पत्रकारिता, साहित्य, सिनेमा… कुछ भी नहीं बचा था इमरजेंसी के कहर से

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हरिवंश

दिल्ली । पिछले दिनों भोपाल गया. माधव राव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय में. हिंदी पत्रकारिता के 200 साल होने पर आयोजन था. जिनका संबंध पत्रकारिता (विशेषकर हिंदी पत्रकारिता) से है, वे माधवराव सप्रे संग्राहलय के नाम और काम, दोनों से परिचित होंगे. वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री विजय दत्त श्रीधरजी ने बहुत ही लगन, समर्पण से पत्रकारिता के इस अनूठे संस्थान को खड़ा किया है.
आयोजन में मंच पर जाते समय, बगल में रखे एक स्टैंडी बोर्ड पर नजर पड़ी. अशोक महादेवन जी की तस्वीर के साथ. उस पर चित्र रूप में बॉक्स में विज्ञापन था. इमरजेंसी के दो दिनों बाद, टाइम्स आफ इंडिया में छपा हुआ विज्ञापन. महादेवन जी ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ के संपादकीय विभाग में थे. डिप्टी एडिटर. इमरजेंसी लगने के बाद उन्होंने एक विज्ञापन लिखा—

‘Obituary
‘D’ Ocracy DEM, beloved husband of T. Ruth, loving father of L.I. Bertie, brother of Faith, Hope, Justice, expired on 26th June.’

यह विज्ञापन उन्होंने अपने ही समूह के अखबार ‘टाइम्स आफ इंडिया’ में दिया. ओबिचुअरी वाले सेक्शन में प्रकाशित करने के लिए. महादेवन जी ने इतनी चतुराई से भाषा का प्रयोग किया था कि इसे सहज समझा नहीं जा सका कि विज्ञापन में है क्या? अगले दिन छप गया. 28 जून, 1975 को. छपते ही हंगामा मचा. संस्थान के अंदर ही हड़कंप मचा कि यह कैसे छप गया? इस विज्ञापन का हिंदी मायने और आशय था कि इमरजेंसी के माध्यम से आजाद भारत में लोकतंत्र को श्रद्धांजलि दी गयी.

इमरजेंसी के दौरान अनेक पत्रकारों ने ऐसे विरोध जताये थे. समाचार पत्रों ने भी. पर, यह विरोध जताने का अधिकार छिन लिया गया था. रातोरात कई अखबारों के आफिस में बिजली ही काट दी गयी थी. अखबारों को छपने और बांटने से रोका गया. नियंत्रण अपने पास रहे, अपने अनुकूल खबरें जाये, इसके लिए देश की दो बड़ी एजेंसियों ‘पीटीआई’ और ‘यूएनआई’ के साथ ‘हिंदुस्तान समाचार’ और ‘समाचार भारती’ का विलय कर दिया गया. तब, सबको मिलाकर एक एजेंसी काम करने लगी, जिसका नाम रखा गया, ‘समाचार’. यहीं से सारी खबरें जारी होने लगी. वैसी खबरें, जो सरकार के अनुकूल हो. दूसरी ओर लोकप्रिय माध्यम रेडियो से सरकार के यशोगान की खबरें चलती.

पत्रकारिता और पत्रकारों को कैसी यातनाएं झेलनी पड़ी, इसकी अनंत कथाएं हैं. सिर्फ उन्हीं पत्रकारों को नहीं, जो विरोध कर रहे थे. बल्कि उन्हें भी, जो सत्ता शीर्ष के करीबी थे. एक किस्सा खुशवंत सिंह का है. खुशवंत सिंह जी तब सत्ता शीर्ष परिवार के करीबी माने जाते थे. पर, उन्हें भी कोपभाजन का शिकार होना पड़ा. वजह, एक लेख का छपना. वह लेख भी खुशवंत सिंह के संपादन वाली पत्रिका ‘द इलस्ट्रेटेड वीकली’ में नहीं छपी थी, बल्कि टाइम्स समूह की दूसरी पत्रिका ‘फेमिना’ में छपी थी. इसकी चर्चा खुद खुशवंत सिंह ने की है. अपनी आत्मकथा में. नतीजा यह हुआ था कि बिना तथ्यों की जांच के ‘द इलेस्ट्रेटेड वीकली’ के खिलाफ कार्रवाई हुई. यह आदेश दिया गया कि कोई भी लेख, चित्र या कार्टून प्रकाशित हो, तो उसे पहले सेंसर के लिए भेजना जरूरी होगा.
यह एक छोटा उदाहरण है. ऐसे अनेक प्रसंग हैं, उन दिनों के. कार्टून की एक मशहूर पत्रिका थी, ‘शंकर्स वीकली’. केशव शंकर पिल्लई इसे निकालते थे. उन्हें इमरजेंसी के कोपभाजन का शिकार होकर पत्रिका का प्रकाशन बंद करना पड़ा.

अखबार और पत्र—पत्रिकाओं की बंदी की अनेक घटनाएं उन दिनों घटी. जो स्वाभिमान से समझौता नहीं कर सकते थे, उन्हें यातनाएं झेलनी पड़ी. यह दस्तावेज में दर्ज कि इमरजेंसी के दौरान 253 पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया. इनमें 110 को मीसा,110 को डीआईआर और 33 को अन्य संगीन दफाओं में जेल में रखा गया. 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता रद्द की गई. 29 का भारत में प्रवेश प्रतिबंधित किया गया. सात को देश से बाहर निकाल दिया गया.
गिरफ्तारी भी कैसे की जाती थी, किन बातों पर की जाती थी, उसके अनेक प्रसंग हैं. मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर के प्रसंग से इसे समझ सकते हैं. इमरजेंसी बाद कुलदीप नैयर ने 28 जून को पत्रकारों से एक जगह जुटने का आग्रह किया. स्थान तय हुआ, दिल्ली प्रेस क्लब. 103 पत्रकार पहुंचे. प्रेस सेंसरशिप के खिलाफ प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने की बारी आयी. 27 पत्रकार ही ऐसा करने की हिम्मत जुटा सके. कुलदीप नैयर के इस अभियान पर सरकार ने कार्रवाई की. तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने उन्हें धमकाया. कहा, आपको गिरफ्तार किया जा सकता है. बाद में कुलदीप नैयर गिरफ्तार हुए. जेल भेजे गये. कुलदीप नैयर ने लिखा है कि उस दौर में ऐसे पत्रकार और संपादक भी हुए, जो सत्ता शीर्ष के यहां दरबार लगाते थे. इमरजेंसी के लिए बधाई देते थे. ऐसे ही पत्रकारों और संपादकों के बारे में इमरजेंसी बाद आयी जनता पार्टी सरकार के सूचना प्रसारण मंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी जी ने कहा था कि उन्हें झूकने के लिए कहा था, पर वे रेंगने लगे थे.

सेंशरशिप और दमन का यह चक्र सिर्फ पत्रकारिता पर ही नहीं चला, बल्कि साहित्य, सिनेमा, मनोरंजन जगत पर भी यही प्रक्रिया अपनायी गयी. इमरजेंसी के दौरान दक्षिण भारत से एक नाम खूब चरचे में रहा. स्नेहलता रेड्डी का नाम. वह अभिनेत्री थीं. एक फिल्म बनी थी, ‘चंदा मरुथा’. फिल्म के निर्देशक थे, पट्टाभी राम रेड्डी. फिल्म पी. लंकेश के नाटक पर आधारित थी. इस फिल्म में मुख्य भूमिका में थीं, स्नेहलता. वह गिरफ्तार की गयीं. जेल भेजी गयीं. पे रोल पर रिहा हुईं. पर, कुछ ही दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गयी. स्नेहलता नेशनल अवार्ड विनर एक्ट्रेस थीं. आपातकाल के खिलाफ इन्होंने आवाज भी उठाई. इन्हें झूठे आरोप के तहत मीसा (आंतरिक सुरक्षा अधिनियम) के तहत मामला दर्ज कर बिना सुनवाई बेंग्लुरू के सेंट्रल जेल में आठ महीने तक रखा गया था.

फिल्म जगत में ऐसी अनेक घटनाएं घटीं. फिल्म दुनिया पर भी इमरजेंसी की काला छाया पड़ी. कई फिल्में रिलीज नहीं होने दी गयी, कई फिल्मों के प्रिंट जब्त कर लिये गये. सेंशरशिप की कैंची तो कई फिल्मों पर चली ही. इतना ही नहीं, उस समय के मशहूर अभिनेता देव आनंद की फिल्में इसलिए बैन की गयी, क्योंकि उनके भाइयों ने इमरजेंसी का विरोध किया और खुद देव आनंद ने दिल्ली में सत्ताधारी पार्टी के एक कार्यक्रम में भाग लेकर एक नेता विशेष पक्ष में बोलने से मना कर दिया. इसी तरह किशोर कुमार के गानों को आकाशवाणी से प्रतिबंधित कर दिया गया. अनिरुद्ध भट्टाचार्जी और पार्थिव धर द्वारा लिखी गई जीवनी ‘किशोर कुमार: द अल्टीमेट बायोग्राफी’ में इसका जिक्र है. बताया गया है कि आपातकाल शुरू होने के छह महीने बाद जनवरी 1976 में पहली बार प्रतिबंध लागू हुआ. बताया जाता है कि ऐसा इसलिए हुआ था कि किशोर कुमार को इमरजेंसी के दौरान 20 सूत्री प्रोग्राम के लिए बनाए गाने को आवाज देने के लिए कहा गया. उन्होंने मना कर दिया. इसके बाद उनके गाने ऑल इंडिया रेडियो पर बैन कर दिये गये.
इमरजेंसी के दौरान ही सैकड़ों साहित्यकार और सृजनकर्मियों को भी जेल भेजा गया. पर, अनेक ऐसे थे, जो उस समय भी तनकर खड़े रहे और रचते रहे. तत्कालीन सरकार क्यों डर रही थी साहित्य, सिनेमा, संस्कृति से? क्योंकि साहित्य, सिनेमा की ताकत ऐसी होती है कि वह आम जनमानस को सीधे, सहज शब्दों में सच्चाई बताती है. इमरजेंसी के वृत्तांत को हम उस दौरान के साहित्य से समझ सकते हैं.

हिंदी के मशहूर कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने उन दिनों रोज एक कविता लिखनी शुरू की. ‘त्रिकाल संध्या’ में संकलित हुई. उनकी लिखी कविता ‘चार कौवे उर्फ चार हौवे’ की कुछ पंक्तियों को पढ़कर आप समझ सकते हैं कि इमरजेंसी की पृष्ठभूमि क्या रही होगी?

‘बहुत नहीं थे, सिर्फ चार कौवे थे काले
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
वे जिसको त्योहार कहें, सब उसे मनायें.
कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में
दुनियाभर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गये.’

उस दौरान धर्मवीर भारती जी ने जो कविता लिखी, वह गांव—गांव तक पहुंची. कविता का शीर्षक था, ‘मुनादी’.

‘खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का
हर खासो-आम को आगाह किया जाता है कि
खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अंदर से
कुंडी चढ़ा कर बंद कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी
अपनी कांपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है…’

1975 में जब आपातकाल की घोषणा हुई तो बिहार के मशहूर कवि नागार्जुन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए लंबी कविता लिखी—
‘क्या हुआ आपको? क्या हुआ आपको?
सत्ता की मस्ती में भूल गयी बाप को?
इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको?
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!
क्या हुआ आपको? क्या हुआ आपको?’

आपातकाल के दौरान ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कविताएं लिखीं, जो ‘कैदी कविराय की कुंडलियां’ शीर्षक से प्रकाशित हुई. उसकी एक कविता की पंक्तियां हैं,

‘धरे गये क्यों रामधन, शेखर क्यों हैं बंद
मुझको समझाकर कहो, मैं ठहरा मतिमंद’

(लेखक राज्यसभा के उपसभापति हैं)

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