प्रोफेसर रिचर्ड अल्बर्ट आए थे, राम दास हो गए

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सिद्धार्थ अरोरा सहर

देहरादून : एक किस्सा सुन रहा था कि रिचर्ड अल्बर्ट करके हावर्ड के प्रोफेसर थे। वह एलएसडी ड्रग पर रिसर्च कर रहे थे।
ये एक किस्म की नशीली गोली होती है। अगर एक गोली गप्प कर लो तो आँखों की पुतली फैल जाती है। ब्लड प्रेशर तेज़ हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे दुनिया भर के रंगों की किसी ने सैचरैशन बढ़ा दी हो। समय क्या है, कब सुबह हुई कब रात, कुछ समझ नहीं आता।

एक गोली खाने के 20-30 मिनट बाद से ये असर शुरु होता है और नए-नए नशेड़ी को तो 24 घंटे तक परेशान करता है। पर नशेड़ी पुराना हो, रेगुलर हो तो भी 12 घंटे तो हवा में उड़ा ही देता है।
रिचर्ड अल्बर्ट यही गोली लेकर 1967 में नीम करौली बाबा से मिले थे। जैसे मैंने ऊपर एलएसडी की तारीफ़ें लिखी हैं, रिचर्ड ने इससे 10 गुणा ज़्यादा कसीदे पढ़े थे बाबा के सामने…
रिचर्ड ने अपनी किताब में लिखा कि बाबा नीम करौली ने उनके पास से सारी गोलियाँ लीं, कोई मुट्ठी भर तो होंगी; और एक बार में सारी फाँक गए।
रिचर्ड हैरान कि अब या तो इनको दिन में तारे नज़र आ जायेंगे, और या फि इतना ड्रग इनकी बूढ़ी बॉडी बर्दाश्त नहीं कर पायेगी और ये कोलैप्स हो जायेंगे।
लेकिन दोनों में से कुछ भी नहीं हुआ। नीम करौली बाबा अपनी जगह बने रहे, मुस्कुराते रहे।
उस दिन प्रोफेसर रिचर्ड अल्बर्ट ने नीम करौली बाबा को महाराजजी कहना शुरु कर दिया और पूरी तरह से उनकी शरण में चले गए। उस दिन रिचर्ड के तार्किक दिमाग ने घुटने टेक दिए और राम-दास का जन्म हुआ।
2019 में अपनी आखिरी साँस लेने तक वह राम दास ही रहे, खुश रहे, और योग साधना से जुड़े रहे।
नीम करौली बाबा को जानने वाले लोग ऐसे अनोखे किस्से बताते रहते हैं। इनपर बनी फ़िल्म हनुमान अंश अपने आप में एक चमत्कारी किस्सा है। ऐसा लग रहा है जैसे नीम करौली बाबा के भक्त सावन खत्म होने के इंतेज़ार में थे, कि रक्षाबंधन मनाएं और तब फ़िल्म देखने जाएँ।
मुझे लगा था कि हनुमान अंश को जितने भी शो मिल रहे हैं, वो टॉक्सिक के आते
ही ले लिए जायेंगे।
पर ताज्जुब देखिए, शनिवार और इतवार को टॉक्सिक के कोई 2000 और 2500
शो हनुमान अंश को दे दिए गए।
आज सोमवार को ये शिफ्टिंग का आँकड़ा 3000 से ऊपर रहा, 300 शोज़ से शुरु होने वाली हनुमान अंश आज कम से कम 7000 शो चलाकर 4 करोड़ से ऊपर का कलेक्शन कर रही है।
वहीं, विदेशी म्यूजिक, अत्यधिक शराब और सेक्स, बिना मतलब का खून खच्चर दिखाने वाली वर्ल्डक्लास सिनेमा बनाने की कोशिश में, पश्चिमी सिनेमा की नकल करती, 500 करोड़ की टॉक्सिक आज छः साढ़े छः करोड़ पर सिमट रही है।
ऐसा लग रहा है जैसे नीम करौली बाबा रिचर्ड की सारी नशीली गोलियाँ खा गए थे, वैसे ही यश की टॉक्सिक भी खा जायेंगे।
– सोशल मीडिया से साभार

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