रमेश कुमार
भूजल संकट अब सिर्फ कमी नहीं, खतरा भी
देश में भूजल संकट अब केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं रह गया है। जमीन के नीचे मौजूद पानी की गुणवत्ता तेजी से खराब हो रही है। जिस भूजल को जीवन का सबसे बड़ा सहारा माना जाता है, वही कई क्षेत्रों में लोगों की सेहत के लिए खतरा बनता जा रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट ने देश के सामने एक गंभीर तस्वीर रखी है। कई राज्यों के भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट, आयरन, यूरेनियम और लवणता जैसे प्रदूषक तय मानकों से अधिक पाए गए हैं। भारत की बड़ी आबादी आज भी पीने के पानी के लिए भूजल पर निर्भर है। ऐसे में दूषित पानी का बढ़ना भविष्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
जमीन के नीचे बढ़ता प्रदूषण
भूजल प्रदूषण कई कारणों से बढ़ रहा है। खेतों में रासायनिक खादों का ज्यादा उपयोग, उद्योगों से निकलने वाला जहरीला कचरा, सीवेज का रिसाव और भूजल का अत्यधिक दोहन इस संकट को बढ़ा रहे हैं। कई बार जमीन के अंदर पहुंच चुके जहरीले तत्व वर्षों तक बने रहते हैं। इसका असर धीरे-धीरे लोगों के स्वास्थ्य पर दिखाई देता है। यह समस्या केवल किसी एक राज्य की नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप में सामने आ रही है।
187 जिलों में फ्लोराइड की अधिकता
देश के कई राज्यों में फ्लोराइड की समस्या गंभीर हो चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार 25 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 187 जिलों में भूजल में फ्लोराइड की मात्रा सामान्य सीमा से अधिक पाई गई है। राजस्थान इससे सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। लंबे समय तक फ्लोराइड युक्त पानी पीने से दांतों और हड्डियों पर असर पड़ सकता है। बच्चों पर इसका प्रभाव ज्यादा पड़ सकता है। ग्रामीण इलाकों में लोग वर्षों से ऐसे पानी का उपयोग कर रहे हैं।
राजस्थान और गुजरात में लवणता की मार
भूजल में लवणता बढ़ना भी बड़ी समस्या बन चुका है। 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 165 जिलों में लवणता की समस्या सामने आई है। गुजरात और राजस्थान में इसका असर ज्यादा दिखाई देता है। खारा पानी पीने योग्य नहीं रहता और खेती को भी नुकसान पहुंचाता है। मिट्टी की गुणवत्ता खराब होने लगती है। फसल उत्पादन घटता है और किसानों की परेशानी बढ़ती है।
पंजाब-हरियाणा में यूरेनियम की चिंता
भूजल में यूरेनियम की मौजूदगी ने भी चिंता बढ़ाई है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में कई इलाकों में इसकी मात्रा सामान्य सीमा से अधिक मिली है। यूरेनियम प्राकृतिक तत्व है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा लंबे समय तक शरीर में जाने पर नुकसान पहुंचा सकती है। जिन क्षेत्रों में लोग बोरवेल और हैंडपंप के पानी पर निर्भर हैं, वहां खतरा ज्यादा रहता है।
आर्सेनिक का खतरनाक विस्तार
आर्सेनिक प्रदूषण देश की गंभीर जल समस्याओं में शामिल है। गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदानी क्षेत्रों में इसका प्रभाव ज्यादा देखा गया है। पश्चिम बंगाल, बिहार, असम और उत्तर प्रदेश के कई इलाके इससे प्रभावित हैं। रिपोर्ट के अनुसार 196 जिलों में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य सीमा से ऊपर पाई गई है। लंबे समय तक दूषित पानी पीने से त्वचा रोग और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
नाइट्रेट बना सबसे बड़ा प्रदूषक
नाइट्रेट प्रदूषण देश के सबसे बड़े भूजल संकटों में शामिल हो गया है। 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 409 जिलों में नाइट्रेट का स्तर सामान्य सीमा से अधिक पाया गया है। इसका मुख्य कारण खेती में रासायनिक उर्वरकों का ज्यादा इस्तेमाल है। बारिश और सिंचाई के साथ ये रसायन जमीन के अंदर पहुंच जाते हैं। सीवेज और गंदे पानी का रिसाव भी इस समस्या को बढ़ा रहा है।
11 हजार से ज्यादा बस्तियां प्रभावित
देश में हजारों ग्रामीण बस्तियां दूषित पानी की समस्या से जूझ रही हैं। कई जगह आयरन, नाइट्रेट, भारी धातु और अन्य रसायनों के कारण पानी खराब हो चुका है। सरकार ने कई क्षेत्रों में जल शुद्धिकरण संयंत्र लगाए हैं, लेकिन समस्या बहुत बड़ी है। केवल पानी पहुंचाना नहीं, बल्कि सुरक्षित पानी पहुंचाना सबसे जरूरी है।
प्रकृति के साथ इंसानी गलती
भूजल प्रदूषण के पीछे प्राकृतिक कारणों के साथ मानव गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं। तेजी से बढ़ता शहरीकरण, उद्योगों का कचरा, रसायनों का बढ़ता इस्तेमाल और पानी का गलत प्रबंधन इस संकट को बढ़ा रहे हैं। अगर अभी सुधार नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों के सामने साफ पानी की बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है।
भविष्य की बड़ी चुनौती
पानी केवल एक संसाधन नहीं, जीवन का आधार है। भूजल की हर बूंद को बचाना जरूरी है। आने वाला संकट केवल पानी की कमी का नहीं होगा, बल्कि उस पानी का होगा जो मौजूद तो होगा लेकिन पीने योग्य नहीं रहेगा। साफ पानी और सुरक्षित भूजल ही स्वस्थ भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत है।



