परसेप्शन और नैरेटिव का खेल 

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर ।  को लेकर समाज में नए उद्वेलन की तैयारी है। ये एक नया बखेड़ा शुरू हो चुका है। UGC GUIDLINE, एट्रोसिटी एक्ट, Neet-exam, एथेनॉल के बाद अब UPI को लेकर समाज में विमर्श बनाना , सरकार के बूते की बात नहीं समझ आ रही है। कोई कितना भी पीठ ठोंके, आंकड़े बताएं। फला-फला होगा। लोग नहीं सुनना चाहते। उन्होंने ये परसेप्शन मान लिया है कि – ये ग़लत है। इससे आम लोगों की ज़िंदगी में बोझ बढ़ेगा। ठीक वैसे ही जैसे तीनों कृषि कानून भले ही कितने अच्छे रहे हों, लेकिन परसेप्शन बना तो बना।

वैसे भी राजनीति तो परसेप्शन और नैरेटिव का ही खेल है‌ । मुझे ये समझ नहीं आता है कि —समाज में भ्रम, उद्वेलन उत्पन्न करने वाले निर्णय थोक के भाव क्यों लिए जा रहे हैं? UPI – जो डिजिटल बैंकिंग की हमारी वैश्विक पहचान बनी। उसको लेकर अविश्वास उत्पन्न करने की इतनी क्या जल्दी थी ? तमाम दावों के बाद
₹ 2 हजार की लिमिट वाला मामला किसी के गले नहीं उतर रहा है।

—• कहीं ऐसा तो नहीं है कि आर्थिक सलाहकारों, ब्यूरोक्रेट्स ने ठान लिया है कि – इस सरकार को अब लंबे समय तक नहीं रहने देना है? अन्यथा थोक के भाव ऐसे फैसले क्यों आ रहे हैं? जो सीधे आम लोगों के मन में अविश्वास स्थापित कर रहे। बाक़ी विरोधी तो अपनी रोटियां सेंकेंगे ही।

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