थोड़ा समय निकाल कर इसे अवश्य पढ़िए

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गिरीश जी जोशी

नागपुर।  विचारणीय है।
आखिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह श्री अतुल लिमये ने युवाओं से CJP आंदोलन का अध्ययन करने का आग्रह क्यों किया?

आखिर इस आंदोलन में ऐसा क्या है जिसे आज के युवाओं के लिए समझना आवश्यक बताया गया?
इसका उत्तर श्री अतुल लिमये के भाषण में मिलता है। उनके मूल मराठी भाषण का सरल हिंदी सार इस प्रकार है-
आज जब CJP से जुड़ा आंदोलन सामने आया, तब यह और स्पष्ट हो गया कि युवाओं के बीच राष्ट्रीय दृष्टि से काम करने वाले संगठनों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि इस आंदोलन को केवल एक घटना मानकर नहीं देखना चाहिए। यह कई वर्षों से चल रही एक प्रक्रिया का परिणाम है। इसलिए इसका Case Study करना जरूरी है। इसके लिए हमें इसकी Chronology (घटनाक्रम), Methodology (कार्यपद्धति), Support System (समर्थन तंत्र), Network, Innovations (नए प्रयोग) और इसके पीछे की Ideology (विचारधारा) को समझना होगा।
आंदोलन कैसे आगे बढ़ा?
श्री लिमये के अनुसार, अभिजीत दिपके ने सबसे पहले ऑनलाइन माध्यम से CJP की शुरुआत की। शुरुआती दो-तीन दिनों में उसे अच्छा समर्थन मिला। इसके बाद वे 6 जून को भारत आए और 7 जून से आंदोलन शुरू किया। शुरुआत में अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिला।
फिर 7 जून से 19 जून तक वे देश के कई शहरों में गए, लेकिन वहाँ भी विशेष सफलता नहीं मिली। इसके बाद 20 जून से दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना शुरू हुआ और यहीं से आंदोलन का स्वरूप बदलने लगा।
यह बदलाव कैसे आया?
उनका कहना है कि इस प्रश्न का उत्तर आंदोलन से जुड़ी संस्थाओं और संगठनों की सूची देखने से मिलेगा। इससे यह समझा जा सकता है कि इसके पीछे किस प्रकार का Support Network काम कर रहा था।
चूँकि यह मुख्य रूप से युवाओं और विद्यार्थियों का आंदोलन था, इसलिए अनेक छात्र संगठन इससे जुड़े। इनमें AISA, SFI सहित कई अन्य छात्र संगठन सक्रिय रहे।
इसके अलावा मानवाधिकार, आदिवासी, महिला, मुस्लिम, ईसाई, किसान, मजदूर, पर्यावरण, पत्रकारिता और विधिक सहायता से जुड़े अनेक संगठनों ने भी इसमें भाग लिया या समर्थन दिया।
उनका प्रश्न था कि इतने विविध संगठनों को एक मंच पर लाने का काम किसने किया? यदि आंदोलन की कार्यप्रणाली को समझना है तो इस नेटवर्क का अध्ययन आवश्यक है।
आंदोलन की दिशा कैसे बदली?
श्री लिमये के अनुसार, यदि आंदोलन के मंच से दिए गए भाषणों, नारों और उसमें शामिल लोगों का अध्ययन किया जाए तो कई प्रश्न सामने आते हैं-
* कुछ मंचों पर हिंदू-विरोधी स्वर क्यों सुनाई दिए?
* विवादास्पद नारे लगाने या उनका समर्थन करने वाले लोग वहाँ क्यों उपस्थित थे?
* वामपंथी विचारधारा का प्रभाव कैसे बढ़ा?
* विभिन्न राजनीतिक दल इसमें कैसे जुड़े?
* एक छात्र आंदोलन धीरे-धीरे राजनीतिक आंदोलन में कैसे बदल गया?
* पूरे देश में एक जैसी गतिविधियों का समन्वय किस प्रकार हुआ?
* इसका विस्तार विदेशों तक कैसे पहुँचा?
इन सभी प्रश्नों का अध्ययन आवश्यक है।
वैकल्पिक राजनीति (Alternative Politics) की अवधारणा
उन्होंने योगेंद्र यादव के एक कथन का उल्लेख किया—
“भविष्य का लोकतंत्र केवल संसद नहीं, बल्कि सड़कें तय करेंगी। केवल चुनाव नहीं, बल्कि प्रतिरोध (Resistance) तय करेगा।”
श्री लिमये के अनुसार, इस कथन के पीछे की वैचारिक सोच को समझना आवश्यक है।
उनका कहना था कि किसी आंदोलन की शुरुआत किसी वास्तविक समस्या से हो सकती है, लेकिन बाद में उसका नेतृत्व और नियंत्रण किन शक्तियों के हाथ में जाता है, इसका विश्लेषण भी जरूरी है।
वामपंथी सोच और आंदोलन
उनके अनुसार, वामपंथी विचारधारा ऐसे आंदोलनों को Alternative Politics का सफल मॉडल मानती है।
इस सोच में यह माना जाता है कि लोकतंत्र द्वारा दिए गए अधिकारों-जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धरना, प्रदर्शन और आंदोलन-का उपयोग करके लोकतांत्रिक व्यवस्था को भीतर से चुनौती दी जा सकती है। इसे उन्होंने “Subversion of Democracy through Democratic Means” की अवधारणा से जोड़ा।
ग्राम्शी का सिद्धांत
उन्होंने इतालवी विचारक Antonio Gramsci की Cultural Hegemony (सांस्कृतिक वर्चस्व) की अवधारणा का उल्लेख किया।
उनके अनुसार, इस विचार में केवल आर्थिक संघर्ष पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि समाज की सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और मूल्यों को भी चुनौती दी जाती है।
इसी संदर्भ में Deconstruction जैसी अवधारणाओं का भी उल्लेख किया गया, जिनके माध्यम से स्थापित परंपराओं, प्रतीकों और मान्यताओं पर प्रश्न उठाए जाते हैं।
आंदोलन की रणनीति
श्री लिमये के अनुसार, इस प्रकार की रणनीति में सामान्यतः कुछ चरण होते हैं-
* विभिन्न संस्थाओं में वैचारिक प्रवेश (Infiltration)
* संस्थाओं की विश्वसनीयता को कमजोर करना
* Narrative War (विचारों की लड़ाई) चलाना
* शिक्षा, साहित्य, मीडिया, सिनेमा और विश्वविद्यालयों के माध्यम से वैकल्पिक सोच तैयार करना
* अंततः बड़े जन-आंदोलनों के माध्यम से दबाव बनाना
सामाजिक प्रभाव
उन्होंने कहा कि ऐसी विचारधाराओं का प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवहार पर भी पड़ता है।
उनके अनुसार, भारतीय संस्कृति स्त्री को मातृभाव से देखने की शिक्षा देती है, जबकि कुछ आंदोलनों में इसके विपरीत भाषा और व्यवहार देखने को मिला।
डॉ. आंबेडकर का संदर्भ
उन्होंने संविधान सभा में 25 नवंबर 1949 को डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा दिए गए अंतिम भाषण का भी उल्लेख किया।
डॉ. आंबेडकर ने स्वतंत्र भारत में संवैधानिक मार्ग अपनाने पर बल दिया था और असंवैधानिक या हिंसक आंदोलनों से सावधान रहने की बात कही थी। उन्होंने इसे “Grammar of Anarchy” अर्थात अराजकता का व्याकरण कहा था।
युवाओं के लिए संदेश
अंत में श्री लिमये ने कहा कि यदि भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है तो युवाओं की ऊर्जा सही दिशा में लगनी चाहिए।
युवाओं में राष्ट्रभक्ति, सेवा, सामाजिक उत्तरदायित्व और सकारात्मक नेतृत्व के संस्कार विकसित करना आवश्यक है।
ऐसे आंदोलनों को केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय, सामाजिक और संवैधानिक दृष्टि से भी समझने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि इसका उत्तर केवल आलोचना नहीं है, बल्कि युवाओं के बीच सकारात्मक संवाद, राष्ट्रभावना, सेवा और समाज-निर्माण के कार्यों का व्यापक विस्तार करना ही सबसे प्रभावी मार्ग है।

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