
सच्चाई सामने आई तो न्यूज लॉन्ड्री भाग खड़ी हुई। खबर प्रकाशित होने के कुछ समय बाद ही न्यूज लॉन्ड्री ने अपनी वेबसाइट से वह रिपोर्ट गायब कर दी। आज तक उस झूठ के लिए कोई माफी नहीं मांगी, कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। सवाल उठता है- अगर खबर सच्ची होती तो क्यों हटाई गई? स्पष्ट है कि यह खबर ब्लैकमेलिंग और मानहानि का हथियार थी। न्यूज लॉन्ड्री ने शायद सोचा कि दफ्तूआर जैसे प्रभावशाली व्यक्ति से लाखों-करोड़ों रुपये वसूल किए जा सकते हैं। लेकिन उन्हें पता नहीं था कि सांच को आंच नहीं लगती। मान हानि के मुकदमे के डर से उन्होंने झट पट स्टोरी डिलीट भी कर दी।
नीरज दफ्तूआर ने कभी गलत काम नहीं किया, इसलिए झुकने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने शांतिपूर्वक सच्चाई पर भरोसा रखा और न्यूज लॉन्ड्री को अपना झूठ वापस लेने पर मजबूर कर दिया। यह घटना न्यूज लॉन्ड्री की पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है। एक तरफ वे बड़े-बड़े दावे करती है, दूसरी तरफ बिना सबूत के किसी ईमानदार व्यावसायी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने से बाज नहीं आती।
जिस तरह मैदान छोड़कर न्यूज लॉन्ड्री भागा है, उसे देखकर तो कहा जा सकता है कि दफ्तूआर परिवार पर लगाए गए आरोप पूरी तरह बेबुनियाद साबित हुए। नीरज दफ्तूआर आज भी हरियाणा की सेवा में तत्पर हैं- बिना किसी शोर-शराबे के, बिना वेतन के लालच के। उनकी कहानी उस व्यावसायी की कहानी है जो राजनीति और मीडिया के दबाव के बावजूद अपने कर्तव्य का पालन करता है और अपने व्यवसाय के साथ साथ राजनीतिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाकर चलता है।
न्यूज लॉन्ड्री का यह कृत्य निंदनीय है। जब तक वे अपने झूठ के लिए सार्वजनिक माफी नहीं मांगती, उनकी विशवसनीयता संदिग्ध ही मानी जाएगी। नीरज दफ्तूआर इस प्रकरण में पीड़ित नहीं, बल्कि सच्चाई के विजेता साबित हुए।



