दरअसल, पांच माह की गर्भवती निदा खान की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए न्यायालय का कहना रहा कि नवजात शिशु के बेहतर भविष्य और आरोपी महिला की स्थिति को देखते हुए न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करना उचित होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है, इसलिए आरोपी को लगातार हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, इस आदेश की एक पंक्ति ने पूरे मामले को कानूनी दायरे से निकालकर सामाजिक और सांस्कृतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
‘निदा खान’ की नजर में हिन्दू होने का मतलब ‘काफिर’ होना है!
सवाल उठ रहा है कि क्या न्यायिक संवेदना व्यक्त करने के लिए हिन्दुओं के देवता “भगवान श्रीकृष्ण” के जन्म प्रसंग का उदाहरण देना आवश्यक था? इस बात की यदि गंभीरता से जांच करें तो प्रश्न उठना इसलिए भी लाजमी है, क्योंकि ये वही निदा खान है, जिसे हिन्दू देवी-देवताओं से नफरत है! जिसका विश्वास किसी भी हिन्दू परंपरा और धर्म के किसी भी कर्म पर नहीं है।
उस पर जो आरोप लगे हैं, वह धार्मिक उत्पीड़न के हैं, जिसमें कि पीड़ितों ने अपनी आपबीती में साफ बताया है कि कैसे ‘निदा खान’ उन्हें उनके हिन्दू देवी-देवताओं को लेकर अपमानित करती थी! उसके लिए क्या “भगवान श्रीकृष्ण” के जीवन से जुड़ा कोई उदाहरण दिया जा सकता है? या यही देना इतना जरूरी था। एक नजर में देखा जाए तो यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ‘निदा खान’ की नजर में हिन्दू होना यानी ‘काफिर’ होना है, जिसमें कि कथित ‘इस्लाम’ काफिरों के लिए बहुत कुछ कहता है!
Al-Wala’ wal-Bara में काफिरों से दूरी बनाने को कहा गया
इस्लामिक अकीदे (आस्था) में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है जिसे “अल-वला वल-बरा” (Al-Wala’ wal-Bara’) कहा जाता है। इसका अर्थ होता है “अल्लाह के लिए प्रेम करना और अल्लाह के लिए ही घृणा या दूरी बनाना।” इसके तहत ‘काफिरों’ से दिली दोस्ती रखने को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है।पुस्तक ‘अल-वला वल-बरा फिल-इस्लाम’ के लेखक डॉ. मुहम्मद सईद अल-कहतनी का कहना है, “एक सच्चे मुसलमान के ईमान की पूर्णता तब तक नहीं हो सकती जब तक वह अल्लाह के दुश्मनों (काफिरों) से पूरी तरह नाता न तोड़े और अपने दिल में उनके प्रति ‘बरा’ (घृणा/अस्वीकार्यता) न रखे। काफिरों से वैचारिक या सामाजिक स्तर पर अत्यधिक घनिष्ठता रखना मुसलमान को इस्लाम के दायरे से बाहर कर सकता है।”(पृष्ठ संख्या: 112–115)।
इस सिद्धांत के अनुसार, एक मुसलमान सिर्फ दूसरे मुसलमान का ही भाई या मित्र हो सकता है। ‘काफिर’ चाहे कितना भी अच्छा व्यवहार करे, उसकी धार्मिक स्थिति के कारण एक मुसलमान को उससे आंतरिक रूप से दूरी बनाए रखनी होती है।
इसी तरह से एक अन्य किताब ‘तफसीर माआरिफुल कुरान (खंड 2)’ मे लेखक- ‘मुफ्ती मुहम्मद शफी उस्मानी’ पृष्ठ संख्या: 54-56 (सूरह आल-इमरान, आयत 28 की व्याख्या) में लिखते हैं, “ईमानवालों को चाहिए कि वे मोमिनों को छोड़कर काफिरों को अपना दिली दोस्त (औलिया) न बनाएं। और जो ऐसा करेगा, उसका अल्लाह से कोई संबंध नहीं।”
दिल की सच्ची दोस्ती और वफादारी किसी भी काफिर के साथ रखना सख्त हराम
वस्तुत: यहां मुफ्ती शफी लिखते हैं कि काफिरों के साथ सिर्फ तीन तरह के संबंध हो सकते हैं: ‘मुदारात’ (दिखावे की भलाई), ‘मुआसात’ (आर्थिक सहायता), और ‘मुवालात’ (दिल की दोस्ती)। इसमें से ‘मुवालात’ (दिल की सच्ची दोस्ती और वफादारी) किसी भी काफिर के साथ रखना सख्त हराम (वर्जित) है।
अन्य पुस्तक ‘तफसीर इब्न कसीर (खंड 4)’ में भी लेखक इमाम हाफिज़ इब्न कसीर के विचार इस संदर्भ में देखे जा सकते हैं, सूरह अत-तौबा (9:29) की व्याख्या में वे लिखते हैं, “उन लोगों से युद्ध करो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं और न अंतिम दिन पर… यहाँ तक कि वे अपने हाथों से जिज़्या दें और वे अपमानित (सागिरून) होकर रहें।”
इस तरह के कथित कई इस्लामिक ग्रंथ देखे जा सकते हैं, जिसमें कि ‘काफिर’ यानी गैर मुसलमानों को लेकर बहुत कुछ घृणित, नकारात्मक एवं उनके प्रति हिंसा को सही ठहरानेवाला, उक्साने के संदर्भ में लिखा गया है। यानी कि सीधे तौर पर कहें तो जिस मामले में ‘निदा खान’ आरोपी बनाई गई है, वह अपने स्तर पर जो टीसीएस कंपनी में रहकर कर हिन्दुओं के साथ व्यवहार कर रही थी, उसे आप ‘काफिरों’ के प्रति उसका किया जा रहा जिहाद कह सकते हैं!
विवाद का कारण है ‘भगवान श्रीकृष्ण’ जन्म का उदाहरण
न्यायालय की टिप्पणी पर सोशल मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कई लोगों ने सवाल उठाया कि भगवान श्रीकृष्ण और माता देवकी के प्रसंग की तुलना किसी आपराधिक मामले में आरोपी महिला की स्थिति से करना कितना उचित है? इस मामले में आलोचना कर रहे तमाम लोगों का तर्क है कि माता देवकी और वसुदेव किसी अपराध के कारण जेल में नहीं थे। उन्हें अत्याचारी राजा कंस ने सत्ता के दुरुपयोग के तहत कारागार में रखा था, इसलिए ‘भगवान श्रीकृष्ण’ जन्म की परिस्थिति को किसी आरोपी के जेल में बच्चे को जन्म देने की स्थिति से जोड़ना सांस्कृतिक रूप से दो अलग संदर्भों को एक साथ रखने जैसा है।
सोशल मीडिया में आज कई लोग इस बात को भी उठा रहे हैं कि भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना में ‘श्रीकृष्ण’ का जन्म अन्याय के विरुद्ध ‘धर्म’ की स्थापना का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग न्यायिक आदेशों में करते समय अतिरिक्त सावधानी की अपेक्षा की जाती है।
कानूनी विशेषज्ञ अधिवक्ता आशुतोष कुमार झा का मानना है, “न्यायालयों के पास पर्याप्त संवैधानिक आधार मौजूद हैं। महिला की गरिमा, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, बच्चे के हित और मानवीय आधार जैसे सिद्धांत अपने आप में जमानत देने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं। ऐसे में धार्मिक संदर्भों की आवश्यकता नहीं थी।”
एडवोकेट झा कहते हैं, “न्यायिक भाषा सिर्फ आदेश का हिस्सा नहीं होती, वह समाज में न्यायपालिका की छवि को भी प्रभावित करती है। इसलिए न्यायिक शब्दों का चयन उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है जितना कि स्वयं फैसला।”
मामले की शुरुआत एक शिकायत से हुई
उल्लेखनीय है कि इस पूरे मामले की शुरुआत मार्च 2026 में हुई, जब टीसीएस बीपीओ में काम करने वाली एक महिला ने नासिक के देवलाली कैंप पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उसे शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाए गए और बाद में धार्मिक दबाव का सामना करना पड़ा। इसके बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और कंपनी से जुड़े अन्य कर्मचारियों से भी पूछताछ की।
पुलिस ने जांच के लिए महिला पुलिसकर्मियों को कर्मचारी के रूप में कंपनी में भेजा, ताकि वहां की गतिविधियों और आरोपों से जुड़े साक्ष्य जुटाए जा सकें। जांच आगे बढ़ने पर कई अन्य शिकायतें सामने आईं और कुल नौ एफआईआर दर्ज की गईं।
निदा खान पर गंभीर आरोप हैं
निदा खान इस मामले की मुख्य आरोपियों में शामिल हैं। नासिक पुलिस की विशेष जांच टीम टीसीएस बीपीओ से जुड़े नौ मामलों की जांच कर रही है। पुलिस के अनुसार, आरोप है कि कंपनी में काम करने वाली कुछ हिंदू महिला कर्मचारियों को धार्मिक परिवर्तन के लिए प्रभावित करने का प्रयास किया गया। आरोपों में कथित रूप से धार्मिक साहित्य साझा करना, धार्मिक गतिविधियों के लिए दबाव बनाना और पीड़िताओं के साथ मानसिक एवं सामाजिक दबाव बनाने जैसी बातें शामिल हैं। जांच एजेंसियों का दावा है कि कुछ मामलों में महिलाओं को धार्मिक पहचान बदलने और इस्लामी रीति-रिवाज अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।
अब अंत में यही कि न्यायपालिका से समाज की अपेक्षा निष्पक्ष फैसले की होने के साथ ही ऐसी भाषा की भी होती है जो संविधान की भावना और देश की विविध सांस्कृतिक संवेदनाओं के अनुरूप हो। क्योंकि अदालतों के फैसले मुकदमों का अंत नहीं करते, वे समाज में न्याय की समझ और विश्वास को भी आकार देते हैं, इसलिए निदा खान की जमानत पर न्यायालय द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के जन्म को लेकर की गई टिप्पणी का आज जिक्र हो रहा है। सीधी और सटीक बात यही है कि जिसकी आस्था भगवान में है ही नहीं, उसके लिए आखिर क्यों हिन्दू देवी-देवताओं का उल्लेख न्यायालयीन भाषा में किया जाना चाहिए?



