
गोल मार्केट से पचास रुपये में छपवाया गया कार्ड, किसी निजी कंपनी का पहचान-पत्र या सोशल मीडिया पर खुद को इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट लिख देना, इनमें से कोई भी सरकारी मान्यता नहीं है। प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो या राज्य स्तरीय मान्यता की प्रक्रिया अलग है। उसमें संगठन का पंजीकरण, प्रकाशन या प्रसारण का रिकॉर्ड, और आवेदक की रिपोर्टिंग का सत्यापन शामिल होता है। इसके विपरीत, कुछ कार्ड ऐसी कंपनियों के नाम पर जारी दिखते हैं जो विरोध-प्रदर्शन से कुछ महीने पहले बनी हों। ऐसे कार्ड का कोई आधिकारिक दर्जा नहीं होता। इन्हें लेकर कोई भी कांग्रेस, आम आदमी पार्टी या किसी अन्य दल से जुड़ा व्यक्ति प्रदर्शन स्थल पर मंडरा सकता है और खुद को प्रेस बता सकता है। इससे पत्रकारिता और प्रभाव बनाने के बीच की रेखा मिटती है।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इस अंतर को अधिसूचना के जरिए स्पष्ट करना चाहिए। कंटेंट क्रिएटर और पत्रकार एक नहीं हैं। कंटेंट क्रिएटर किसी विषय पर अपनी राय, विश्लेषण या अभियान चला सकता है। उसकी स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आती है। लेकिन जब वह प्रेस कार्ड लगाकर समाचार एकत्र करने, स्रोतों तक पहुंच बनाने या आधिकारिक ब्रीफिंग में जगह मांगने का दावा करता है, तब पारदर्शिता जरूरी हो जाती है। मंत्रालय यह स्पष्ट कर सकता है कि केवल पंजीकृत मीडिया संगठनों से जुड़े और निर्धारित मानदंड पूरे करने वाले व्यक्ति ही आधिकारिक प्रेस सुविधाओं के हकदार होंगे। बाकी लोग अपने चैनल या पेज के नाम से काम करें। इससे न तो अभिव्यक्ति रुकेगी, न ही फर्जी पहचान से जनता को गुमराह करने की गुंजाइश बचेगी।
इस बहस में एक और पक्ष है जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। जिन्हें गोदी मीडिया कहकर निशाना बनाया गया, उनके पैनल चर्चाओं में विरोधी पक्ष के प्रवक्ता नियमित रूप से शामिल होते रहे। वहां सवाल-जवाब की जगह थी, भले ही संपादकीय झुकाव स्पष्ट हो। इसके विपरीत रवीश कुमार, आरफा खानम, नवीन कुमार, अजीत अंजुम, पूण्य प्रसून बाजपेयी, साक्षी जोशी और अभिसार शर्मा जैसे रचनाकारों के यूट्यूब चैनलों पर वर्षों से एकतरफा मोनोलॉग चलता रहा है। वहां दूसरा पक्ष बोलने के लिए आमंत्रित नहीं होता। दर्शक को पहले से तय निष्कर्ष सुनने को मिलता है। इसे पत्रकारिता कहना कठिन है। यह राय-निर्माता कंटेंट है, जो अपने दर्शक वर्ग को मजबूत करता है और विज्ञापन या सदस्यता से आय कमाता है। आय कमाना गलत नहीं। गलत यह दावा है कि ऐसा कंटेंट निष्पक्ष समाचार है।

सच्ची पत्रकारिता का मानदंड न सत्ता के पक्ष में बोलना है, न विपक्ष के। जो हर सरकारी कदम का गुणगान करे और बदले में लाभ ले, वह भी पत्रकार नहीं। जो हर सरकारी कदम को षड्यंत्र बताए और केवल एक राजनीतिक खेमे की कहानी दोहराए, वह भी नहीं। पत्रकार का पहला दायित्व तथ्यों की जांच, संदर्भ देना और जहां संभव हो वहां दूसरे पक्ष को जगह देना है। दिल जनता के हित के लिए धड़कना चाहिए, किसी मालिक या चैनल के मुनाफे के लिए नहीं। यह आदर्श शर्त है। इसे पूरा करना कठिन है। आज के समय में आदर्श को परिभाषा नहीं बनाया जा सकता लेकिन परिभाषा कम से कम इतनी स्पष्ट हो कि फर्जी कार्ड और एकतरफा प्रचार, पत्रकारिता की आड़ न ले सकें।
रोजी प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दावा और हकीकत के बीच की दूरी सार्वजनिक हुई। एक्टिविस्ट होना सम्मानजनक काम हो सकता है। किसी मुद्दे पर अभियान चलाना भी अभिव्यक्ति का हिस्सा है। लेकिन एक्टिविज्म को पत्रकारिता का लेबल देकर पेश करना दोनों को कमजोर करता है। पाठक या दर्शक को यह जानने का हक है कि जो व्यक्ति घटनास्थल पर खड़ा है, वह समाचार जुटा रहा है या किसी संगठन का संदेश पहुंचा रहा है। जब यह भेद मिट जाता है, तब विश्वसनीयता दोनों तरफ से घटती है।
भारत में डिजिटल माध्यमों ने आवाज पहुंचाने का रास्ता आसान किया है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा है। लेकिन आसान रास्ते के साथ जिम्मेदारी भी आती है। अगर कोई व्यक्ति केवल अपने चैनल के लिए कंटेंट बनाता है, तो उसे कंटेंट क्रिएटर कहना अधिक ईमानदार होगा। पत्रकार शब्द उन लोगों के लिए सुरक्षित रहे जो समाचार संगठनों से जुड़े हों, या जिन्होंने स्वतंत्र रूप से भी तथ्यों की जांच और संतुलन का न्यूनतम मानक पूरा किया हो। मंत्रालय की अधिसूचना इस दिशा में पहला कदम हो सकती है। वह कार्ड जारी करने वाली निजी कंपनियों से पारदर्शिता मांगे, पीआईबी मान्यता और स्व-घोषित पहचान में अंतर लिखे, और प्रदर्शन स्थलों पर प्रेस सुविधाओं के उपयोग के नियम स्पष्ट करे।
सवाल व्यक्तिगत हमले का नहीं है। सवाल व्यवस्था का है। जब कोई भी पचास रुपये का कार्ड लटकाकर पत्रकार बन सकता है, और जब वर्षों तक एकतरफा मोनोलॉग को पत्रकारिता कहा जाता रहे, तब जनता के पास सच और प्रचार में फर्क करने का भरोसेमंद तरीका नहीं बचता। स्पष्ट परिभाषा दोनों पक्षों की स्वतंत्रता की रक्षा करेगी। जो राय रखना चाहते हैं, वे खुलकर रखें। जो समाचार देने का दावा करते हैं, वे उसके मानदंड पूरे करें। यही भेद पत्रकारिता को एक्टिविज्म और कंटेंट किएटर्स से अलग करेगा।



