नेता बूढ़े नहीं होते!

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बेंगलुरु : लंबी उम्र का राज क्या है? योग, प्राणायाम, सुबह की सैर, हरी सब्जियां या महंगे हेल्थ सप्लीमेंट? अरे भाई, एक नुस्खा और है, जिस पर अभी तक डॉक्टरों का ध्यान नहीं गया। वह है: राजनीति!
जी हां, राजनीति! इसे बुढ़ापे का सबसे सस्ता, दिलचस्प और असरदार टॉनिक कहा जा सकता है। इसमें मनोरंजन है, रोमांच है, सामाजिक मेलजोल है, भाषण देने का मौका है और अपनी अहमियत जताने के अनगिनत अवसर हैं। सबसे बड़ी बात; यहां रिटायरमेंट की कोई उम्र नहीं होती।
जरा दुनिया के बुजुर्ग नेताओं पर नजर डालिए। मलेशिया के महाथिर मोहम्मद 92 साल की उम्र में फिर प्रधानमंत्री बन गए और आज भी सौ से ऊपर की उम्र में सक्रिय हैं। कैमरून के पॉल बिया नब्बे के पार भी राष्ट्रपति बने हुए हैं। जिम्बाब्वे के रॉबर्ट मुगाबे 93 साल तक सत्ता में रहे और 95 तक जिए। क्यूबा के फिडेल कास्त्रो नब्बे के दशक में भी प्रभावशाली बने रहे। अमेरिका के स्ट्रॉम थर्मंड सौ साल की उम्र तक सीनेटर रहे।
भारत के मोरारजी देसाई 81 साल में प्रधानमंत्री बने और 99 साल तक जिए। केरल के वी.एस. अच्युतानंदन 82 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बने और 101 साल तक सक्रिय रहे। इटली के जूलियो आंद्रेओत्ती 94 साल तक राजनीति में दबदबा बनाए रहे। नेल्सन मंडेला 95 और जिमी कार्टर 100 साल तक जिए। राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी कार्टर सामाजिक और राजनीतिक कामों में जुटे रहे।
भारत में अटल बिहारी वाजपेयी 93, मनमोहन सिंह 92 और एम. करुणानिधि 94 साल तक जिए। एच.डी. देवगौड़ा, फारूक अब्दुल्ला, नरसिम्हा राव, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और पंजाब के प्रकाश सिंह बादल जैसे नेताओं ने भी साबित किया कि उम्र बढ़ने का मतलब मैदान छोड़ना नहीं है। अमेरिका के चक ग्रासली, बर्नी सैंडर्स और नैन्सी पेलोसी भी इस उम्र में राजनीति की धुरी बने रहे।
इन उदाहरणों से एक दिलचस्प सवाल जरूर उठता है: क्या सक्रिय राजनीतिक जीवन इंसान को चुस्त-दुरुस्त और उत्साही बनाए रखने में मदद करता है?
जरा सोचिए, राजनीति में कदम रखते ही जिंदगी कितनी बदल जाती है। सुबह बैठक, दोपहर में प्रतिनिधिमंडल, शाम को धरना और रात को प्रेस कॉन्फ्रेंस। कभी जन्मदिन, कभी शोकसभा, कभी चुनावी जलसा। दिन कब गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता।
रिटायरमेंट के बाद आम आदमी सुबह अखबार पढ़ता है, फिर टीवी देखता है और पड़ोसियों से बीमारी की चर्चा करता है। राजनीति में शामिल व्यक्ति के पास इससे बेहतर काम हैं। उसे लोगों की समस्याएं सुननी हैं, अधिकारियों को ज्ञापन देना है और सरकार से जवाब मांगना है।
किसी को सड़क बनवानी है, किसी को नाली साफ करवानी है। किसी को बिजली चाहिए, किसी को पार्क में बेंच। आप अचानक समाज के लिए बेहद जरूरी आदमी बन जाते हैं।
और फिर आती हैं रैलियां! सैकड़ों लोग झंडे लहरा रहे हैं। नारे लग रहे हैं। माइक गरज रहा है। आपका नाम पुकारा जा रहा है। इससे बढ़कर मनोबल बढ़ाने वाला नजारा क्या होगा?
नारे लगाने से फेफड़ों को कसरत मिलती है। जुलूस में चलने से पैरों की एक्सरसाइज होती है। भाषण देने से आवाज खुलती है। लोगों से मिलने-जुलने से सामाजिक रिश्ते मजबूत होते हैं। राजनीतिक उठापटक दिमाग को व्यस्त रखती है।
सरकारी नौकरी से रिटायर हुए? बैंक से विदा हो गए? कॉलेज की नौकरी खत्म हो गई? व्यापार से फुर्सत मिल गई? अब घर बैठकर बोर होने की क्या जरूरत है?
संसद का चुनाव लड़ना जरूरी नहीं। राजनीति तो हर जगह मौजूद है। घर से ही शुरू कीजिए!
अपनी हाउसिंग सोसायटी की कमेटी में शामिल हो जाइए। पार्किंग, सुरक्षा, सफाई और पानी के मुद्दे उठाइए। किसी क्लब की कार्यकारिणी में घुसिए। खेल संघ में पद हासिल कीजिए। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या किसी सामाजिक संस्था की व्यवस्था में हाथ बंटाइए।
कॉलेज और विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति है। व्यापार मंडलों में अपनी अलग सियासत है। धार्मिक संस्थाओं में भी चुनाव, गुटबाजी और नेतृत्व की भरपूर गुंजाइश है।
जहां चार लोग मिलते हैं, वहां राजनीति शुरू हो जाती है। जहां पद है, वहां प्रतिष्ठा है। जहां प्रतिष्ठा है, वहां मुकाबला है।
थोड़ा मुकाबला कीजिए। अपनी पहचान बनाइए। समर्थक जुटाइए। अपनी बात मजबूती से रखिए। और हां, थोड़ा रौब भी जमाइए। आजकल की भाषा में इसे ‘मॉगिंग’ कहते हैं; यानी अपनी मौजूदगी और व्यक्तित्व से दूसरों पर प्रभाव जमाना।
सबसे सस्ता शौक, सबसे बड़ा शगल!
राजनीति का एक और फायदा है। इसमें शुरुआत करने के लिए महंगे जिम, विदेशी प्रोटीन पाउडर या आलीशान क्लब की जरूरत नहीं।
एक माइक, कुछ समर्थक और कोई सार्वजनिक मुद्दा काफी है। भाषण देने के लिए आत्मविश्वास चाहिए। बड़े-बड़े वादे करने के लिए तो बस जुबान चाहिए!
आप कह सकते हैं कि छह महीने में मोहल्ले की तस्वीर बदल देंगे। सड़कें चमका देंगे। पार्क को लंदन बना देंगे। नाली को साबरमती मॉडल दे देंगे। खर्च कुछ नहीं, तालियां मुफ्त!
आखिरकार, असली राजनीति समाजसेवा है, केवल पद और प्रतिष्ठा की दौड़ नहीं।
तो बुजुर्गों, तैयार हो जाइए! सुबह की सैर के साथ थोड़ी राजनीतिक सैर भी शुरू कीजिए। घर की चारदीवारी से बाहर निकलें। लोगों से मिलें, बहस करें, हंसें और सक्रिय रहें।
याद रखिए, जिंदगी की पारी में रिटायरमेंट कोई फुल स्टॉप नहीं है।
और अगर कोई पूछे कि लंबी उम्र का राज क्या है, तो मुस्कराकर जवाब दीजिए:
“भाई साहब, हमने राजनीति ज्वाइन कर ली है। अभी तो हमारी दूसरी पारी शुरू हुई है। कुर्सी मिले न मिले, मैदान छोड़ने वाले नहीं!”

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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