दालचीनी या मेथी
दालचीनी मैं क्यूं इतराऊं,
बात मसाले जाने हैं
छोड़ूं स्वाद निराला अपना
हर व्यंजन ये माने है।
खट्टा मीठा या तीखा हो,
सब में घुलमिल जाती हूं
खीर में जो डल जाऊं तो
फिर दुगुना स्वाद बढ़ाती हूं।
चाय में घुलकर एक अपनी,
अद्भुत खुशबू फैलाती हूं।
काढ़े में मिल जाऊँ तो
रोगों को दूर भागती हूं।
सुनकर लंबी लिस्ट सखी की,
मेथी चुप न रह पाई
लेकर लंबी लिस्ट सामने
वो भी जल्दी ही आई।
कढ़ी बड़ी मुझ बिन ना बनती
सबको खूब सुहाती हूं,
पिज़्ज़ा पर डल जाऊं तो फिर
दुगुना स्वाद बढ़ाती हूँ।
लड्डू में पिसकर मिलजाती,
घुटनों का दर्द भगाती हूँ
बालों की सुंदरता में मैं
चार चांद लगाती हूं।
श्रेष्ठ मैं ही तुम नहीं सखी
यह सच्ची बात बताती हूं
मानो तुम या ना मानों,
मैं खुद पर गर्व जताती हूँ।
दालचीनी सुन बात निराली
मेथी पर गुर्राती है,
मैं मीठी तुम कड़वी,
क्यूं बात समझ ना आती है?
मैं ही श्रेष्ठ मसालों में,
संग चीनी मेरे आती है
तुम जब भी मुंह में आती
कड़वाहट अपने संग लाती।
तुम जब भी मुंह में आती
कड़वाहट अपने संग लाती।
संध्या शर्मा मिश्रा
पिता
मां की बात तो सब करते हैं,
चलो, आज पिता पर कुछ लिखते हैं,
प और पिता का गहरा नाता है,
प सोचते ही अंतर्मन में,
पिता ही तो आता है,
पिता से ही परिवार चलता है,
और पिता से ही तो नाम मिलता है
परिवार का आधार है पिता
सबका पालनहार है पिता
ईश्वर का सबसे खूबसूरत
उपहार है पिता,
घर की बगिया का माली है पिता,
हर त्यौहार की खुशहाली है पिता,
बच्चों का पहला गुरु है पिता,
परिवार का गुरूर है पिता
परीक्षा कोई भी हो, विषय कोई भी हो
सभी का मास्टर है पिता,
बच्चों की कच्ची उम्र का
प्लास्टर है पिता
हर समस्या का समाधान है पिता
हर दुख का निदान है पिता
हर घर की शान है पिता
सारे तीरथ और चारों धाम है पिता
हर ग़म को पीता है पिता
तब भी सबके बीच खुशी से
जीता है पिता
तब भी सबके बीच खुशी से
जीता है पिता…
संध्या शर्मा मिश्रा
ग्रेटर नोएडा।



