जयपुर : मुझे यह तो नहीं पता ये किसने लिखा है किसी निष्ठावान समर्पित कार्यकर्ता ने मुझे भेजा तो आत्ममंथन के लिए सबके ध्यान में लाने से स्वयं को नहीं रोक सका……..
आज सौ वर्ष के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की और बारह वर्ष लगातार केंद्रीय सत्ता में रहते हुए देश पर राज करने वाली भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती अपनी प्राथमिकताओं का बदलता हुआ मनोविज्ञान है।
ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें उन लोगों की स्वीकार्यता अधिक महत्वपूर्ण लगने लगी है जो या तो वैचारिक रूप से उनका विरोध करते हैं या उनके अस्तित्व से ही असहज रहते हैं।
दूसरी ओर, जो लोग वर्षों से उनके साथ खड़े रहे, संघर्ष किया, समर्थन दिया और कठिन समय में भी विश्वास बनाए रखा, वे कई बार स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हैं।
खैर यह केवल एक राजनीतिक समस्या नहीं, बल्कि मनुष्य के स्वभाव की भी एक पुरानी प्रवृत्ति है।
घर में माता-पिता अक्सर उस संतान पर अधिक ध्यान देने लगते हैं जो उनसे दूर हो गई हो, जबकि जो संतान हर परिस्थिति में साथ रहती है, उसे सहज मान लिया जाता है।
किसी व्यापारी को भी कई बार नए ग्राहक को आकर्षित करने की चिंता अधिक रहती है, जबकि पुराने और वफ़ादार ग्राहक की अपेक्षाओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। परिणाम यह होता है कि नया ग्राहक भी पूरी तरह नहीं जुड़ता और पुराना भी धीरे-धीरे निराश होने लगता है।
समाज हो, संगठन हो या सियासत हो, यह मनोविज्ञान ही प्रभावी है।
यदि कोई दल अपने मूल समर्थकों को यह संदेश देने लगे कि उनका समर्थन तो “पक्का” है, इसलिए उनकी भावनाओं, अपेक्षाओं या असंतोष की चिंता कम की जा सकती है, तो यह दीर्घकाल में जोखिमपूर्ण रणनीति बन सकती है। क्योंकि किसी भी संगठन की सबसे बड़ी पूंजी उसका समर्पित कार्यकर्ता और उसका स्थायी समर्थक होता है, न कि केवल वह वर्ग जो परिस्थितियों के अनुसार कभी समर्थन दे और कभी विरोध।
भारतीय दर्शन में मृगतृष्णा का उदाहरण यूँ ही नहीं दिया गया है। हिरण दूर चमकती रेत को पानी समझकर दौड़ता रहता है, लेकिन जितना दौड़ता है, पानी उतना ही दूर दिखाई देता है। अंततः वह थक जाता है, जबकि वास्तविक जल किसी और दिशा में होता है।
राजनीति में भी यदि किसी संगठन का ध्यान केवल उन लोगों की स्वीकृति पाने पर केंद्रित हो जाए जो शायद कभी उसके साथ आने वाले ही नहीं हैं, तो वह अपने सबसे बड़े आधार को कमजोर करने का जोखिम उठा सकता है।
विस्तार करना अच्छी बात है, नए लोगों को जोड़ना भी आवश्यक है। लेकिन विस्तार की कीमत अपने मूल आधार की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। पेड़ की नई शाखाएँ तभी तक हरी रहती हैं, जब तक उसकी जड़ों को पर्याप्त जल मिलता रहे। यदि जड़ों को ही यह महसूस होने लगे कि अब उनकी आवश्यकता नहीं रही, तो सबसे पहले वही शक्ति क्षीण होती है जिसने उस वृक्ष को खड़ा किया था।
हर संगठन को समय-समय पर यह प्रश्न स्वयं से पूछना चाहिए—क्या हम उन लोगों को पाने की दौड़ में हैं जो शायद कभी हमारे नहीं होंगे, या उन लोगों का विश्वास भी उतनी ही गंभीरता से संभाल रहे हैं जिनकी निष्ठा ने हमें यहाँ तक पहुँचाया है?
यही प्रश्न किसी भी दीर्घकालीन संगठन की सफलता या संकट का आधार बनता है।



