समस्या केवल एक या दो व्यक्तियों की नहीं है। पूरे राजनीतिक वर्ग-सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों-ऐसे माध्यमों की ओर आकर्षित हो रहे हैं जिन पर ब्लैकमेलिंग, पैसे लेकर खबर चलाने और ‘प्लांटेड’ कंटेंट तैयार करने के आरोप लगते हैं। पटना में लाइव सिटीज मीडिया प्राइवेट लिमिटेड चलाने वाले यूट्यूबर ज्ञानेश्वर इसका एक उदाहरण हैं। उनके यहां मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सहित कई बड़े नेता पहुंचते दिख रहे हैं। ऐसी तस्वीरें जनता के बीच यह संदेश देती हैं कि अब सत्ता और ‘मीडिया’ के बीच पारदर्शिता की कोई दीवार नहीं बची। एक मुख्यमंत्री का ऐसे यू ट्यूबर के पास जाना, जिसकी पहचान बिहार में पत्रकारिता को लेकर नहीं बल्कि लेने देन के लिए है। ना सिर्फ मुख्यमंत्री के पद की गरिमा को घटाता है, बल्कि उनकी पूरी राजनीति को संदेह के घेरे में डाल देता है।

इसी तरह विपक्ष के नेता भी इस रास्ते पर चल रहे हैं। तेजस्वी यादव जैसे नेता भी ऐसे प्लेटफॉर्म्स को समय दे रहे हैं जहां गुणवत्ता से ज्यादा ‘ट्रैफिक’ और ‘निगोशिएशन’ की सुविधा महत्वपूर्ण हो गई है। कारण स्पष्ट है। पारंपरिक, सिद्धांतवादी पत्रकारों के साथ बातचीत जटिल होती है। वे सवाल पूछते हैं, जवाबदेही मांगते हैं और अपनी स्वतंत्रता बनाए रखते हैं। वहीं, जिनकी आय का मुख्य स्रोत ‘डील’ और ‘सेटलमेंट’ हो, उनके साथ समझौता आसान होता है। सरकार या विपक्षी दल उन्हें नियंत्रित कर सकते हैं, उनकी ‘फाइल’ तैयार रख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें अपनी तरफ मोड़ सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में संजय शर्मा (फोर पीएम वाले) का उदाहरण भी इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है। समाजवादी पार्टी से जुड़े माने जाने वाले और कपिल सिब्बल जैसे नामों के सहारे चलने वाले इस यूट्यूबर पर भी पत्रकारिता के नाम पर अनेक सवाल उठते रहे हैं। कल्पना कीजिए, अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनके साथ केक काटते हुए दिख जाए तो वह तस्वीर कितनी अशोभनीय लगेगी। यह मात्र व्यक्तिगत उदाहरण नहीं, बल्कि एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है।
इस श्रृंखला में ‘न्यूज लॉन्ड्री’ जैसे पोर्टल भी शामिल हो गए हैं, जिन पर पैसे लेकर खबर लगाने और अच्छी ‘ऑफर’ मिलने पर खबर हटाने के आरोप लगते रहे हैं। ये सभी मामले दर्शाते हैं कि मीडिया का डिजिटल स्वरूप अब सूचना प्रसार से ज्यादा ‘ट्रांजेक्शनल’ हो गया है। जहां पहले संपादकीय स्वतंत्रता और तथ्यों की जांच होती थी, वहां अब ‘स्पॉन्सर्ड कंटेंट’ और ‘ब्लैकमेल’ की संस्कृति हावी हो रही है।

इस गिरावट का सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को हो रहा है। जब राजनीतिक नेता और मीडिया दोनों ही नैतिकता की सीमा लांघने लगें, तो जनता का विश्वास दोनों पर से उठ जाता है। जो कुछ स्तरीय नेता और पत्रकार अब भी बचे हैं, वे अपने दम पर टिके हुए हैं। न समाज उन्हें पर्याप्त समर्थन दे रहा है, न कोई विचारधारा। वे अपवाद बनकर रह गए हैं।
समाधान सरल लेकिन कठिन है। राजनीतिक दलों को अपनी गरिमा समझनी होगी। उन्हें ऐसे माध्यमों से दूरी बनानी चाहिए जिनकी क्रेडिबिलिटी संदिग्ध हो। साथ ही, यूट्यूब और डिजिटल मीडिया को भी पारदर्शी विनियमन की जरूरत है-ताकि ब्लैकमेल और पेड न्यूज की संस्कृति पर अंकुश लग सके।
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। अगर यह स्तंभ कमजोर और लचीला हो जाएगा, तो पूरा ढांचा खतरे में पड़ जाएगा। समय आ गया है कि सत्ता और मीडिया दोनों अपनी जिम्मेदारी समझें। जनता अब केवल ‘सनसनी’ नहीं, बल्कि सच्चाई और नैतिकता भी चाहती है।



