जयपुर : दुनिया के अधिकांश मतों ने मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य सुख या आनंद को माना है। सुख की प्रकृति और उसकी प्राप्ति के साधनों को लेकर मतभेद अवश्य हैं, किंतु इस बात पर व्यापक सहमति है कि मनुष्य अंततः सुख की ही खोज में जीता है। किंतु प्रश्न यह है कि सुख का वास्तविक आधार क्या है? दुःख से मुक्ति का उपाय क्या है? और सबसे बड़ा प्रश्न यह कि क्या कोई मनुष्य अकेले सुखी रह सकता है?
उत्तर निस्संदेह ‘नहीं’ में ही मिलेगा। मनुष्य का सुख समाज से जुड़ा है, राष्ट्र से जुड़ा है। जिस समाज और राष्ट्र से उसका नाभिनाल संबंध हो, जिसके प्रति आत्मीयता, रागात्मकता और अखंड निष्ठा हो, वही उसके जीवन को सार्थक बनाता है। इसी आत्मिक जुड़ाव के साथ माँ भारती की सेवा में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर देने वाले सेवाव्रती साधकों का दूसरा नाम प्रचारक है। उन्हें श्वेत वस्त्रधारी संत कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनका त्याग, तप और समर्पण उसी कोटि का है। प्रचार और प्रसिद्धि, निंदा और स्तुति से सर्वथा निर्लिप्त रहकर वे राष्ट्र-यज्ञ में निरंतर अपनी आहुति देते रहते हैं।
प्रत्येक प्रचारक का जीवन अपने आप में प्रेरणा का एक जीवंत स्रोत होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यप्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष व्यक्ति-निर्माण है। वहाँ व्यक्तित्व का शोधन, परिमार्जन और परिष्कार निरंतर चलता रहता है। जैसे साधारण प्रस्तर निरंतर घिसने पर शालिग्राम बनता है, वैसे ही प्रचारक का जीवन भी सतत साधना की प्रक्रिया से गुजरता है। अनुशासन की छेनी, तप की हथौड़ी और ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा उसके व्यक्तित्व के प्रत्येक अनगढ़ कोने को तराशती रहती है। यही कारण है कि संघ की कार्यपद्धति में चरित्र-निर्माण कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि सतत चलने वाली साधना है और प्रचारक उसकी केंद्रीय धुरी हैं।
अपवाद हर क्षेत्र में होते हैं, किंतु उदाहरण सदैव सामान्य प्रवृत्तियों से बनते हैं। सामान्यतः प्रचारकों का जीवन देखकर संस्कृत का यह वाक्य साकार होता प्रतीत होता है, “स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः” – अर्थात् प्रत्येक मनुष्य अपने आचरण से ही संसार को शिक्षा देता है। यही सच्ची शिक्षा है। भौतिकता और उपभोक्तावाद के इस युग में भी प्रचारकों का जीवन इस आदर्श का सजीव प्रमाण है।
प्रचारकों का अधिकांश जीवन प्रवास में ही बीतता है। संगठन के विस्तार के साथ उनकी यात्राएँ भी अधिक व्यापक और सघन हुई हैं। बैठकों, संस्थागत कार्यक्रमों, सार्वजनिक आयोजनों तथा विविध दायित्वों के बीच उनका समय लगभग पूर्णतः समाज को समर्पित रहता है। ऐसे जीवन में अपने स्वास्थ्य, विश्राम और व्यक्तिगत सुविधाओं की चिंता स्वाभाविक रूप से पीछे छूट जाती है। उनके लिए कार्यक्रम की सफलता, समाज की अपेक्षाएँ और संगठन का कार्य ही सर्वोपरि होता है।
यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि मेरा प्रत्यक्ष अनुभव है। अभी कल की ही बात है। #प्रज्ञा_प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक आदरणीय श्री जे. नंद कुमार जी दिसंबर में आयोजित होने वाले लोकमंथन की बैठक के लिए जयपुर में थे। प्रातः नौ बजे से रात्रि नौ बजे तक वे निरंतर बैठक में व्यस्त रहे। कुछ दिनों पूर्व मैंने उनसे अपने संस्थान में आयोजित आईपीएससी टीचर्स कॉन्क्लेव के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में पधारने का आग्रह किया था। तब उन्होंने बताया था कि वे पुणे प्रवास पर हैं। 28 तारीख को वे पुणे से दिल्ली लौटे। 1 तारीख को पूरा दिन जयपुर में बैठक चली। बैठक समाप्त होते ही रात्रि लगभग 9:45 बजे वे हमारे कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए जयपुर से रवाना हुए और लगभग 11:45 बजे अजयमेरू पहुँचे। अगले दिन प्रातः 9:30 बजे उन्हें गोटन स्थित हमारे संस्थान के उद्घाटन सत्र को संबोधित करना था।
इसी बीच रात्रि लगभग 8:30 बजे पाञ्चजन्य के यशस्वी संपादक आदरणीय श्री हितेश शंकर जी का मुझे व्हाट्सएप कॉल आया। उन्होंने केवल इतना बताया कि श्री जे. नंद कुमार जी गोटन पहुँच रहे हैं। वस्तुतः यह सूचना भर नहीं थी, बल्कि उनके प्रति आत्मीय चिंता का सहज प्रकटीकरण था। संघ-जीवन की यही विशेषता है, एक-दूसरे के प्रति सतत आत्मीयता का भाव और उत्तरदायित्व का बोध।
स्वाभाविक है कि इतना व्यस्त दिन बिताने के बाद कोई व्यक्ति बिस्तर पर लेटते ही सो जाए, यह आवश्यक नहीं। किंतु मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब प्रातः 7:21 बजे मैंने उनके साथ यात्रा कर रहे श्री पंकज जी को फोन किया और पता चला कि वे मेड़ता रोड पहुँचने वाले हैं। मार्ग में रेलवे फाटक बंद होने के कारण उन्हें लगभग पच्चीस मिनट प्रतीक्षा भी करनी पड़ी, फिर भी वे प्रातः 8:20 बजे हमारे परिसर में उपस्थित थे। सहज ही मन में प्रश्न उठा, वे कितनी देर सो पाए होंगे? कितने बजे जगे होंगे? उन्हें विश्राम का अवसर कितना मिला होगा?
आज समय के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता कितने लोगों के जीवन में दिखाई देती है? दूसरे के कार्यक्रम को अपना दायित्व मानकर कितने लोग इस प्रकार का कष्टसाध्य जीवन जीते हैं? संघ के प्रचारकों के लिए यह कोई असाधारण घटना नहीं, बल्कि सामान्य कार्य-संस्कृति का हिस्सा है। कार्यक्रम का प्रथम सत्र समाप्त होते ही उन्हें पुनः लगभग सौ किलोमीटर की यात्रा कर जोधपुर पहुँचना है और वहाँ से दिल्ली के लिए प्रस्थान करना है। जीवन के जिस पड़ाव पर वे हैं, उस आयु में इतना सघन प्रवास निश्चय ही सहज नहीं होता। किंतु उनके चेहरे पर न थकान का प्रदर्शन, न असुविधा की चर्चा और न ही किसी प्रकार की अपेक्षा। केवल कर्तव्य, केवल ध्येय और केवल राष्ट्रकार्य। यह सौभाग्य की बात थी कि श्री पंकज जी पूरे प्रवास में उनके साथ थे और हर प्रकार से उनकी चिंता कर रहे थे। अन्यथा यह यात्रा उनके लिए और भी अधिक कष्टसाध्य हो सकती थी।
अपने अनुभव के आधार पर मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में लोकमंगल की भावना से जहाँ कहीं कोई सकारात्मक, रचनात्मक और राष्ट्रहितकारी प्रकल्प सफलतापूर्वक चल रहा है, वहाँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा, उसके प्रचारकों का मार्गदर्शन अथवा कार्यकर्ताओं का मौन सहयोग किसी न किसी रूप में अवश्य उपस्थित मिलता है।यही उनकी कार्यशैली है, बिना श्रेय की अपेक्षा के, बिना प्रचार की आकांक्षा के और बिना किसी व्यक्तिगत आग्रह के राष्ट्र के लिए निरंतर कार्य करते रहना। ऐसे निस्पृह कर्मयोगी ही वास्तव में राष्ट्र की उस मौन शक्ति के प्रतीक हैं, जिनकी तपस्या मंचों पर कम दिखाई देती है, परंतु जिनके श्रम, त्याग और साधना से समाज का भविष्य निरंतर निर्मित होता रहता है।



