जयपुर । कुछ हद तक केरलम यह इस प्रश्न का उत्तर निश्चित रूप से दिया जा सकता है। विरोधी जब शब्दशः जान के पीछे पड़े हों, तब जिस मजबूती के साथ संघ वहाँ खड़ा रहा, वह अपने आप में उल्लेखनीय है। केवल खड़ा ही नहीं रहा, बल्कि सर्वांगीण विस्तार करते हुए संघ ने सभी क्षेत्रों में अपना प्रभाव स्थापित किया। फिर चाहे वह समाज निर्माण हो, सेवा कार्य हो या कार्यकर्ता निर्माण—इन सभी दृष्टियों से आज केरल जैसे छोटे से राज्य ने संघकार्य की दृष्टि से अद्भुत आदर्श प्रस्तुत किया है।
विचारधारा की दृष्टि से 60-70 प्रतिशत से अधिक विरोधी शक्तियों वाले केरल में पिछले 84 वर्षों में जिस दृढ़ता और अत्यंत प्रभावी ढंग से संघ का कार्य खड़ा हुआ, उसका श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को देना हो तो उनका नाम है—भास्करराव कळंबी…! हालांकि संघकार्य में किसी एक व्यक्ति को श्रेय देने की परंपरा नहीं है, फिर भी…!
दादर जैसे विशुद्ध मराठी क्षेत्र से प्रचारक निकलकर 38 वर्षों से भी अधिक समय तक केरलम में प्रचारक के रूप में अपने शरीर का कण-कण और जीवन का क्षण-क्षण खपाने वाले भास्करराव कळंबी ने केवल संघ को ही नहीं, बल्कि केरलम के निद्रिस्त और हताश हिंदू समाज को भी जागृत और संगठित किया। आगे चलकर वे के. भास्करन के नाम से पहचाने जाने लगे और अपने जीवन की अंतिम सांस भी उन्होंने इसी केरल की धरती पर ली।
केरल में संघ को कम्युनिस्ट, इस्लाम और ईसाई—इन कट्टर विरोधी शक्तियों के साथ अत्यंत भीषण संघर्ष करना पड़ा। आज भी यह संघर्ष जारी है। लेकिन एक-एक व्यक्ति को जोड़ते हुए, उसके भीतर हिंदुत्व की ज्योति प्रज्वलित करते हुए जिस प्रभावी ढंग से भास्करराव ने केरलम में हिंदू समाज को संगठित किया, वह एक प्रेरणादायी इतिहास है।
कम्युनिस्टों के साथ तो संघ को रक्तरंजित संघर्ष का सामना करना पड़ा। इस संघर्ष में अब तक 78 से अधिक स्वयंसेवकों को अपने प्राणों का बलिदान देना पड़ा है, जबकि कई लोगों के हिस्से में जीवनभर का अपंगत्व आया है। लेकिन इतना संघर्ष होने के बावजूद और कई कार्यकर्ताओं के जेल में रहकर सजा भुगतने के बावजूद किसी भी स्वयंसेवक की संघ के प्रति भक्ति और प्रतिबद्धता में किंचित भी कमी नहीं आई। ऐसे कर्मठ, निःस्वार्थी और समर्पित कार्यकर्ता भास्करराव ने अपने कार्यकाल में तैयार किए।
कम्युनिस्टों के साथ हुए रक्तरंजित संघर्ष में अपना प्रचारक पुत्र खोने वाले एक पिता थे—भरतन। भास्करराव की प्रेरणा से संघ के लिए अत्यंत समय देने वाले और व्यापक जनसंपर्क रखने वाले इस कार्यकर्ता की कार्यकर्ता के रूप में समझ उच्च कोटि की थी।
भरतन जी के पुत्र दुर्गादास कॉलेज की शिक्षा पूरी करने के बाद संघ के प्रचारक के रूप में बाहर निकले। कॉलेज में उन्होंने संघ का इतना प्रभावी कार्य खड़ा किया कि स्वाभाविक रूप से दहशत के बल पर वहाँ सक्रिय एस.एफ.आई. के गुंडों को उनका यह कार्य खटकना ही था। उसका रास्ता रोकने के उद्देश्य से एस.एफ.आई. के बाहर से आए गुंडों ने कॉलेज परिसर में उन पर प्राणघातक हमला किया। तलवारों और कोयतों से उन पर लगातार वार करते हुए वे उन्हें रक्त के तालाब में छोड़कर चले गए। दुर्भाग्य से इस घटना में दुर्गादास की मृत्यु हो गई।
उस समय स्वास्थ्य खराब होने के कारण विश्राम कर रहे भास्करराव के कानों तक जब यह समाचार पहुँचा तो वे इस घटना से अत्यंत व्यथित हुए। क्योंकि केवल दो दिन पहले ही यह युवा प्रचारक उनसे मिलकर गया था। उस समय अत्यधिक अशक्तता के कारण भास्करराव को बहुत अधिक ग्लानि हो रही थी, फिर भी उन्होंने उससे पूछा था—“तू भरतन का ही बेटा है न…?”
ऐसे युवा प्रचारक की हत्या से भास्करराव भीतर से पूरी तरह टूट गए थे। इसलिए डॉक्टरों की अनुमति न होने के बावजूद दुर्गादास को श्रद्धांजलि देने के लिए जाने का भास्करराव ने आग्रह किया और उसी के अनुसार अत्यंत खराब स्वास्थ्य के बावजूद वे उसके घर गए।
लेकिन कर्मठ स्वयंसेवक भरतन ने विचार किया कि मेरा पुत्र तो संघ का प्रचारक था। इसलिए उस पर अधिकार केवल संघ का है और संघ में उसके पालक कौन हैं? तो वे हैं—भास्करन जी! एक अर्थ में संघ ने, अर्थात भास्करन जी ने, अपना पुत्र खोया है। फिर उनको सांत्वना कौन देगा…?
इसलिए एक-दो दिन के भीतर ही अपने पुत्र को खोने का दुःख एक ओर रखकर भरतन जी भास्करराव को सांत्वना देने के लिए कार्यालय पहुँच गए।
कल्पना कीजिए, अथवा इस प्रसंग को अपनी आँखों के सामने घटित होते हुए देखिए…
कितना अद्भुत और हृदय को झकझोर देने वाला वह प्रसंग रहा होगा…?
एक स्वयंसेवक पिता ने राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित अपना युवा पुत्र खोया है और वही जन्मदाता पिता अपने पुत्र के पालक—अर्थात प्रांत प्रचारक—का सांत्वना देने के लिए कार्यालय में आ रहा है।
उस समय उस पिता के मन में कैसी भावनाएँ रही होंगी…?
निश्चित रूप से उसके पीछे एक ही विचार था—
जिस दिन मेरा पुत्र प्रचारक बनकर घर से बाहर निकला, उसी दिन से उस पर मेरा अधिकार समाप्त हो गया। अब उस पर अधिकार केवल संघ का है और संघ में सर्वोच्च दायित्व संभालने वाले प्रांत प्रचारक का है…!
वास्तव में केरल का यह केवल एक प्रतिनिधिक उदाहरण है। ऐसे असंख्य कर्मठ, निष्ठावान कार्यकर्ताओं और परिवारों को भास्करराव ने जोड़ा। इसी शक्ति के आधार पर केरल जैसे छोटे से राज्य का हिंदू समाज सभी राष्ट्रविरोधी और असामाजिक गतिविधियों से संघर्ष करते हुए तनी हुई गर्दन के साथ खड़ा है।
इसका पूरा श्रेय निश्चित रूप से संघ को है और उसमें भी 38 वर्षों तक प्रचारक के रूप में कार्य करने वाले भास्करन जी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
साभार – फेसबुक से



