सकल हंस में ‘गूँजे देश राग’

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डॉ. अमरेन्द्र कुमार आर्य

दिल्ली । डॉ. सच्चिदानंद जोशी समकालीन भारत के उन विरल सांस्कृतिकव्यक्तित्वों में हैं जिन्होंने साहित्य, लोकजीवन, रंगमंच, मीडिया तथाभारतीय ज्ञान परंपरा को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया है। वे केवललेखक नहीं हैं। वे भारतीय सांस्कृतिक चेतना के सजग संवाहक भी हैं।उनके चिंतन में भारत किसी मानचित्र का नाम नहीं बनता। वह स्मृतियों, परंपराओं, लोकध्वनियों और मानवीय संवेदनाओं से निर्मित एक जीवितअनुभूति के रूप में सामने आता है। डॉ. जोशी संस्कृति को स्थिर विषयनहीं मानते। उनके लिए संस्कृति जीवन की प्रवहमान धारा है। वहलोकगीतों में बहती है। यात्राओं में धड़कती है। गाँवों की मिट्टी में महकतीहै। मंदिरों की घंटियों में गूँजती है। मनुष्य के व्यवहार में अपना स्वर पातीहै। यही कारण है कि उनके लेखन में विद्वत्ता के साथ आत्मीयता भीदिखाई देती है। उनकी इसी सांस्कृतिक दृष्टि का सुंदर विस्तार गूँजे देशराग में दिखाई देता है। यह पुस्तक केवल यात्रा वृत्तांत नहीं है। यह भारतकी सांस्कृतिक आत्मा को सुनने और महसूस करने की एक भावयात्रा है।पुस्तक पढ़ते समय बार-बार लगता है कि लेखक जनजीवन की सहजतामें भारतीयता का आलोक खोज रहे हैं। इस कृति में देश और विदेश कीयात्राएँ केवल स्थानों का परिचय नहीं करातीं। वे सभ्यताओं, संस्कृतियों, लोकस्मृतियों और मनुष्य के भीतर बसे राष्ट्रबोध का परिचय भी देती हैं।लेखक जहाँ भी जाते हैं वहाँ की मिट्टी, भाषा, स्थापत्य, भोजन, संगीतऔर लोकधुनों को आत्मीय दृष्टि से देखते हैं। इसीलिए उनके यात्रा वर्णनदृश्य नहीं रचते, अनुभव रचते हैं। वर्ष 2026 में इस पुस्तक का लोकार्पणसाहित्य अकादेमी में हुआ। तभी से इसे भारतीय संस्कृति और यात्रासाहित्य की महत्त्वपूर्ण कृति के रूप में देखा जा रहा है। पुस्तक की भाषाइसकी सबसे बड़ी शक्ति है। उसमें अद्भुत लालित्य है। शब्दों में आत्मीयऊष्मा है। वर्णनों में चित्रात्मक सौंदर्य है। कई स्थानों पर लगता है मानोलेखक शब्दों से दृश्य उकेर रहे हों। किसी शहर का वर्णन आता है तोउसकी सड़कें, हवा, लोग, संगीत और वातावरण एक साथ जीवंत होउठते हैं। पाठक केवल पढ़ता नहीं। वह उन यात्राओं के साथ चलने लगताहै।

सच्चिदानंद जोशी यात्रा को केवल स्थान परिवर्तन नहीं मानते। वे उसेमनुष्य, समाज और संस्कृति को समझने की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं।किसी स्थान का वर्णन करते समय वे वहाँ की मिट्टी, लोकधुन, बोली, स्थापत्य, भोजन, लोगों की संवेदना और सांस्कृतिक स्मृतियों को साथलेकर चलते हैं। यही कारण है कि पाठक को बार-बार यह अनुभव होताहै मानो वह स्वयं उन रास्तों से होकर गुजर रहा हो। यात्रा-वृत्तांतों में भीउनका सांस्कृतिक दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता है। वे किसी देश याशहर को केवल पर्यटक की दृष्टि से नहीं देखते। वे वहाँ की सभ्यता, सांस्कृतिक इतिहास और मानवीय संवेदनाओं को समझने का प्रयासकरते हैं। इसी कारण उनकी यात्राएँ केवल स्थानों का विवरण नहीं रहजातीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद बन जाती हैं। पुस्तक पढ़ते समय उनकीभाषा अत्यंत सहज, लालित्यपूर्ण और संवादधर्मी लगती है। वे जटिलसांस्कृतिक विमर्श को भी सरल शब्दों में प्रस्तुत कर देते हैं। कहीं-कहींउनका व्यंग्य पाठक को मुस्कुराने पर विवश करता है, तो कहीं उनकीभावुकता मन को छू लेती है। पुस्तक ‘गूँजे देश राग’ का मूल स्वरभारतीय सांस्कृतिक चेतना है। लेखक आधुनिकता के बीच भी भारतीयपरंपरा की जीवंतता को खोजते हैं। वे महानगरों की चमक से अधिक उनछोटे सांस्कृतिक बिंदुओं पर दृष्टि डालते हैं जहाँ भारत अपनी वास्तविकपहचान के साथ उपस्थित दिखाई देता है। पुस्तक में यात्रा-वर्णन के साथइतिहास-बोध, कला-दृष्टि और सांस्कृतिक विमर्श भी सहज रूप मेंउपस्थित हैं। यही कारण है कि यह कृति सामान्य यात्रा-वृत्तांत से आगेबढ़कर सांस्कृतिक दस्तावेज का रूप ले लेती है। यह अनुभव इसलिए भीहोता है कि इस पुस्तक के सृजक डॉ. सच्चिदानंद जोशी भारतीय परंपराऔर आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करने वाले चिंतकों में भी गिनेजाते हैं। वे आधुनिक दृष्टि को स्वीकार करते हैं, पर अपनी सांस्कृतिकजड़ों से कटने के पक्षधर नहीं हैं। उनके विचारों में भारतीय ज्ञान-परंपरा केप्रति सम्मान और समकालीन समाज के प्रति सजगता दोनों साथ दिखाईदेते हैं। लेखक की शैली अत्यंत प्रवाहपूर्ण और साहित्यिक है। कहींपत्रकारिता की स्पष्टता दिखाई देती है तो कहीं संस्मरणात्मकआत्मीयता। कई स्थानों पर वर्णन इतना चित्रात्मक हो उठता है कि दृश्यआँखों के सामने सजीव हो जाता है। पुस्तक में भावुकता है, पर वहकृत्रिम नहीं लगती। उसमें अनुभव की सच्चाई और संवेदना की गरिमा है।यह पुस्तक भारतीय यात्रा-साहित्य की उस परंपरा को आगे बढ़ाती हैजिसमें यात्रा केवल पर्यटन नहीं होती, बल्कि समाज और संस्कृति कोसमझने का माध्यम बनती है। इस दृष्टि से यह कृति राहुल सांकृत्यायनऔर अज्ञेय की यात्रा-दृष्टि की आधुनिक प्रतिध्वनि प्रतीत होती है।हालांकि सच्चिदानंद जोशी का स्वर अधिक सांस्कृतिक और आत्मपरकहै। पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसमें राष्ट्रवाद किसीराजनीतिक आग्रह के रूप में नहीं आता। वह सांस्कृतिक आत्मीयता केरूप में उपस्थित होता है। लेखक भारत को उसकी विविधताओं, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक निरंतरता में देखते हैं। इसलिए पुस्तक पढ़तेहुए पाठक के भीतर अपने देश के प्रति आत्मीय गर्व का भाव जागृत होताहै।

पुस्तक के आरंभिक आलेखों में लेखक ने अपनी पहली यात्रा के प्रसंगको अत्यंत रोचक ढंग से लिखा है। कैसे कई बार यात्रा होते-होते रह गई।कैसे एक छोटी-सी लापरवाही किसी व्यक्ति के सपनों का रंग फीका करदेती है। वे लिखते हैं की “सुबह ही बताने वाला था। लेकिन किसी कार्यमें फँस गया। सॉरी।” यह छोटा-सा वाक्य पूरी स्थिति की विडंबना कोसामने ला देता है। इसके बाद उनका सहज हास्य सामने आता है। वेलिखते हैं कि “अपना-सा मुँह लेकर वापस लौटे। दो-चार दिन तक दफ्तरमें और दोस्तों से मुँह छिपाए घूमते रहे गोया कोई बड़ा अपराध कर दियाहो।” इस पूरे प्रसंग में लेखक की विनोदप्रियता और आत्मीय शैली दोनोंदिखाई देती हैं। पेरिस प्रवास के वर्णन में भी लेखक का भावुक औरमानवीय पक्ष उभरकर सामने आता है। विशेषकर डायना के संदर्भ मेंलिखते समय उनकी संवेदना पाठक को भीतर तक छूती है। वहाँ भाषा मेंएक मासूम आत्मीयता दिखाई देती है। मानो लेखक अपने अनुभवों कोनहीं, अपने मन को पाठक के सामने खोल रहा हो।

रूस यात्रा का चित्रण पुस्तक के सबसे प्रभावशाली अंशों में से एक है।भारतीय यात्रियों की मनोदशा को लेखक ने अत्यंत चुटीले ढंग से प्रस्तुतकिया है। पाठ को पढ़ते समय लगता है की हम भारतीयों की मनोदशा हीहोती है कि “हम ट्रेन से नहीं चलते, बल्कि ट्रेन हमारे कारण चल रहीहोती है।” यह पंक्ति भारतीय स्वभाव की सहज व्याख्या बन जाती है।वहीं “रूस में वेद” जैसा आलेख भारतीय सांस्कृतिक जड़ों की व्यापकताका बोध कराता है। यह पाठ हमें याद दिलाता है कि हमारी सांस्कृतिकस्मृतियाँ सीमाओं से बड़ी होती हैं। कंबोडिया यात्रा का “अंडे अनुभव” पढ़ते समय लेखक का व्यंग्य अपने पूरे प्रभाव में दिखाई देता है। यहकेवल यात्रा की कठिनाई नहीं है। यह उन लोगों की सामूहिक समस्या हैजो भाषा और खानपान के कारण विदेशों में असहज स्थितियों से गुजरतेहैं। लेखक इस अनुभव को हास्य और संवेदना दोनों के साथ प्रस्तुत करतेहैं। “कहाँ तक फैले हैं हमारे निशाँ” पाठ विशेष रूप से उल्लेखनीय है।इसमें अजरबैजान की राजधानी बाकू में स्थित आतेशगाह फायर टेम्पलका वर्णन है। लेखक बताते हैं कि यह स्थान भारतीय व्यापारियों औरसंस्कृति के विस्तार का जीवंत प्रमाण है। मंदिर की संरचना भलेपारंपरिक भारतीय मंदिर जैसी न हो, पर उसके ऊपर देवनागरी में “श्रीगणेशाय नमः”, “ज्वाला देवी” और “शंकर भगवान” की स्तुतियाँ दिखाईदेती हैं। यह प्रसंग पाठक को अपने सांस्कृतिक अतीत से जोड़ देता है।“मी गुड फोटो” आलेख भी अत्यंत रोचक है। रमणीय स्थलों पर फोटोखिंचवाने की मानवीय प्रवृत्ति को लेखक ने बड़े सहज ढंग से पकड़ा है।यह केवल तस्वीरें लेने की आदत नहीं, बल्कि स्मृतियों को जीवित रखनेकी मानवीय इच्छा है। “कोबुस्तान के अनोखे नज़ारे”, “साहित्य सम्मानको सलाम” और “हम तो ऐसे हैं भैया” जैसे आलेख भी पुस्तक को विशेषबनाते हैं। “साहित्य सम्मान को सलाम” में लेखक बताते हैं कि किसप्रकार एक देश दूसरे देश के साहित्यकार को भी सम्मान देता है। वहीं“हम तो ऐसे हैं भैया” में भारतीय स्वभाव की सहजता, अव्यवस्था औरआत्मीयता दोनों दिखाई देती हैं। दो मातृशक्तियों का झगड़ा हो याहोटल में पंजाबी लॉबी का भारीपन, सब कुछ इतना जीवंत है कि पाठकमुस्कुराए बिना नहीं रह पाता।

“तन्हा गुजरते हुए” आलेख में लंदन का वर्णन अत्यंत सकारात्मक दृष्टिसे किया गया है। वहीं “संग्रहण की सीख देता संग्रहालय” पाठसंग्रहालयों के माध्यम से सभ्यता की स्मृति-संरक्षा का महत्त्व समझाताहै। वियना में तान्या की कार-राइड के बहाने लेखक ने शहर को पैदलघूमने के आनंद को बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया है। थाईलैंड पर लिखागया आलेख विशेष रूप से उल्लेखनीय है। आम भारतीय मानस मेंथाईलैंड की जो छवि है, उससे बिल्कुल अलग लेखक उसे एक धार्मिकऔर सांस्कृतिक देश के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यहाँ स्पष्ट होता है कियात्रा-वृत्तांत केवल पर्यटन-विवरण नहीं होता, बल्कि दृष्टि का विस्तार भीहोता है। जापान के अनुशासन पर बहुत कुछ लिखा गया है, पर लेखक नेएक छोटे-से प्रसंग के माध्यम से उसे मानवीय आदर्श के रूप में प्रस्तुतकिया है। “सुशी रे सुशी” आलेख भोजन-संस्कृति के बहाने मनुष्य कीजिज्ञासा और असहजता दोनों को सामने लाता है। मध्य वियतनाम मूलहिंदू, मंगोलिया की ठंड, आप्रवासी घाट, विदेश में हिंदी का अनुभव औरएथेंस का विचित्र चरित्र जैसे सभी यात्रा-वृत्तांत अत्यंत करीने से लिखे गएहैं। चीन में शाकाहारी भोजन की दुविधा का वर्णन पढ़ते समय हरभारतीय शाकाहारी स्वयं को लेखक के साथ खड़ा महसूस करता है।“पुराने ओलंपिक में नया मेडल” पढ़ते समय लेखक के भीतर छिपीपुरानी आकांक्षाओं की हल्की कसक सामने आती है। वे असली उपलब्धिन होने पर भी स्मृतियों को अपने ढंग से सहेज लेते हैं। बिना मेडल वालीतस्वीर भी वहाँ इच्छाशक्ति और आत्मीयता का प्रतीक बन जाती है।कोपेनहेगन को लेखक ने साइकिलों की राजधानी कहा है। इसके माध्यमसे वे सस्ती, सहज और पर्यावरण-अनुकूल यात्रा पद्धति की आवश्यकताको बड़ी सादगी से सामने रखते हैं। पुस्तक का समापन स्वामी विवेकानंदसे जुड़े शिकागो के प्रसंग से होता है। उस स्थान को देखने की लेखक कीउत्कंठा पाठक को भी भावुक कर देती है। इस तरह से देखें तो भारतीयकला, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण तथा प्रसार में इस पुस्तक केबहाने डॉ. सच्चिदानंद जोशी का योगदान उल्लेखनीय रहा है। वे उनव्यक्तित्वों में हैं जिन्होंने संस्कृति को केवल बौद्धिक विमर्श तक सीमितनहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज और नई पीढ़ी से जोड़ने का प्रयासकिया।

यश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित गूँजे देश राग में कुल तीस आलेख संकलितहैं। आकार में सहज और मूल्य में साधारण दिखाई देने वाली यह पुस्तकअपने भीतर अनुभवों, संस्कृतियों, स्मृतियों और संवेदनाओं का एकविस्तृत संसार समेटे हुए है। मात्र 250 रुपये मूल्य की यह कृति अपनेसाहित्यिक और सांस्कृतिक वैभव के कारण कहीं अधिक मूल्यवान प्रतीतहोती है। यह उन पुस्तकों में है जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्किमहसूस किया जाता है। डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने इस पुस्तक में यात्रा कोकेवल भौगोलिक दूरी तय करने की प्रक्रिया नहीं रहने दिया। उन्होंनेयात्राओं को मनुष्य, समाज, संस्कृति और स्मृतियों से जोड़ दिया है।इसीलिए पुस्तक का प्रत्येक आलेख पाठक को किसी नए देश, नए नगरया नए दृश्य तक ही नहीं ले जाता, बल्कि उसे अपने भीतर भी झाँकने केलिए प्रेरित करता है। कहीं लोकजीवन की आत्मीयता है, कहीं इतिहासकी धड़कन, कहीं सभ्यताओं के पदचिह्न, तो कहीं भारतीयता का मौनसंगीत।इस पुस्तक की विशेषता यह भी है कि इसमें यात्रा के बहानेभारतीय सांस्कृतिक चेतना का विस्तार दिखाई देता है। लेखक जबविदेशों में भारतीय संस्कृति के चिह्न खोजते हैं तो पाठक के भीतर भीअपनी सभ्यता के प्रति एक आत्मीय गर्व का भाव जागृत होता है।अजरबैजान के मंदिरों में अंकित देवनागरी हो, रूस में वेदों की स्मृति हो, या शिकागो में स्वामी विवेकानंद के पदचिह्न। हर प्रसंग भारतीय संस्कृतिकी व्यापकता का अनुभव कराता है। पुस्तक में हास्य भी है, व्यंग्य भी, भावुकता भी और चिंतन भी। कहीं लेखक अपने अनुभवों पर मुस्कुरातेदिखाई देते हैं, तो कहीं किसी स्मृति के सामने ठहर जाते हैं। यही बहुरंगीस्वर इस कृति को जीवंत बनाते हैं। लेखक का विनोदबोध यात्रा के तनावको सहज बना देता है, जबकि उनकी संवेदनशीलता पाठक के मन कोभीतर तक छू जाती है। आज जब यात्रा-वृत्तांतों का बड़ा हिस्सा केवलपर्यटन और उपभोग तक सीमित होता जा रहा है, ऐसे समय में गूँजे देशराग जैसी पुस्तक यह विश्वास जगाती है कि यात्रा मनुष्य को भीतर सेसमृद्ध भी कर सकती है। यह कृति बताती है कि किसी देश को समझनेके लिए केवल उसकी इमारतें देखना पर्याप्त नहीं, उसकी संस्कृति, उसकी स्मृतियाँ, उसकी भाषा और उसके लोगों की आत्मा को महसूसकरना भी आवश्यक है। समग्रतः कहा जाए तो गूँजे देश राग यात्रा, संस्कृति और साहित्य का सुंदर संगम है। यह पुस्तक केवल स्थानों कापरिचय नहीं कराती, बल्कि भारत की आत्मा के उस संगीत को सुनने काअवसर देती है जो लोकधुनों, स्मृतियों, परंपराओं और मानवीयसंवेदनाओं में निरंतर गूँजता रहता है। संवेदनशील पाठकों, संस्कृति-अध्येताओं और यात्रा-साहित्य के प्रेमियों के लिए यह निस्संदेहएक संग्रहणीय, पठनीय और बार-बार लौटकर पढ़ी जाने वाली कृति है।

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