स्वदेशी का स्वाद: पारले-जी से मेलोडी तक

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दिल्ली। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वदेशी आंदोलन ने न केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया, बल्कि स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देकर आत्मनिर्भर भारत की नींव रखी। ठीक इसी भावना से 1929 में ब्रिटिश शासन के दौर में मोहनलाल दयाल चौहान ने मुंबई के विले पारले इलाके में एक छोटी सी फैक्ट्री स्थापित की। इसका उद्देश्य ब्रिटिश कंपनियों जैसे हंटली एंड पाल्मर्स और ब्रिटानिया के महंगे बिस्कुटों के मुकाबले सस्ता, गुणवत्तापूर्ण और भारतीय स्वाद वाला विकल्प उपलब्ध कराना था। शुरू में ऑरेंज कैंडीज से शुरुआत हुई, फिर 1939 में पारले ग्लूको बिस्कुट लॉन्च हुआ, जो बाद में पारले-जी बना।

यह आंदोलन की मिसाल था – विदेशी माल की जगह घरेलू उत्पाद। पारले ने आम भारतीयों को सस्ते दाम पर पौष्टिक बिस्कुट उपलब्ध कराया, जो पीढ़ियों से बच्चों की पहली पसंद बना रहा। आज यह दुनिया का सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्कुट ब्रांड है।

‘G’ का असली मतलब और ब्रांडिंग की मास्टरस्ट्रोक

शुरुआत में ‘पारले ग्लूको’ कहलाने वाला यह ब्रांड 1980 के दशक में पारले-जी बना। ‘G’ का मतलब ग्लूकोज था, जिसे मार्केटिंग में ‘जी फॉर जीनियस’ में बदल दिया गया। पैकेट पर छपी प्यारी बच्ची कोई रियल मॉडल नहीं, बल्कि 1960 के दशक में मगनलाल दाहिया द्वारा बनाई गई काल्पनिक इलस्ट्रेशन है।

कंपनी ने कीमत-वजन की अनोखी रणनीति अपनाई। 25-30 साल तक ₹5 पैकेट की कीमत नहीं बढ़ाई, बल्कि श्रिंकफ्लेशन (वजन कम करना) से मुनाफा बनाए रखा। 1996-2006 के बीच रॉ मटेरियल की कीमतें 150% बढ़ीं, फिर भी कीमत स्थिर रखी। 2013 में यह 5000 करोड़ की बिक्री करने वाला पहला FMCG प्रोडक्ट बना। हर सेकंड 4451 लोग इसे खाते हैं, हर महीने 1 बिलियन पैकेट उत्पादित होते हैं।

स्वदेशी से वैश्विक पहचान: मोदी-मेलोनी ‘मेलोडी’ पल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को पारले की आइकॉनिक ‘मेलोडी’ टॉफी गिफ्ट की। सोशल मीडिया पर ‘मेलोडी’ (Modi + Meloni) ट्रेंड वायरल हो गया। पारले प्रोडक्ट्स ने प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा करते हुए इसे स्वदेशी ब्रांड को वैश्विक मंच पर ले जाने का गर्वपूर्ण क्षण बताया। पारले प्रोडक्ट्स के वाइस प्रेसिडेंट मयंक शाह के अनुसार, भारतीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमोट करने का पीएम मोदी का यह तरीका नायाब है। इससे घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बिक्री को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।

मोदी जी ने पारले-जी/मेलोडी का उत्पाद ही क्यों मेलोनी को दिया?

यह महज संयोग या मीठा उपहार नहीं था। यह सांकेतिक था – स्वदेशी उद्यमिता, ‘मेक इन इंडिया’ और भारतीय ब्रांडों की वैश्विक क्षमता का प्रदर्शन। पारले एक सदी पुराना स्वदेशी ब्रांड है, जो आज भी चौहान परिवार के पास है। तीन कंपनियों में बंटा (पारले प्रोडक्ट्स, पारले एग्रो, पारले बिसलेरी) पूरी तरह भारतीय स्वामित्व वाला है। मोदी जी की विदेश नीति में आर्थिक कूटनीति महत्वपूर्ण है, जहां भारतीय उत्पादों को प्रमोट किया जाता है। मेलोडी जैसी पॉपुलर टॉफी गिफ्ट करके उन्होंने न केवल व्यक्तिगत दोस्ती दिखाई, बल्कि भारत की सॉफ्ट पावर और एफएमसीजी क्षमता को हाइलाइट किया। यह ‘वोकल फॉर लोकल’ का प्रैक्टिकल उदाहरण है – जब प्रधानमंत्री खुद स्वदेशी ब्रांड को विश्व नेताओं तक ले जाते हैं।

एफएमसीजी का बढ़ता बाजार और भारत की संभावनाएं

भारत का कन्फेक्शनरी मार्केट करीब 5 बिलियन USD (लगभग 38-40 हजार करोड़ रुपये) का है, जिसमें बेकर्स कन्फेक्शनरी जोड़कर 6 बिलियन तक पहुंच जाता है। CAGR 5-7.5% है। शहरीकरण, बढ़ती आय, क्विक-कॉमर्स (ब्लिंकिट (Blinkit) और जेप्टो (Zepto) और ‘ऑन-द-गो’ स्नैकिंग ने पैक्ड प्रोडक्ट्स की मांग बढ़ाई है। प्रीमियमाइजेशन ट्रेंड (डार्क चॉकलेट, शुगर-फ्री) भी चल रहा है।

अमेरिका, चीन, जर्मनी के बाद वैश्विक स्तर पर भारत टॉप 10 कन्फेक्शनरी बाजारों में है। पारले-जी चीन की सभी बिस्कुट कंपनियों से ज्यादा उत्पादन करता है। कंपनी के पास 130+ फैक्टरियां, 50 लाख+ रिटेल स्टोर्स और 21+ देशों में एक्सपोर्ट हैं। लॉकडाउन में यह गरीबों का सहारा बना, देश भर के एनजीओ के जरिए खूब वितरित हुआ।

तर्कसंगत विश्लेषण: स्वदेशी मॉडल की सफलता

पारले की सफलता का राज बड़ा स्केल, कम मार्जिन और व्यापक वितरण है। एमएनसी’ज से मुकाबला करते हुए यह 40%+ भारतीय बिस्कुट मार्केट शेयर रखता है। कैंटर की सिंडिकेटेड रिसर्च रिपोर्ट्स में लगातार 13 वर्षों से भारत का सबसे पसंदीदा एफएमसीजी ब्रांड है ।

स्वदेशी आंदोलन से संबंध: पारले ब्रिटिश बिस्कुटों की जगह सस्ता विकल्प लाया। आजादी के बाद गेहूं संकट में जौ से बिस्कुट बनाकर राष्ट्र सेवा की। स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करते हुए कंज्यूमर अपील की। यह मॉडल आज ‘आत्मनिर्भर भारत’ से जुड़ता है – जहां लोकल ब्रांड ग्लोबल बनते हैं।

मोदी जी का मेलोनी को मेलोडी गिफ्ट इसी फिलॉसफी का विस्तार है। विदेश नीति में सांस्कृतिक और आर्थिक कूटनीति का मिश्रण। इससे न केवल ब्रांड प्रमोट होता है, बल्कि निवेश और ट्रेड डील्स को बढ़ावा मिलता है।

चुनौतियां और भविष्य

पारले को प्रीमियम सेगमेंट में एक्सपैंड करना होगा। युवा उपभोक्ताओं के लिए हेल्दी वेरिएंट्स (लो-शुगर, फोर्टिफाइड) लाने होंगे। ग्लोबल कॉम्पिटिशन और सप्लाई चेन इश्यूज चुनौतियां हैं, लेकिन स्केल और ब्रांड लॉयल्टी मजबूत आधार हैं।

एक अनुमान के अनुसार पारले-जी की एक महीने की प्रोडक्शन से धरती से चांद तक (72.5 लाख किमी) पुल बन सकता है – यह परियों की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय उद्यमिता की सच्चाई है।

पारले की कहानी स्वदेशी से शुरू होकर वैश्विक मंच तक पहुंची है। मोदी जी द्वारा मेलोनी को मेलोडी उपहार देना महज मीठा पल नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। एफएमसीजी सेक्टर में भारत की संभावनाएं अनंत हैं – बढ़ती आबादी, युवा डेमोग्राफी और डिजिटल पहुंच के साथ।

जब तक आम भारतीय का पहला नाश्ता या स्नैक पारले-जी रहेगा, स्वदेशी का स्वाद जीवित रहेगा। यह सिर्फ बिस्कुट या टॉफी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की मिसाल है।

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आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों से मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान स्टेप से जुड़े हुए हैं

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