अभद्र पटनायक: आज का पोस्ट मार्टम डॉ. पवन विजय

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पटना। आज अभद्र पटनायक ने कृष्ण को भैंसे का मांस खाने वाला बताया, भैंस मांस को भी अंग्रेजी में बीफ कहते हैं, उसका मकसद इस बीफ का सामान्यीकरण करना है। वह साइमन ब्रॉडबैक के हवाले से बड़ी महीन बात कर रहा है। वह निरक्त, पुराण, संदर्भ, विद्वानों के नाम लिख कर माहौल ऐसा बनाता है कि मानों उसका कहा हर शब्द शोध की अंतिम सीमा छूकर आया हो।
खैर आज के पोल खोल पर चलते हैं।
मामला गोवर्धन उत्सव में मांस के पहाड़ का है जिसमें अभद्र पटनायक कृष्ण को मांस खिलाते हुए दिखा कर वही जाति का जहर अंत में फैलाता है।
गोवर्धन पर मांस की थाली परोसने वाले इस मिथ्याचारी का संस्कृत उतना ही है जितना जोमैटो वाले का हवाई जहाज उड़ाने का ज्ञान। हरिवंश पुराण में विष्णु पर्व अध्याय पंद्रह से उन्नीस में गोवर्धन की कथा का उल्लेख करता है, झूठा पटनायक साठवें अध्याय का हवाला देता हैं, भविष्य पर्व के कुबेर युद्ध को गोवर्धन बताता है। जब अध्याय ही गलत तो पाठ क्या पढ़ा होगा। जिस श्लोक में अन्नबलि लिखा है उसे पशुबलि पढ़ता है।
इसी से इसकी मूर्खता और एजेंडेबाज होने का पता चल जाता है।
बलि माने भेंट, तुलसी भी बलि है, अन्न भी बलि है, पर इन्हें हर बलि में खून ही दिखता है क्योंकि इनकी दृष्टि ही खूनी है। हरिवंश में आता है मांसराशयः पायसराशयः दधिह्रदाः। यह कवि की अतिशयोक्ति है, इतना खाना कि पहाड़ लग गए, झीलें भर गईं। इसका अर्थ यह नहीं कि कृष्ण बैठकर मांस चबा रहे थे, अर्थ यह है कि पूरा बृज खा रहा था, ब्राह्मण से लेकर चांडाल और कुत्ते तक। भागवत ने इसी को साफ किया, अन्नकूट माने अन्न का पहाड़। पर अभद्र पटनायक तो कृष्ण को भी शूद्र-भोजन और बनिया-भोजन में बांटना है। कृष्ण गोपाल हैं, न तुम्हारी लैब का शूद्र न तुम्हारे मॉल का बनिया। जो गाय के लिए इंद्र से लड़ जाए वो अपनी गायों के सामने भैंसा कटवाएंगे, इतनी भी पटनायक के पास बुद्धि नहीं।
इसके बाद पटनायक निरुक्त का नंगा नाच करता है, मांस को फल सिद्ध करना है। यास्क को भी हंसी आ जाए। निरुक्त में मांस का अर्थ है माम् सः खादति इति मांसम्, जो मुझे खाता है मैं उसे खाऊंगा, यह शरीर है।अब जो इसका असली मकसद है उस पर आते हैं, इसका खेल सनातन को ही सनातन से काटना है। यह कहता है कि देखो तुम्हारे कृष्ण मांसाहारी थे, तुम पाखंडी हो, आज का हिंदू अपराधबोध में रहे। हजार साल से बृज में गोवर्धन पर अन्न का पहाड़ लगता है, छप्पन भोग लगता है, मांस का ढेर नहीं लगता लेकिन अभद्र पटनायक गोवर्धन पर मांस का पहाड़ लेकर आया है।
शाकाहार मांसाहार पर फिर कभी विमर्श करूंगा, इसलिए एडिट कर रहा । दूध माखन दही कृष्ण की पहचान है, गोपाल होने के नाते और वामपंथियों को इसी छवि को तोड़ना होता है क्योंकि यह छवि भक्त वत्सल की छवि है।

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