डॉ. पवन विजय
दिल्ली। रोमिला थापर पिछले कई दशक से अकादमिक और सिविल के पाठ्यक्रम में अनिवार्य विषय के तौर पर मौजूद है। तथ्यों के नाम पर अहंकार और कपोल कल्पनाओं को परोसती यह इस डिस्टोरियन के लेखन की पहली चाल पहचान पर हमला करने की थी। रोमिला के फर्जीफिकेशन को एक एक कर समझते हैं।
1. थापर ने लगातार ये स्थापित किया कि “हिंदू धर्म जैसा हम आज जानते हैं, वह उन्नीसवीं सदी का निर्माण है। पूर्व-औपनिवेशिक भारत में कोई एकल एकीकृत हिंदू पहचान नहीं थी।” उसके अनुसार प्राचीन भारत में केवल शैव, वैष्णव, शाक्त जैसे बिखरे हुए पंथ थे, जिनमें कोई साझा सभ्यतागत चेतना नहीं थी। इस एक तर्क से भारत की हजारों साल की सांस्कृतिक निरंतरता को तोड़ दिया जाता है और देश को एक आधुनिक, कृत्रिम निर्माण के रूप में पेश किया जाता है।
2. उसका दूसरा कार्य हिन्दू स्रोतों को अवैध घोषित करना था। रामायण, महाभारत, पुराण, वेद और अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों को ब्राह्मण एलीट वर्ग का प्रोपेगेंडा बताकर इतिहास के दायरे से बाहर कर दिया गया। इन ग्रंथों में दिए गए नगरों, राज्यों, वंशों और युद्धों के विस्तृत विवरणों को मिथक कह दिया गया। मजे की बात यह है कि यही कठोरता इस्लामिक काल के दरबारी इतिहासों पर कभी नहीं दिखाई गई, वहाँ तारीख-ए-फिरोजशाही या बाबरनामा जैसे एकतरफा ग्रंथ भी प्रामाणिक स्रोत बन जाते हैं।
3.थापर की तीसरी बात हिंदू धर्म को पूरी तरह जाति व्यवस्था में समेत देना थी। उसके इतिहास में भक्ति आंदोलन, अद्वैत, योग, न्याय दर्शन, गणित और खगोल जैसी बौद्धिक उपलब्धियों के लिए कोई जगह नहीं बची। हर कालखंड, हर राजवंश और हर परम्परा को केवल ब्राह्मण बनाम शूद्र के शोषण के फ्रेम में पढ़ाया गया, ताकि छात्र अपने धर्म को ज्ञान की परम्परा के बजाय केवल शोषण की व्यवस्था के रूप में देखें।
4. रोमिला की चौथी रणनीति पुरातात्विक और मंदिर परम्परा के भाषा के सौंदर्य, विन्यास, विधान को सिरे से नकारना था। अयोध्या, मथुरा और काशी जैसे स्थलों पर मंदिर के स्पष्ट अवशेष मिलने पर भी उन्हें धार्मिक संरचना नहीं बल्कि सामान्य आर्किटेक्चरल फीचर्स कहा गया। साथ ही एक बराबरी का झूठा नैरेटिव बनाया गया कि “महामूद गजनवी का मंदिर से जुड़ाव धार्मिक कट्टरता से ज्यादा धन के लिए विजय का मामला था।” और हिंदू राजाओं ने भी बौद्ध और जैन मठ तोड़े थे, इसलिए सोमनाथ से लेकर काशी विश्वनाथ तक का विध्वंस कोई धार्मिक कट्टरता नहीं बल्कि मध्यकालीन राजनीति का सामान्य हिस्सा था।
5. रोमिला का सबसे विषैला, हाइपोथेटिकल पैटर्न नैतिक मॉडल गढ़ने का था। अशोक जो युद्ध छोड़कर बौद्ध बन गया, वह सेक्युलर और महान है, जबकि समुद्रगुप्त, चाणक्य या पुष्यमित्र शुंग जैसे साम्राज्य निर्माता और राज्य की अवधारणा देने वाले लोग ब्राह्मणवादी और कट्टर हैं। इसका संदेश साफ था, हिंदू तभी अच्छा और प्रगतिशील माना जाएगा जब वह अपनी सत्ता, अपने प्रतीक और अपनी सभ्यतागत पहचान को खुद ही छोड़ दे।
6. हिंदू डी कंस्ट्रक्शन का मॉडल रोमिला ने तैयार किया और मार्क्सिस्ट डिस्टोरियन की कई पीढ़ी उसी के आधार पर बनाई। इस डी कंस्ट्रक्शन मॉडल में गजनी, गोरी, तुगलक, खिलजी, बाबर हीरो हैं, हिंदू राजा मार्क्स का बुर्जुआ है। इस पूरी डी-कंस्ट्रक्शन का सबसे बेतुका उदाहरण तब सामने आया जब थापर ने अपने एक लेक्चर में कहा कि “आज कुछ इतिहासकार कह रहे हैं कि शायद जब युधिष्ठिर ने कहा कि मैं राजा नहीं बनना चाहता, तो उसके मन में अशोक की छवि थी।” यानी 5000 साल पहले का महाभारत का नायक 2300 साल बाद हुए अशोक से प्रेरणा ले रहा है। इसी सोच का विस्तार अयोध्या पर दिया गया उसका वह हलफनामा है जिसमें उन्होंने कहा था कि “अयोध्या में बाबरी मस्जिद के नीचे ऐसे किसी मंदिर का कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं है जिसे राम का जन्मस्थान माना जा सके,” जबकि बाद में ASI को वहां 50 से ज्यादा मंदिर स्तंभों के बेस मिले थे।
कोर्ट ने थापर की बात को नहीं माना लेकिन पिछले कई दशकों से थापर के झूठ को लिख पढ़ कर भारत के प्रोफेसर, सिविल सर्वेंट तैयार हुए। आप स्वयं सोचिए रोमिलाई स्कूल में प्रशिक्षित लोगों का भारत बोध क्या होगा।



