समस्या का संभावित समाधान : निष्ठावान सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं को सम्मान और स्थान देने की व्यावहारिक रूपरेखा

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दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी की सरकारों के समक्ष यह स्पष्ट चुनौती है कि वैचारिक रूप से जुड़े कलाकार, साहित्यकार और कवि लंबे समय से उपेक्षा महसूस कर रहे हैं। जब नए जुड़ाव के नाम पर उन लोगों को मंच और सम्मान दिया जाता है जो वर्षों तक आलोचना करते रहे, तब संगठन के आधारभूत कार्यकर्ता चुप हो जाते हैं। बाबा सत्यनारायण मौर्या जैसे लोगों का सवाल जायज है कि राष्ट्रवादी कवि या स्थानीय कलाकार को उचित भुगतान के साथ सरकारी आयोजन में कितनी बार बुलाया गया। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में आगामी चुनावों के संदर्भ में यह मुद्दा और गंभीर हो जाता है। समाधान आत्मघाती रणनीति को रोकने और संगठन की विश्वसनीयता बनाए रखने में निहित है।

सबसे पहले सरकारों को सांस्कृतिक आयोजनों के लिए एक पारदर्शी और संस्थागत चयन प्रक्रिया अपनानी चाहिए। राज्य स्तर पर एक स्थायी सांस्कृतिक सलाहकार समिति गठित की जाए जिसमें वैचारिक रूप से जुड़े प्रसिद्ध कवि, लेखक, रंगकर्मी और स्थानीय कलाकार शामिल हों। इस समिति की सिफारिश के बिना बड़े आयोजनों में किसी बाहरी व्यक्ति को मुख्य स्थान न दिया जाए। समिति हर तीन महीने में बैठक करे और उपलब्ध प्रतिभाओं की सूची अद्यतन करे। इससे अधिकारियों की मनमानी और कमीशन की संस्कृति पर अंकुश लगेगा। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार इस मॉडल को तुरंत लागू कर सकती है क्योंकि राज्य में सांस्कृतिक विभाग पहले से सक्रिय है।

दूसरा कदम उचित और पारदर्शी पारिश्रमिक नीति का है। सरकार एक सार्वजनिक दर सूची जारी करे जिसमें कार्यक्रम की प्रकृति, स्थान और कलाकार के अनुभव के आधार पर न्यूनतम और अधिकतम मानदेय तय हो। छोटे स्थानीय कलाकारों के लिए न्यूनतम 15-20 हजार रुपये और स्थापित राष्ट्रवादी कवियों/लेखकों के लिए 50 हजार से एक लाख रुपये तक का मानक रखा जाए। भुगतान सीधे बैंक खाते में किया जाए और आयोजन के 15 दिन के भीतर हो। इस सूची को संस्कृति विभाग की वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाए। इससे बड़े नामों को करोड़ों देने और छोटे कलाकारों को हजारों में रखने की विसंगति समाप्त होगी। बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में भी यही मानक लागू किया जा सकता है ताकि एकरूपता बनी रहे।

तीसरा उपाय निष्ठावानों को प्राथमिकता देने का है। हर बड़े सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रम में कम से कम 60-70 प्रतिशत स्थान उन कलाकारों और साहित्यकारों के लिए आरक्षित रखे जाएं जो राष्ट्रीय विचारों को लगातार आगे बढ़ाते रहे हैं। नए लोगों को जोड़ने के लिए शेष स्थान रखा जाए, लेकिन उन्हें मुख्य वक्ता या मुख्य आकर्षण न बनाया जाए। प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल या महमूद फारूकी जैसे व्यक्तियों को संवाद या विशिष्ट सत्रों में बुलाया जा सकता है, लेकिन मंच की गरिमा बनाए रखने के लिए वैचारिक संगतता को महत्व दिया जाए। हिमांशु वाजपेयी या हर्ष गुजराल जैसी हस्तियों के साथ फोटो-ऑप तभी हों जब उनका योगदान स्पष्ट रूप से राष्ट्रवादी धारा से जुड़ा हो। अन्यथा ऐसी तस्वीरें संगठन के कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा करती हैं।

चौथा कदम नियमित संवाद और सम्मान का है। मुख्यमंत्री या संस्कृति मंत्री हर छह महीने में एक बार राज्य के प्रमुख राष्ट्रवादी सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं से सीधी बैठक करें। इसमें उनकी सुझावों को लिखित रूप में दर्ज किया जाए और अगली बैठक में अनुपालन की रिपोर्ट दी जाए। जिला स्तर पर भी सांस्कृतिक समितियां बनाई जाएं जो स्थानीय कवियों और कलाकारों को छोटे आयोजनों में शामिल करें। इस तरह से “धृतराष्ट्र” वाली स्थिति नहीं बनेगी। बाबा सत्यनारायण मौर्या जैसे लोगों को इस प्रक्रिया में शामिल करने से उनकी आवाज भी संस्थागत हो जाएगी।

पांचवां समाधान डिजिटल प्लेटफॉर्म और क्षमता निर्माण का है। संस्कृति विभाग एक सरल ऑनलाइन पोर्टल बनाए जहां कलाकार अपनी प्रोफाइल और पिछले कार्यों का विवरण दर्ज कर सकें। आयोजनों के लिए आवेदन इसी पोर्टल से हों और चयन समिति द्वारा पारदर्शी तरीके से किया जाए। युवा प्रतिभाओं के लिए वर्ष में दो बार कार्यशालाएं आयोजित की जाएं जहां लेखन, वादन और मंच कला का प्रशिक्षण दिया जाए। इससे नए लोग भी जुड़ेंगे, लेकिन वे वैचारिक आधार पर जुड़ेंगे।

अंत में, निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। हर बड़े आयोजन के बाद व्यय और चयन प्रक्रिया की संक्षिप्त रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। यदि कमीशन या पक्षपात की शिकायत आए तो स्वतंत्र जांच हो। यह कदम प्रशासनिक है, अतिरिक्त बजट की जरूरत नहीं।

ये कदम लागू करने में आसान हैं क्योंकि इनमें नई संस्थाएं बनाने या बड़े खर्च की जरूरत नहीं। मौजूदा संस्कृति विभाग, जिला प्रशासन और सलाहकार समितियों के माध्यम से इन्हें शुरू किया जा सकता है। जब निष्ठावानों को सम्मान और उचित स्थान मिलेगा, तब चुप्पी टूटेगी और संगठन की फौज फिर से सक्रिय होगी। नए जुड़ाव की रणनीति तभी सफल होगी जब पुराने साथी पीछे न छूटें। सावधानी अभी जरूरी है, क्योंकि चुनाव नजदीक हैं और दीर्घकालिक विश्वसनीयता दांव पर है।

— आशीष अंशु

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आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों से मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान स्टेप से जुड़े हुए हैं

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