ खानदान पैसे और जागीर के लालच में अंग्रेजों का साथ दे रहे थे।
वोट से बदलाव लाइए, हिंसा या गालियों से नहीं। लेकिन इतिहास को याद रखिए—क्योंकि जिनके घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए।



