पत्रकारिता ट्रेनिंग की सबसे बेसिक बातें बतानी पड़ रहीं हैं कथित पत्रकारों को

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दिल्ली। दिल्ली पुलिस की गाइडलाइन कोई नया सेंसरशिप कानून नहीं है। वह यह नहीं कहती कि कंटेंट क्रिएटर कैमरा नहीं उठा सकता, वीडियो नहीं बना सकता या अपनी राय नहीं रख सकता। वह सिर्फ इतना कहती है कि भीड़, तनाव और पुलिस कार्रवाई के बीच जो व्यक्ति पत्रकार के रूप में पहचान, दूरी और पहुंच मांगे, उसे संगठन या पीआईबी/डीआईपी का वैध पहचान पत्र दिखाना होगा, उसे प्रदर्शनकारियों से अलग खड़ा होना होगा और पुलिस के काम में शारीरिक बाधा नहीं डालनी होगी। यह अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक नहीं, ऑपरेशनल सावधानी है।

सवाल यही है कि कंटेंट क्रिएटर पत्रकार का चोला क्यों ओढ़े। ऑरेंज इकोनॉमी और एक करोड़ युवाओं को क्रिएटर इकोसिस्टम से जोड़ने की बात कवरेज की आजादी से अलग है। सरकार क्रिएटर्स को आर्थिक अवसर दे रही है, उन्हें कानून से ऊपर का दर्जा नहीं। कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर फोन से रिकॉर्डिंग कर सकता है। लेकिन जब कोई समूह खुद को ‘मीडिया’ बताकर कांस्टेबल को वरिष्ठ अधिकारी समझकर घेर ले, सवालों की बौछार करे और टकराव का क्लिप बनाए, तो वह रिपोर्टिंग नहीं, मंचन है। ऐसे में पुलिस को यह तय करना पड़ता है कि कौन कवर कर रहा है और कौन भीड़ का हिस्सा बनकर ऑपरेशन रोक रहा है।

अभिव्यक्ति की आजादी पत्रकारों का एकाधिकार नहीं है। फर्क पहचान और उद्देश्य का है। पत्रकार संस्थागत जवाबदेही, संपादकीय प्रक्रिया और पहचान पत्र के साथ आता है। कंटेंट क्रिएटर अपने दर्शक और एल्गोरिदम के प्रति जवाबदेह होता है। दोनों काम कर सकते हैं, पर दोनों एक नहीं हैं। जब एक्टिविस्ट समूह के मीडिया हैंडल वाले लोग-जैसे रोज़ी, जो रिपोर्टर नहीं बल्कि अभिजीत दिपके के आंतरिक समूह से जुड़ी हैं और गजेंद्र सिंह के साथ मीडिया संभालती हैं-खुद को स्वतंत्र पत्रकार बताकर मैदान में आते हैं, तो पुलिस के लिए सीमा खींचना मजबूरी हो जाती है। कवरेज का नाम लेकर संघर्ष पैदा करना और फिर उसी संघर्ष को कंटेंट बनाना, वह काम नहीं है जिसके लिए पहचान की छूट मांगी जा रही है।

मेनस्ट्रीम ब्लैकआउट का आरोप अलग बहस है। कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी पुलिस की है। अगर हर मोबाइल वाला व्यक्ति पत्रकार की प्रतिरक्षा और पहुंच मांगे, तो भीड़ और मीडिया में फर्क मिट जाएगा। जो क्रिएटर ईमानदारी से कवर करना चाहता है, वह अपनी पहचान साफ कहे, दूरी रखे और बाधा न डाले। पत्रकार का वेश पहनकर अराजकता फैलाना न ऑरेंज इकोनॉमी है, न पत्रकारिता। पुलिस की सावधानी इसी फर्क को बचाने के लिए है।

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आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु

आशीष कुमार अंशु एक पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों से मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान स्टेप से जुड़े हुए हैं

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