बापूधाम (बिहार) : मैथिली भोजपुरी के प्रसिद्ध साहित्यकार केशव भारद्वाज ने यू ट्यूबर रवीश कुमार को मीर जाफर आम भेज दिया। सोशल मीडिया पर चर्चा होने लगी। लोग पूछ रहे हैं-चंपारण में जर्दालू और लंगड़ा जैसे स्वादिष्ट आमों का भंडार है, फिर ‘गद्दार’ का नाम क्यों? और इस नाम वाले आम को भेजा किसे गया? रवीश कुमार को!
रवीश जी ‘सच्चाई’ के मसीहा बने घूमते हैं। हर मंच पर गद्दारी, सत्ता के सामने झुकने और ‘देश को बेचने’ वाले लोगों को कोसते हैं। लेकिन जब बात अपने गले की आती है, तो उनका गला अचानक सूख जाता है। पलासी (Plassey) के मैदान में (पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में भागीरथी नदी के तट पर स्थित) मीर जाफर ने नवाब को अंग्रेजों के हवाले कर दिया था। आज का पलासी टीआरपी, फंडिंग और वर्चस्व का मैदान है। रवीश इसमें किसकी तरफदारी करते हैं? जिस सत्ता को वे ‘फासीवादी’ कहते हैं, उसी के खिलाफ ‘बोलते’ रहते हैं, लेकिन अपने यू ट्यूब चैनल और बयानों में जिसकी तरफ की वे ‘चुप्पी’ ओढ़ते हैं, वह भी कम गद्दारी नहीं है।
चंपारण गांधी का सत्याग्रह देख चुका है। वहां के किसान आज भी संघर्ष करते हैं। लेकिन रवीश, जो खुद चंपारण से ताल्लुक रखते हैं, जब बिहार के किसानों की असली समस्याओं पर बोलते हैं तो आवाज़ दब जाती है। दिल्ली के स्टूडियो में ‘किसान आंदोलन’ की महिमा गाते हैं, लेकिन चंपारण के लंगड़े आम वाले किसान जब पूछते हैं कि भाई, हमारे यहां की मिट्टी, हमारी फसल, हमारी बेटियों की सुरक्षा पर क्यों चुप हो? तब रवीश ‘बड़ा मुद्दा’ चुन लेते हैं। गद्दारी का आम खाने वाले को चंपारण का लंगड़ा शायद पचता नहीं। जबकि बिहार में माहौल अनुकूल है। बीजेपी की सरकार है लेकिन फिर भी चंपारण पर चुप्पी है।
उनकी हिपोक्रिसी का सबसे मधुर स्वाद तब आता है जब वे ‘धर्मनिरपेक्षता’ की दुहाई देते हैं। एक तरफ अल्पसंख्यकों के नाम पर रोना, दूसरी तरफ हिंदू समाज की हर परंपरा पर तंज। लेकिन जब कोई सवाल उनके अपने ‘सेकुलर’ गिरोह पर उठता है, तो ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ और ‘भक्त’ शब्दों का आम खाकर चुप हो जाते हैं। अब कोई उनसे पूछे कि वे इसे छील कर खाएंगे या काटकर? वैसे मीर जाफर ने एक बार गद्दारी की थी, रवीश रोज करते हैं-शब्दों से, चुप्पी से, चयनित सवालों से।
चंपारण के लोग मजे ले रहे हैं तो लेने दो। क्योंकि वे जानते हैं कि आम का नाम सिर्फ फल नहीं, चरित्र भी बताता है। मीर जाफर का आम मीठा लगता है, लेकिन पेट में जलन छोड़ जाता है। ठीक वैसे जैसे रवीश की ‘निष्पक्ष पत्रकारिता’। बाहर से चमकदार, अंदर से सड़ांध।
अब सवाल यह है-अगली बार केशव जी उन्हें क्या भेजेंगे? शायद ‘जुदास (Judas) का आम’। या फिर सीधे ‘ईस्ट इंडिया कंपनी का शेयर’। क्योंकि गद्दारी का स्वाद एक बार चख लेने के बाद, आदमी फिर वही आम मांगता है। चंपारण के किसान हंस रहे हैं। वे जानते हैं-जो मीर जाफर का आम खाता है, वह कभी चंपारण का ‘डंका’ पसंद नहीं करेगा।



