दिल्ली। नेहा बोरा के बयान में उन्नाव और कठुआ का जिक्र तथ्यों से मेल नहीं खाता, जबकि वामपंथी संगठनों में महिलाओं के साथ यौन शोषण के कई दर्ज मामले सामने आए हैं।
एआईएसए नेता नेहा बोरा के वायरल वीडियो में कहा गया कि ब्राह्मण महिलाएँ असुरक्षित हैं, उनका बलात्कार होता है और मंदिरों में पुजारी रेप करते हैं। उदाहरण के रूप में उन्नाव और कठुआ का हवाला दिया गया। ये दोनों मामले यौन हिंसा के गंभीर उदाहरण हैं, लेकिन इन्हें “ब्राह्मणवादी व्यवस्था” या पुजारियों से जोड़कर सामान्यीकरण करना तथ्यों से परे है।
उन्नाव मामले में दोषी कुलदीप सिंह सेंगर (गैर ब्राम्हण जाति के पूर्व भाजपा विधायक) थे। यह राजनीतिक प्रभाव और सत्ता के दुरुपयोग का मामला था, न कि मंदिर के पुजारी या विशेष रूप से ब्राह्मण महिला पर हमला। कठुआ मामले में आठ वर्षीय असफा बानो (मुस्लिम बकरवाल समुदाय) का मंदिर परिसर में बलात्कार और हत्या हुई। इसमें कथित तौर पर स्थानीय हिंदू पुरुष शामिल थे, लेकिन पीड़िता ब्राह्मण महिला नहीं थी। इन मामलों को पूरे समुदाय या धर्म-स्थान पर थोपना चुनिंदा आक्रोश का उदाहरण है। यौन अपराध व्यक्तिगत या सत्ता-आधारित अपराध हैं; इन्हें किसी एक जाति या धर्म से जोड़ना गलत है।
अब वामपंथी विचारधारा से जुड़े मामलों की बात करें, जहाँ महिलाओं को “सेक्स टूल” जैसा व्यवहार करने के आरोप दस्तावेजित हैं। सबसे प्रमुख उदाहरण नक्सल/माओवादी आंदोलन का है। सरेंडर करने वाली महिला कमांडर शोभा मंडी (उर्फ उमा/शिखा) ने अपनी किताब ‘एक माओवादी की डायरी’ में विस्तार से लिखा कि वरिष्ठ पुरुष कैडर महिलाओं का बार-बार बलात्कार करते थे। गर्भावस्था होने पर जबरन गर्भपात करवाया जाता था क्योंकि बच्चा ‘गुरिल्ला जिंदगी में बाधा’ माना जाता था। पत्नी-स्वैपिंग, शारीरिक हिंसा और महिलाओं को ‘वासना तृप्ति का साधन’ मानने की संस्कृति आम बताई गई। कई सरेंडर कैडर और सरकार के संसदीय जवाबों में भी महिलाओं के यौन शोषण, जबरन विवाह और गर्भपात की पुष्टि हुई। शोभा मंडी ने किशनजी समेत शीर्ष नेताओं से शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
केरल में सीपीआई(एम) के कई मामले दर्ज हैं। पूर्व कन्नूर जिला सचिव पी. सासी पर महिला साथी द्वारा यौन दुराचार के आरोप लगे, जिसके बाद पार्टी ने उन्हें निष्कासित किया। शोर्नूर विधायक पी.के. सासी पर डीवाईएफआई की महिला कार्यकर्ता ने पार्टी ऑफिस में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। आंतरिक जाँच में “अनुचित बातचीत” माना गया और छह महीने का निलंबन हुआ, लेकिन आरोपों को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया। पार्टी ऑफिसों में ऐसी घटनाएँ और शिकायतों को दबाने के आरोप भी लगे। नेहा जैसी वामपंथी कैडर यह सब सहकर भी चुप रहने के लिए अभिशप्त हैं।
‘प्रगतिशील’ हलकों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ समानता का नारा देते हुए भी महिला कैडर या कामगारों का शोषण हुआ। माओवादी शिविरों में यह व्यवस्थागत स्तर पर दिखता है। यौन हिंसा किसी भी विचारधारा, जाति या वर्ग की विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति में हो सकती है। नेहा बोरा के पास दो उदाहरण हैं, लेकिन वामपंथी आंदोलनों में दर्जनों दस्तावेजित मामले हैं जहाँ महिलाओं को क्रांति या समानता के नाम पर वस्तु बनाया गया। चुनिंदा आक्रोश और सामान्यीकरण से समस्या का समाधान नहीं होता; कानून के अनुसार हर मामले की जाँच और सजा जरूरी है।



